किसे कहते हैं-तम

  • 2012-05-11 10:22:48.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

तम क्या है? और ज्योति क्या है? वैदिक ज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी ज्ञान-विज्ञान की दलदल में फंसा पश्चिमी जगत तम और ज्योति की गलत व्याख्या करके आज अपनी स्थिति पर स्वयं परेशान है। जीवन के सभी रिश्तों माता-पिता पुत्र, बंधु-बान्धव, मित्र कलत्र को उसने नकारकर अकेला चलकर देख लिया, किंतु जीवन का रस उसे हाथ नहीं आया। विवाह को मात्र इसलिए कि संभवत: अगले जीवन साथी के सान्निध्य में अधिक आनंद मिलेगा उसने एक संविदा अर्थात एक करार तक मान लिया, और इस संबंध में एक नहीं अनेक वैवाहिक संबंध कायम करके देख लिये किंतु जीवन का आनंद फिर भी नहीं मिला। जीवन में फिर भी फीकापन है, नीरसता है। भौतिक विज्ञान का वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों में दिन रात संलग्न है, अपने पूर्ण मनोयोग से अनवरत अनुसंधान के कार्यों में रत है। खोज करते करते वह चंद्रमा तक जा पहुंचा है, और अन्य ग्रहों पर जाने की तैयारी में है, किंतु फिर भी अशांत है। उसके चेहरे पर हमारे ऋषियों का सा ओज और तेज तो है ही नहीं साथ ही निराशा के भाव भी हैं। स्पष्टï है कि उससे भी कहीं चूक हो गयी लगती है। तम और ज्योति को उसकी अन्वेषी आंखें खोज नहंी पायीं, समझ नहीं पाईं। उसे समझ नहंी आ रहा कि वह जितना अधिक भौतिक विज्ञान में उन्नति कर रहा है, पश्चिम का समाज उतना ही एक भयंकर आग में जलता जाता है। नई खोज  के आते ही यह न बुझने वाली आग और भी प्रचंड हो उठती है। वैज्ञानिक परेशान है, हाल बेहाल है, दुखी है, व्यथित है। वह समझ नहीं पा रहा है कि नई खोज आग को बुझाने के स्थान पर उसे और भी प्रचंड क्यों कर देती है? पूरा संसार में उजाले के स्थान पर अंधेरा गहरा रहा है। सडक़ों पर उजाले है शहरों में उजाले हैं, घरों में उजाले हैं, लेकिन जेहन में अंधेरे हैं। वैज्ञानिक उजाले के लिए तड़पते मानव को उजाले का आधुनिकतम उपाय प्रस्तुत कर रहा है, उजाले के लिए तड़पते और तरसते मानव को उजाले का एक से बढक़र एक साधन उपलब्ध करा रहा है, किंतु फिर भी मानव मन घुप्प अंधेरा अनुभव कर रहा है। प्रत्येक व्यक्ति का मन अशांत है, हृदय अधीर और बेचैन है वैज्ञानिक असमंजस में है। दुनिया मृगतृष्णा का शिकार है।

व्यावहारिक जीवन में इस मन: स्थिति के शिकार हम सब हैं। हम सब की मन: स्थिति कुछ कुछ वैसी ही है जैसी एक उस विद्यार्थी की होती है कि जिसके लिए परीक्षा परिणाम उसकी आशा के अनुरूप नहीं आता। वह यह भूल जाता है कि जिस अनुपात में उसने स्वयं अध्ययन और अध्यवसाय किया उसी अनुपात में उसका परीक्षा परिणाम उसके सामने है। जीवन की दिशा को बदलकर उसके मानदण्डों और मूल्यों को बदलकर हमने इस विद्यार्थी की भांति अध्यवसाय से जी चुराना आरंभ कर दिया है। प्रमाद और आलस्य के कारण जैसे परिणाम अब आ रहे हैं उनसे परेशान हैं। कैसी अजीब बात है। स्वयं वो परिस्थितियां सृजित कीं कि जिन से आज के अशांत और व्याकुल संसार की निर्मिति हुई और स्वयं इस बात का प्रश्न मानव समुदाय कर रहा है कि ऐसा क्यों हुआ? येे अपने साथ ही धोखा करना नहीं तो और क्या है? हमारे जीवन का लक्ष्य तो परम शांति की उपलब्धि था, किंतु घोर अशांति हमें प्राप्त हो गयी। इसकी प्राप्ति से ही हर व्यक्ति के जेहन में छटपटाहट है, व्याकुलता है, और बेचैनी है।

बकौल शायर ---

हम फूल चुनने आये थे बागे हयात में।

दामन को खारजार में उलझा के रह गये।।

इस अशांति और व्याकुलता को जो कि भौतिक ऐश्वर्यों के कारण प्रदीप्त है उसकी अग्नि प्रचंड हो रही है, भौतिक ऐश्वर्यों से नहंी अपितु आध्यात्मिक साधनों से ही शांत किया जा सकता है।  यह शरीर भौतिकवाद की भांति नश्वर है, इसमें इंद्रियों के विषयों में व्यक्ति जितना अधिक फंसता है, उतना ही संबंधित इंद्रिय के विषय का दास बनता चला जाता है। वह सुख की खोज में कदम बढ़ाता है किंतु दु:ख प्राप्त करता है। कुछ पाने की चाह, सब कुछ गंवाने की आह बन जाती है। इस सबको हमारे महान पूर्वजों ने तम की संज्ञा दी, अज्ञान और अंधकार कहा। यह तम ही हमारे दु:खों का वास्तविक कारण है।

देवेंद्र सिंह आर्य ( 262 )

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