मनमोहन जी! गिलानी शान्ति पुरूष हैं या ग्लानि के पात्र.

  • 2011-11-17 11:28:41.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

मनमोहन जी! गिलानी शान्ति पुरूष हैं या ग्लानि के पात्र.

कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है। पर मेरा मानना है कि अब इस घिसी-पिटी बात में संशोधन करने का समय आ गया है क्योंकि सच ये है कि इतिहास अपने आप को नहीं दोहराता अपितु इतिहास में दर्ज मूर्खताएं अपने आपको दोहराती हैं। इसलिए इतिहास अपने हर मील के पत्थर पर लिखकर चलता है कि बीते हुए कल से शिक्षा लो और बीते हुए कल की बातों को दोहराओ मत। इतिहास के हर मोड़ पर लिखा होता है कि 'सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। ' भारत की विदेश नीति की यदि समीक्षा की जाये तो स्पष्ट होता है कि इसे कुछ भ्रमित लोगों ने बनाया है जो कि पूरी तरह से बहकी हुर्इ और भटकी हुर्इ मानसिकता के लोग हैं। कभी पं0 जवाहरलाल नेहरू ने अपनी असावधान विदेश नीति का परिचय देते हुए हिन्दी-चीनी भार्इ-भार्इ का नारा दिया था। जिसका परिणाम 1962 के युद्ध के रूप में देश को भुगतना पड़ा। 1971 में इन्दिरा गांधी ने जिस बांग्लादेश का निर्माण किया उसके निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान को हमने 'बंग-बन्धु' की उपाधि दी थी। आज उसी 'बंग-बन्धु' के देश के लगभग 5 करोड़ मुसलमान देश में घुसपैठिये के रूप में आ जमे हैं। इतिहास की यह भयंकर गलती बड़ी क्रूरता के साथ देश में दमन का दंश बहुसंख्यक वर्ग पर चला रही है। 1977 में जनता पार्टी का शासन आया तो इजरार्इल ने पाकिस्तान को परमाणु बम के इस्तेमाल से सबक सिखाने की ठानी। इजरार्इल के तत्कालीन विदेश मंत्री ने नेहरू के ''वारिस मोरारजी देसार्इ से अपने भीतर की बात बता दी जिसका मोरारजी भार्इ ने विरोध किया। जब इस घटना की जानकारी पाकिस्तान को लगी तो उसने मोरारजी देसार्इ को अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ''निशान-ए-पाकिस्तान दिया जिसे लेकर मोरारजी कृत कृत्य हो गये। इसके बाद जब भाजपा सत्तासीन थी तो लोगों को लगा कि शायद अब राष्ट्रवादी लोगों की सरकार आ गयी है। लेकिन सरकार के विदेश मंत्री ने खूंखार आतंकवादियों को अजीज मेहमान की तरह जब अफगानिस्तान ले जाकर हवार्इ जहाज से उतारा और इसके एक बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने जब जिन्ना की मजार पर जाकर ''जिन्ना चालीसा का पाठ किया तो भारत और भारत की विदेश नीति शर्मसार होकर रह गयी। अब इसी तर्ज पर भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को मालदीव में हो रहे 17वें सार्क सम्मेलन में 'शांति-पुरुष कहा है। इतिहास के इस मोड़ पर अपनी चिर परीचित भावुकता की एक नयी कड़ी जोड़कर हमने अपनी विदेश नीति की दुर्बलता का पुन: परिचय दिया है। पाकिस्तान भारत के प्रति आतंकी गातिविधियां चलाकर जिस प्रकार नागों को दूध पिला रहा है और अपने यहां चल रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविरों से निकाल निकालकर जिन नागों को भारत में भेज रहा है उससे देश की बहुसंख्यक जनता की दृष्टि में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी 'ग्लानि के पात्र हैं। क्योंकि वास्तव में गिलानी 'शांति पुरुष नहीं अपितु देश की जनता की नजरों में आतंकी पुरुष हैं। 'हमें विदेश नीति के सन्दर्भ में यह याद रखना चाहिये कि अगर आवश्यक हो तो ऊपर से हमेशा भयानक बनो लेकिन अपने दिल में हमेंशा नम्र रहो। फुफकारो यदि आवश्यकता हो, किन्तु काटो मत, दिल से प्यार करो और ऊपर से लड़ो। जिस व्यकित की ऐसी सोच और देश की विदेश नीति ऐसी होती है वह नीति मानवता की पोषक होकर भी दानवता की संहारक होती है। हमारे रहनुमा झूठे मानवतावाद में बहकर दानवतावाद के संहार के अपने संकल्प को ही भूल जाते हौ । भारतीय विदेशनीति का यह सबसे कमजोर पहलू है। मैथिलीशरण गुप्त की ये पंकितयां बडे़ी सार्थक हैं:-


प्रजा के लिए ही नृपोधोग है।
इसी के लिए राजा का योग है।।
प्रजा श्रेय ही सर्वदा ध्येय है।
इसी से प्रजा सम्मति श्रेय है।।
मनमोहन सिंह यह समझ लें कि -
निगाह से ओझल छिपे हुए बुनियाद के पत्थर बनो,
और अपने सीने पर सहर्ष बर्दास्त करो,
(भारत की) विशाल और भारी इमारत का बोझ।

समय परिवर्तन का है और इतिहास की मूर्खताओं से शिक्षा लेने का है, आजादी के 64 वर्ष बाद भी हमने फुफकारना नहीं सीखा है। फलस्वरूप हमारी इमेज संसार में एक दब्बू देश की है। इस दब्बूपन को दबंगपन में परिवर्तित करने का क्रानितकारी निर्णय लेने का समय आ गया है। क्रान्ति का अभिप्राय खून खराबा नहीं है। जैसा कि स. भगत सिंह ने 23 दिसम्बर 1929 को 'माडर्न रिव्यू के सम्पादक को लिखा था- प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा का नाम क्रान्ति है...विद्रोह को क्रान्ति नहीं कहा जा सकता यधपि यह सम्भव है कि विद्रोह की अन्तिम परिणति क्रान्ति हो।

इसलिए देश के नेता के रूप में बहकी हुर्इ बातें करना छोड़कर देश को नये संकल्प से भरने और भारी उधोग करने के लिए मनमोहन सिंह को सक्रिय होना पड़ेगा। देश संकल्प के लिए तैयार है। स्वामी रामतीर्थ के इन शब्दों को मनमोहन सिंह जरा एक बार अपने भाषण में सार्क सम्मेलन में दोहरा कर तो देखते-


हम रूखे टुकड़े खायेंगे
भारत पर वारे जायेंगे,
हम सूखे चने चबायेंगे,,
भारत की बात बनायेंगे,
हम नंगे उमर बितायेंगे,,
भारत पर जान मिटायेंगे,

यदि ऐसा होता तो सारा भारत अपने नेता का गदगद होकर स्वागत करता। उनकी गिलानी के प्रति की गर्इ टिप्पणी से देश में निराशा का माहौल बना है। जिसने भारत की विदेशनीति की पोल खोल दी है।

देवेंद्र सिंह आर्य ( 262 )

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