...... यही था भारत का वास्तविक साम्यवाद

  • 2012-07-05 11:26:32.0
  • राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

पिछले अंक का शेष ...
अब सारे कार्यों के लिए लोग राज्य की ओर टकटकी लगाये रहकर देखते रहते हैं। अधिकार परस्त लोग निकम्मे होते हैं और कम्युनिस्टों ने ऐसे ही समाज का निर्माण किया है।
जबकि भारत की आश्रम व्यवस्था का तो शाब्दिक अर्थ भी आ+श्रम=श्रम से परिपूर्ण है। ब्रहम चर्यश्रम में विद्याध्ययन का श्रम है, गृहस्थ में गृहस्थी को चलाने का श्रम है, वानप्रस्थ में पुन: खोयी हुई शक्ति को हासिल करने का श्रम है तो संन्यास आश्रम में अर्जित ज्ञान को पुन: समाज के लिए बांटने का श्रम है। निकम्मा कोई नहीं है। इसीलिए वेद ने कहा कि-कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम् समा नर:।
अर्थात मनुष्य को कर्मशील और कर्तव्यशील बने रहकर ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। नागरिक विषयों में राज्य का हस्तक्षेप कम से कम तभी होगा जब नागरिक  स्वभावत: कत्र्तव्य परायण होंगे, कर्मशील होंगे और एक दूसरे के प्रति सहयोग का भाव रखते होंगे।
वानप्रस्थाश्रम में व्यक्ति पुन: सद्शास्त्रों का अध्ययन वनों में जाकर तपस्यादि करता था ताकि गृहस्थ में रहते हुए यदि कहीं कोई गलती हो गयी हो तो उसे सुधारा जा सके। आजकल भी हम यज्ञ करते समय स्विष्टïकृताहुति देते हैं। जिसे हम प्रायश्चित आहुति भी कहते हैं। यज्ञ के बीचों बीच आहुति देने का प्रयोजन भी भारत के वानप्रस्थाश्रम की परंपरा का पावन स्मरण करना ही है। समय रहते हुए गलतियों का शोधन कर लेना, या प्रायश्चित कर लेना ही उत्तम है, चलते समय गलतियों को स्वीकार करने से कुछ नहीं होगा। घर में भी समय रहते गलतियां स्वीकार करने की परंपरा से ही घर का परिवेश अच्छा रह पाता है, इससे संसार में अपरिग्रह का समन्वयवादी परिवेश स्थापित होता है। भारत के साम्यवाद की इस अनूठी और महान परंपरा को कम्युनिस्ट तनिक भी नहीं समझ पाए हैं। अब भारत के संन्यासाश्रम की ओर आते हैं। आवश्यकता से अधिक संचय नहीं- यह भावना अभी तक हमने ब्रहमचर्याश्रम में देखी, ग्रहस्थ आश्रम में देखी, वानप्रस्थ में देखी । अब इसी भावना को हम संन्यास में देखते हैं इस आश्रम में लगा शब्द न्यास अंग्रेजी के ट्रस्ट का पर्यायवाची है। स्पष्ट है कि संन्यासी व्यक्ति एक ट्रस्टी है वह संसार को और संसार के पदार्थों को अब एक ट्रस्टी के रूप में ही देखता है। वह उनमें रमता नहीं है। वह पूर्णत: अपरिग्रहवादी हो चुका है। संसार के पदार्थों को वह संसार के लिए छोड़ रहा है। ट्रस्ट का एक अभिप्राय विश्वास भी है। इसलिए संन्यासी व्यक्ति का सभी विश्वास करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई संन्यासी व्यक्ति अपने जीवन के अनुभवों को और अध्यात्म के अनुभवों को समाज में बांट रहा है, तो वह जो कुछ भी बता रहा है, उसे लोग मानते हैं। स्वीकार करते हैं। सोचते हैं कि वह जो कुछ भी कह रहा है या बता रहा है वह हमारे भले के लिए बता रहा है।
इस प्रकार भारत की प्राचीन आश्रम व्यवस्था पूर्णरूपेण लोकल्याण पर आधारित थी और लोककल्याण ही भारत का साम्यवाद था। हर व्यक्ति हर स्थान पर खड़ा होकर मानो लोक कल्याण की माला भजता था। सोचता था कि इस लोककल्याण के महान यज्ञ में मेरी आहुति या उपयोगिता क्या हो सकती है?
यही स्थिति भारत की वर्ण व्यवस्था की थी। वर्ण व्यवस्था में भी व्यक्ति लोककल्याण के लिए समर्पित रहता था। भारत ने व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं की तो खोज की ही, साथ ही समाज के मूलभूत शत्रुओं की भी खोज की। समाज के मूलभूत शत्रुओं में सम्मिलित हैं-अज्ञान, अन्याय और अभाव। यदि ज्ञानवर्धन करना व्यक्ति की पहली मूलभूत आवश्यकता है तो अज्ञान भी व्यक्ति का पहला शत्रु हो जाना स्वाभाविक ही है। इस वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत चार वर्णों में मानव समाज को बांटा गया था जैसी जिसकी प्रतिभा और जैसी जिसकी योग्यता वैसा ही उसका वर्ण हो जाता था। अज्ञान अंधकार को मिटाने वाले लोग और समाज को अपने ज्ञानबल से मार्गदर्शन देने वाले लोग ब्राहमण कहलाते थे। ये व्यक्ति के अज्ञान रूपी शत्रु से लडऩे वाले योद्घा होते थे। इनका पूरा समाज मानव समाज से अज्ञान को मिटाने के लिए संघर्ष करता था।
दूसरा शत्रु अन्याय था। समाज में सबल निर्बल का शोषण करता है, उस पर अन्याय करता है। जिससे समाज की गति क्षरणावस्था को प्राप्त होने लगती है। उस क्षरण की अवस्था से त्राण करता था क्षत्रिय समाज। इसीलिए उसे क्षत्रिय कहते हैं। समाज में कहीं भी अन्याय ना हो शोषण ना हो, अत्याचार ना हो, इस पूरी की पूरी व्यवस्था को देखता था क्षत्रिय वर्ग, पूरी तरह सावधान और सजग रहकर वह समाज का पहरा देता था।
अब आते हैं हम तीसरे शत्रु अभाव पर। भोजन वस्त्र और आवास की सुविधा देना और उसके सारे संसाधन विकसित करना फिर उनका उचित वितरण करना:-ये सारी व्यवस्था देखता था समाज का वैश्यवर्ग। इस वर्ग के द्वारा भी बहुत बड़ी सेवा की जाती थी अब जो लोग स्वयं को अज्ञान, अन्याय और अभाव तीनों में से किसी से भी लडऩे में अक्षम और असमर्थ पाते थे या समझते थे उनका काम समाज की सेवा करना होता था। वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म था। कर्म परिवर्तन से वर्ण परिवर्तन स्वयं हो जाता था। शूद्र का बच्चा कर्म से ब्राहमण और ब्राहमण का बच्चा कर्म से शूद्र हो सकता था। समाज की व्यवस्था में  जो जहां खड़ा होकर सेवा कर सकता था, या जो जहां के लिए उपयुक्त था वो उसी वर्ण का व्यक्ति कहलाता था। आरक्षण का पचड़ा नहीं था। सबका लक्ष्य सामूहिक उत्कर्ष था। किसी को पीछे छोडऩा उद्देश्य नहीं था। यही था वास्तविक साम्यवाद। आज भी हम इसी वर्ण व्यवस्था को देखते हैं सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शूद्र ही हैं। व्यवस्था तो भारत की अपना रखी है और गुण विदेशों के गाते हैं-यह कैसी राष्ट्रभक्ति है?
उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि हिंदुत्व (आर्यत्व) एक जीवन व्यवस्था है। इस जीवन व्यवस्था या जीवन प्रणाली को हिन्दूवादी संगठन अपनाकर चलते हैं, या उसे भारत की वर्तमान समस्याओं का एक मात्र समाधान मानते हैं तो इसमें साम्प्रदायिकता कहां से आ घुसी? इसी जीवन व्यवस्था को अपना जीवनादर्श घोषित कर आगे बढऩे के लिए वेद ने मानव समाज को आदेशित किया कि- सं गच्छध्वं सं वद ध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
अर्थात तुम्हारी चाल एक जैसी हो, तुम्हारी वाणी एक जैसी हो तथा तुम्हारे मन एक जैसे हों। मन का अभिप्राय यहां संकल्पों से है। कहने का अभिप्राय है कि लोक कल्याण की उत्कृष्ट भावना से व्यक्ति-व्यक्ति रोमांचित हो उठे, उससे झूम उठे तो सारी वसुधा को आर्य बनाने में तथा एक परिवार बनाने में देर नहीं लगेगी। कम्युनिस्टों के लिए आवश्यक है कि वो भारत को समझें तथा भारत की संस्कृति को अपनाकर संसार को सुसंस्कृत बनाने का प्रयास करें। उनका साम्यवाद मर चुका है, परंतु आर.एस.एस. का साम्यवाद तो अमर है, उस अमर साम्यवाद की ओर कम्युनिस्ट बढ़ें। मरे हुए बच्चे को लेकर बंदरिया की तरह घूमने से बेहतर है किसी अच्छाई को अपना लेना। लोक कल्याण का महारास भारत की महान संस्कृति में छिपा है। विदेशों की जूठन खाने में नहीं। व्यष्टि से समष्टितत्व की ओर बढऩा केवल और केवल हिंदुत्व की उच्च भावना में निहित है। इसे कम्युनिस्ट जितनी जल्दी समझ लेंगे उतना ही अच्छा है। जो लोग कल्याण के इस महारास में कहीं भी और किसी भी प्रकार से बाधक है, समझो वहीं मानवता के शत्रु हैं। वही दानव है और वही आतंकवादी है।
आर.एस.एस. की देशभक्ति और राष्ट्र के मूल्यों के प्रति समर्पण का उसका भाव असंदिग्ध है। उन पर कहीं किसी प्रकार की कोई उंगली नहीं उठाई जा सकती। वह हिंदुत्व रूपी जीवन प्रणाली के लोक कल्याण के महारास में विघ्न डालने वाली शक्तियों को यदि अनुचित बताता है तो यह उसका अपराध नहीं अपितु राष्ट्र पर उसका एक उपकार है। कम्युनिस्ट अपराध और उपकार में अंतर करना सीखें। उनके लिए हमारी यही नेक सलाह है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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