सर्वधर्म-समभाव का भ्रम

  • 2012-06-21 03:57:01.0
  • राकेश कुमार आर्य

मजहबों को धर्म मानने वाले भारत पर्याप्त में हैं। उनमें इतना साहस नहीं है कि वे मजहब को सम्प्रदाय मान सकें। इसलिए (सर्वधर्म-समभाव) की एक बे सिर पैर की परिकल्पना, भारत में आविष्कृत कर ली गयी है। इस अवधारणा के पीछे बड़ा गम्भीर षडय़न्त्र कार्य कर रहा है। अत: साम्प्रदायिकता की जिस विषबेल को समाप्त कर देना चाहिए था उसका एक ऐसा नया स्वरूप यहॉं के छद्मधर्मनिरपेक्षियों ने खोज निकाला है कि जिसे अत्यन्त वन्दनीय और अभिनन्दनीय मान लिया गया है। मानों भारत में सामाजिक-समरसता एवं राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाये रखने के लिए इससे भिन्न कोई अन्य अवधारणा अथवा विचारधारा है ही नहीं। इन अज्ञानियों और अक्ल के दुश्मनों को कौन समझाये कि- मानव के विभिन्न धर्म नहीं हो सकते- समतामूलक समाज की संरचना के लिए जिस समभाव की आश्यकता है मानव समाज में यह समभाव जहॉं-जहॉं भी है और जिस अनुपात में भी है, उसी अनुपात में उतना ही धर्म है धर्म खण्ड-खण्ड में बिखरा हुआ नहीं मिल सकता। यदि वह खंडित स्वरूप में होता तो मानवता को मानव का सर्वोच्च धर्म कभी नहीं माना जा सकता था।
जब मानवता खण्डित नहीं हो सकती तो धर्म के खण्डित स्वरूप की तो परिकल्पाना भी नहीं की जा सकती है।हाँ, मजहब! अथवा सम्प्रदाय खण्डित स्वरूप का हो सकता है। इसीलिए तो विखण्डन सम्प्रदाय का स्वाभाविक गुण है। क्योंकि उसकी मूल प्रकृति ही विखण्डन पर आधारित है। सारे सम्प्रदायों में कुछ अच्छी बातें हो सकती हैं तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि किसी सम्प्रदाय में जिस अनुपात में जितनी अच्छी बातें हैं वहां उतने ही अनुपात में धर्म की उपस्थिति मान ली जाये। तब यह भी कहा जाएगा कि धर्म की उपस्थिति को एक खण्ड (टुकड़ा)मान लिया जाये। इस प्रकार सभी सम्प्रदायों के टुकड़ों को जोड़कर जब एक साथ किया जाएगा तो विभिन्न खंडित धर्मों का सम्मेलन हो जाएगा। वस्तुत: (सर्वधर्म-समभाव) के पक्षधर इसी अवधारणा के पोषक हैं। किन्तु सच इस बात के भी कहीं विपरीत है। अंगारे का धर्म आग है, उसका ताप है। उसे तोड़ भी लिया जाये तो जब तक उसमें आग (उसका धर्म ) रहेगी तब तक वह ताप देता रहेगा और लोग उसे अंगारा ही कहेंगे। किन्तु जैसे ही आग बुझ जायेगी तो तुरन्त अंगारा, अंगारा न रहकर केवल राख रह जाएगा। इसी प्रकार मानव में जब तक मानवता अर्थात् धर्म रहेगा तब तक ही वह मानव है। मानवता के विखण्डित स्वरूप सम्प्रदाय में जाते ही उसकी मानवता धीरे-धीरे अंगारे से राख बन जाती है। जिस प्रकार आग के बिखरे हुए, टूटे हुए अंगारे को पुन: तोड़कर उसके भौतिक स्वरूप में जोड़ पाना असम्भव है। हॉं! यह तब तो सम्भव है जब कि सम्प्रदाय अपने स्वरूप को स्वयं ही समाप्त कर धर्म के महासमुद्र में नदी की भॉंति मिल जाये। जब तक नदी अपने प्रवाह में उपस्थित है तब तक उसे समुद्र नहीं कहा जा सकता। हॉं! कुछ लोगों को वह समुद्र सी भासती अवश्य है। किन्तु अवस्थाएँ हैं। सम्प्रदाय=मजहब) की नदी को धर्म के महासमुद्र में मिलाने के लिए भागीरथ प्रयास करना होगा। सम्प्रदाय के किनारों को तोड़कर उसकी सीमाओं, उसके अस्तित्व को मिटाकर व उसके स्वरूप को समाप्त कर उसे धर्म के स्वरूप में विलीन करना होगा कि मानो उसका अस्तित्व कभी था ही नहीं। तब होगा साम्प्रदायिकता का अन्त। छद्म धर्मनिरपेक्षता के जितने पैरोकार और अलम्बरदार आज भारत में हैं उनमे से कितनों में साहस है और कितनों में ऐसी राजनैतिक इच्छा शक्ति है कि जो सम्प्रदाय के इस प्रकार के विलीनीकरण की पहला भारत में कर दे? सम्भवत: एक में भी नहीं। ये लोग कहते हैं किहम साम्प्रदायिकता का अन्त करके ही रहेंगे, किन्तु कैसे? ये इन्हें भी नहीं पता। जो बात इन्हें पता है उसके अनुसार ये निरीह प्राणी कुछ दलों पर साम्प्रदायिकता की राजनीति का आरोप लगाते हुए उन पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं। उन्हें रात-दिन कोसते हैं। इनके अनुसार मन्दिर की राजनीति करना साम्प्रदायिकता है और मस्जिद की राजनीति करना धर्मनिरपेक्षता है। दोहरे मानदण्डों को अपनाने वाले ये कबूतर देश पर विपत्ति की बिल्ली को आते देखकर देश को ठीक परामर्श दे रहे हैं कि आंखे बंद कर लो, अन्यथा बिल्ली खा जायेगी। इससे साम्प्रदायिकता का कभी अन्त नहीं हो सकता यह एक झूठा सपना है जिसे भ्रान्तिवश हो रही सुखद अनुभूति के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। सर्वधर्म समभाव की मूर्खतापूर्ण सोच इस सुखद अनुभूति को देर तक स्थायी रखने और इसका विस्तार करने की नीयत से आविष्कृत की गयी। इन्हें नहीं ज्ञात कि यदि संप्रदायों में समभाव उत्पन्न हो गया तो फिर उनका अस्तित्व सुरक्षित कहां रह गया? विभिन्न सम्प्रदायों की अच्छी बातों का संकलन धर्म कहा जा सकता है। लेकिन यदि इन अच्छी बातों को एक साथ संकलित किया जाता है तो उन बातों को जो अच्छी नहीं हैं हमें छोडऩा भी होगा। छोडऩा ही नहीं होगा अपितु समाप्त ही करना पड़ेगा। ऊपरी मन बहलाव की बातें करना मूर्खतापूर्ण है कि-सभी मजहबों में समानता है, सभी अच्छे हैं और सभी में समाज को नया स्वरूप देने की पूर्ण क्षमताएं हैं, सौ में से मात्र दस अच्छी बातों को चुन लेना और उस सम्प्रदाय को फिर धर्म की संज्ञा देना हमारे मानसिक दीवालियेपन का प्रतीक है। वास्तविकता यह है कि दस अच्छी बातों की वकालत तो कर दी जाती है किन्तु शेष 9० गलत बातों पर मौन साध लिया जाता है। उन्हें गलत नहीं कहा जाता। बस! भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या का विकराल रूप में बने रहने का यही एकमात्र कारण है कि यहां गलत को गलत कहने का साहस किसी राजनीतिज्ञ में नहीं है। स्वतंत्रता के पश्चात से भारत में दस अच्छी बातों को 9० बुरी बातों पर विजयी बनाने के लिए प्रोत्साहित करने का बेतुका राग अलापा जा रहा है। इसके लिए ही धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म-समभाव जैसे नारे यहां गढ़े गये हैं। होना तो यह चाहिए था कि इन 9० बुरी बातों को समाप्त करने के लिए चरणबद्घ ढंग से कार्य किया जाता कि-हमारा सबका धर्म एक है। हम किसी मानव का रक्त इसलिए नहीं बहायेंगे कि यह काफिर अथवा विधर्मी है। हम किसी पशु को इसलिए नहीं मारेंगे कि उसे एक वर्ग माता कहकर पुकारता है। हम किसी अबला की अस्मिता इसलिए नहीं लूटेंगे कि वह किसी काफिर की पत्नि है, बेटी है या माता है। ऐसी बातें बहुत हैं। पूर्वोत्तर भारत में आप जायें। आपको ज्ञात होगा कि-एक सम्प्रदाय के लोगों को चुनचुन कर मारा जा रहा है। एक भाषा के लोगों को चुन-चुनकर समाप्त किया जा रहा है। कहां गयी वहां मानव की मानवता? उसे किसने डस लिया, किसने हड़प लिया? सर्वधर्म-समभाव का नारा लगाने वाले क्या देंगे, इस सवाल का जवाब? इस सवाल का कोई जवाब है ही नहीं? ये छद्म धर्मनिरपेक्षी हमें बता रहे हैं कि ईसाई मिशनरियों से सीखना है तो सीखो-दया, करूणा, उदारता, प्रेम, सहिष्णुता आदि। और उधर ये मिशनरीज इस मीठी छुरी से अर्थात दया, करूणा आदि के पाखण्ड से पूर्वोत्तर को हमसे अलग करने पर तुले हुए हैं। हम तब भी रट लगा रहे हैं सर्व धर्म समभाव की, और वे दिखा रही हैं, अपना मोल भाव। ईसाईयत की दया, करूणा आदि की स्वार्थपूर्ण चार बातों का बढ़ चढ़कर प्रचार करेंगे तो आप राष्ट्रवादी हैं-आपके विचार अच्छे हैं, आप आधुनिकतावादी हैं, प्रगतिवादी हैं और यदि आपने इस स्वार्थ की कलई खोलनी आरंभ कर दी तो आप देशद्रोही हैं, आपके विचार विघटनकारी हैं, आप रूढि़वादी और परंपरावादी विचारों के हैं। इसी प्रकार इस्लाम के कथित भाईचारे को आप सराहेंगे तो आप धर्मनिरपेक्ष हैं और यदि कुराण की उन आयतों का विरोध करेंगे जो काफिरों का कत्ल करने की बात कहती हैं तो आप सांप्रदायिक हैं। अत: यहां सच को झूठ से दबाया जाता है। झूठ को सजाया और संवारा जाता है उसका महिमा मण्डन किया जाता है। इस महिमा माण्डन के समक्ष कीर्तन की मस्ती में गाने वाले गधों की यहां कभी कमी नहीं रही है। पूर्व में भी ये गधे रहे हैं जब यहां पंडित जी स्वर्ग में बैठे इनके पूर्वजों को लड्डू स्वयं खाकर वहां पहुंचा देने का आश्वासन इन्हें देकर शांत और प्रसन्न कर दिया करते थे, और आज भी बहुत बैठे हैं। फिर भी हम सर्वधर्म समभाव के गीत गा रहे हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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