इतिहास के साथ क्रूर उपहास

  • 2012-10-25 06:01:36.0
  • राकेश कुमार आर्य

ईसाईयत और इस्लाम विश्व इतिहास को बीते हुए पांच सात हजार वर्ष में समेटकर चलते हैं। इसका कारण ये है कि ईसाईयत और इस्लाम को अपनी जड़ों के स्रोत इतने समय से पूर्व के दिखाई ही नही देते। इसलिए इन विचारधाराओं ने विश्व में सैमेटिक (ईसाईयत और इस्लाम जैसे मजहब) और नॉन सैमेटिक (वैदिक धर्म और उससे संबंधित शाखायें यथा जैन, बौद्घ सिक्ख आदि) मजहबों की एक काल्पनिक धारणा सृजित की। भारत के इतिहास के संदर्भ में यह बात सर्वाधिक विडंबना पूर्ण है कि इसे विदेशी शत्रु लेखकों द्वारा लिखा गया है। यह कुछ वैसा ही है जैसे आपकी उपस्थिति में आपके ही विषय में बताने के लिए किसी और को खड़ा कर दिया जाए जबकि आप उस बताने वाले से अपने विषय में बेहतर जानते हो। भारत के विषय में भारत का प्राचीन साहित्य हमें बेहतर बता सकता है। लेकिन उस साहित्य को विदेशी शत्रु लेखकों ने एक झटके में ग्वालों के गीत या एक उपन्यास मात्र कहकर निरस्त कर दिया। जिस पर नेहरू गांधी जैसी भारत की विख्यात जोड़ी तक की सहमति की मोहर लगी मिलती है।
स्वतंत्र भारत में इतिहास लेखन की जिम्मेदारी भारत के पहले शिक्षामंत्री मौलाना आजाद ने संभाली। 1948 में मौलाना साहब ने एक शिक्षा आयोग की स्थापना की। इस आयोग में दो अंग्रेज थे तथा अन्य सदस्य अंग्रेजी मानसिकता में रचे बसे हुए दास मानसिकता वाले थे। ये लोग नही जानते थे कि भारत की शिक्षा प्रणाली का प्राचीन स्वरूप क्या था और उसकी उपयोगिता या उपादेयता आज के संदर्भ में क्या हो सकती है? इसका इन्हें रंच मात्र भी ज्ञान नही था। इन पर विद्वता थोपी गयी थी और उस थोपी गयी विद्वत्ता से भारत का इतिहास लिखाया जाना था। भारत की शिक्षा प्रणाली की दिशा तय की जानी थी। ये कथित विद्वान नही जानते थे कि सदाचार तथा ब्रह्मïचर्य किसे कहते हैं और इन दोनों चीजों का शिक्षा के लिए आदर्श समाज की संरचना के लिए कितना महत्व हो सकता है। इस प्रकार इन दो महत्वपूर्ण चीजों को अस्वीकार करके या स्थान न देकर हमने जिस शिक्षा प्रणाली को लागू किया उसने ही आज के उस कथित सभ्य समाज की नींव रखी जिसमें प्रात:काल की सैर में या अन्य किसी भी अवसर पर लोग नमस्ते करना या एक दूसरे की कुशलक्षेम पूछना एक दूसरे से उचित नही मानते। अकेले घुटो और अकेले ही अपनी समस्या से लड़ो और सभ्य कहलाओ, ये है सभ्य समाज की पहचान। आज का युवा इस सभ्य समाज में कतई अधीर और लम्पट बनता जा रहा है। इसीलिए आत्महत्या, निराशा, हताशा और तनाव की बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। ऐसी स्थिति परिस्थिति को देखकर नही लगता कि हम किसी भी तरह से सभ्य समाज में जी रहे हैं।
मौलाना आजाद का संस्कृत और हिंदी विरोध तो जग जाहिर है। उन्होंने भारत की प्राचीनता को इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार अवैज्ञानिक और अतार्किक ढंग से समेटने और घुसेडऩे का प्रयास किया। उन्होंने ऐसे लोगों को ही प्रोत्साहित करना आरंभ किया जो अंग्रेजी काल में इतिहास और सांस्कृतिक विषयों के विशेषज्ञ माने जाते थे और जो भारत को दीन हीन और मतिहीन भारत सिद्घ करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया करते थे। जिन्होंने गुलामी की मानसिकता को झलकाने वाले गीत जनगणमन अधिनायक को पूरे जोर से गाया और अपने अधिनायक और भारत भाग्य विधाता अंग्रेज की स्तुति में राजा महाराजाओं के चारणों को भी पीछे छोड़ दिया था। इतिहास की खोज में भी भारत के इस 'महाविद्वान मंत्री' ने उन्हीं लोगों को लगाया जो इतिहास विषयक उन्हीं की सी दृष्टि रखते थे। 8 नवंबर 1948 को दिल्ली में 'नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस इन इण्डिया' द्वारा एक सभा आहूत की गयी। जिसमें डॉ. मजूमदार और अल्तेकर को मौलाना आजाद ने अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा। इस सभा में भारत के इतिहास के कालक्रम को प्रस्तुत किया। उन्होंने इस संदर्भ में प्रस्तुत अपनी तालिका में बताया कि 'विश्व की सर्वाधिक प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद के आविर्भाव को दो हजार तथा पंद्रह सौ वर्ष ई. पू. के बीच उपनिषदों को 800 और 500 ईपू. के बीच चरक को सौ वर्ष ई. पश्चात, वांग्ज्योतिष को 500 वर्ष ई.पू. धर्म सूत्रों को 600 से 200 वर्ष ई.पू. तथा महाभारत, मनुस्मृति व रामायण को दो सौ वर्ष ई. पश्चात का बताया है।"
मौलाना आजाद के प्रिय अल्तेकर की यह तालिका भारतीय इतिहास परंपरा के सर्वथा विपरीत है। लेकिन जिस व्यक्ति को भारतीय परंपराओं को ही समूल विनष्ट करना था उसके लिए तो यह तालिका एक दम सही थी। ऐसी झूठी मान्यताओं और अवधारणाओं को इतिहास में एक मान्यता प्राप्त सिद्घांत या सत्यमत बनाने के लिए 'दयानंद महाविद्यालय लाहौर' के भूतपूर्व अनुसंधान केन्द्राध्यक्ष रहे पं भगवद्दत जी ने दो जुलाई 1948 को संविधान सभा के सभापति डॉ राजेन्द्र प्रसाद के लिए एक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने अनुरोध किया था कि इतिहास लेखन के लिए पूरे देश के इतिहास मर्मज्ञों की तथा संस्कृति व धर्म मर्मज्ञों की एक बैठक बुलाई जाए और सत्यमत को निष्कर्ष रूप में स्थापित कराने के उपरांत सच सच को इतिहास में मान्यता दी जाए। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने इस पत्र को गंभीरता से लिया लेकिन उन्होंने अपनी सीमाएं पत्र के लेखक को बता दीं कि इस पर करना तो सरकार को ही है, पर मैं अपने नोट के साथ इसे प्रधानमंत्री तक पहुंचाऊंगा और उनसे मिलने पर इसके विषय में बात भी करूंगा। लेकिन नेहरू सरकार ने उसी को उचित माना जो उसके शिक्षा मंत्री ने उचित माना था। आज भारतीय इतिहास के विषय में यही बात लागू होती है कि जितने मुंह उतनी बातें। जितनी कलम उतनी लातें, कैसे कटें ये लंबी रातें। मानो एक एक कलम लात मार रही है। कांग्रेसी और कम्युनिस्ट मिलकर इतिहास का जनाजा निकाल रहे हैं। ये लोग विदेशियों में से मुस्लिमों और अंग्रेजों के आगमन को भारत के लिए उपकार मानते हैं और भारत के इतिहास में से वैदिक काल या हिंदू नरेशों के उत्कृष्ट कार्यों को एकदम निकालकर उसे नपुंसक रूप में प्रस्तुत करने में ही धर्मनिरपेक्षता की जय मानते हैं। ये लोग नही मानते कि रामायण व महाभारत के युद्घ या घटनाएं या ये ग्रंथ सत्य हैं। इतिहास के लिए ये चीजें पहेली बनी हुई हैं, क्योंकि देश को पहला शिक्षामंत्री ही एक पहेली के रूप में मिला था। इसलिए आज तक सही प्रकार से सत्यमत के रूप में तय नही हो पाया कि रामायण और महाभारत का काल कब का है? और ये ग्रंथ किसने और कब रचे? हमारे उपनिषदों का काल, स्मृतियों का काल हमारे ऋषि गौतम, कणाद, जैमिनी, कपिल, भारद्वाज विश्वामित्र आदि का काल क्या था? उनकी शिक्षाएं क्या थीं, और वह कैसे विश्व के निर्माता थे, और यह भी कि वह विश्व क्या आज भी निर्मित हो सकता है?
विश्व के लिए 'शांति शांति' का शोर मचाने वाला भारत जब तक शांति के मूल स्रोतों की तथा शांति के सूत्रों की व्यवस्था अपनी भाषा में अपनी जवान में नही सीखे और समझेगा तब तक उसका शांति राग विश्व की नजरों में एक मिथ्या कल्पना ही बना रहेगा। अपने आपके साथ धोखा करना तथा अपने आपको न समझना ही आत्मप्रबंचना होती है। आत्म प्रवंचक और आत्मशत्रु लोगों ने भारत की अहिंसा को सही अर्थों और संदर्भों में ग्रहण नही किया तो 1962 में चीन के हाथों देश को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। तब 'आंख में पानी भरकर भारत की आंखें खुलीं उसे लगा कि अहिंसा की रक्षार्थ, हिंसा भी आवश्यक है। अहिंसा की रक्षार्थ घर में लाठी रखनी भी आवश्यक है। इसलिए शांति को भी सही संदर्भों में लेना होगा। ये शांति अंग्रेजों से गायब हो चुकी है, इस्लाम की तलवार ने इसे खून के दरियाओं में बहा दिया है। इसलिए जिन लोगों से ये पहले ही दामन झटक चुकी है। उनकी मान्यताओं को अपने लिए वेदवाक्य स्वीकार करने से कल्याण नही होगा। हां हम मृगमरीचिका का शिकार अवश्य हो जाएंगे। शांति की उपासना और स्थापना तभी संभव है जब हम अपने ग्वालों के गीतों अर्थात वेदमंत्रों को समझेंगे और उनके अर्थों पर विचार करेंगे। संगत तो करें असंगत की और परिणाम चाहें मनोनुकूल, यह नही हो सकता। संगत की रंगत चढ़ाने के लिए तर्क संगत और वेद सम्मत संस्कृति की संगति करनी पड़ेगी। इसलिए इतिहास के साथ क्रूर उपहास की प्रवृत्ति को यथाशीघ्र दुरूस्त करने की आवश्यकता है। इसी निवेदन के साथ देश की युवा पीढ़ी के लिए समर्पित है मेरा ये लेख। मैं चाहता हूं कि इस विषय में इतिहास के पुनर्लेखन के लिए देश के वैदिक विद्वानों की एक समिति गठित की जाए और एक एक विषय पर उनके विचार लेकर सत्यमत और सत्य सिद्घांतों को इतिहास में स्थान दिया जाए।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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