टूटना शाख से एक सुर्ख गुलाब का

  • 2015-11-19 03:42:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमें काल निगल रहा है या हम सभी काल की ओर स्वयं ही भागे जा रहे हैं-यह एक दार्शनिक पहेली है। जिस पर विश्व के विद्वान प्राचीनकाल से ही माथापच्ची करते आ रहे हैं। कुछ भी हो पर एक बात तो निश्चित ही है कि मृत्यु के साथ जन्म है तो जन्म के साथ मृत्यु भी है। ठीक जिस एक बिंदु पर एक का अंत होता है, वहीं और उसी बिंदु से दूसरे का प्रादुर्भाव हो जाता है। इसी को भोगते हुए मनुष्य सृष्टिï चक्र में और जन्ममरण के फेर में युग-युगों से घूम रहा है, वह मुक्ति का अभिलाषी होकर भी बंधन के फेर में है। क्योंकि उसके कर्म बंधन की जकडऩ को शिथिल नही होने देते-वह जितना इससे बाहर आना चाहता है उतना ही और फंसता-धंसता जाता है। इस अवस्था को देखकर तो यह लगता है कि मनुष्य से अधिक असहाय प्राणी संभवत: संसार में कोई नही है, जो अपनी सहायता भी नही कर सकता।

जीवन मृत्यु का यह क्रम सभी मानवों को और प्राणियों को समान रूप से झेलना पड़ता है।  यह अलग बात है कि कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं कि जिनके सामने मृत्यु भी उनकी चेरी बनकर आती है। करबद्घ हो विनम्र भाव से उससे प्रार्थना करती है कि-‘महामान्य! अब आपका इस पृथ्वी लोक पर विचरण करने का समय पूर्ण हो गया है। अब आप कृपा करके मेरे साथ अपने परमधाम को चलिए, आपका रथ उपस्थित है।’ जिनके समक्ष मृत्यु ऐसी प्रार्थना लेकर उपस्थित होती है, वह बड़भागी होते हैं। ऐसे बड़भागियों को मृत्यु की आहट को पहचानने में देर नही होती और वह उसकी आहट को ही समझकर अपने जीवन व्यापार को समेटने लगते हैं।...और अपने परमधाम की ओर ऐसे चलते हैं जैसे कोई ‘शहंशाह’ जा रहा हो।

आज हमारे मध्य से भी एक ऐसा ही ‘शहंशाह’ चला गया है, जिसका नाम था-अशोक सिंहल। जिसको मृत्यु का भी कोई शोक नही था। जो इस संसार में एक ऐसे ‘मंदिर’ के लिए संघर्ष करता रहा इसके निर्माण को उसने अपना जीवन ध्येय बना लिया था और जिसके माध्यम से वह ‘ग्लोबल विलेज’ को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ में परिवर्तित कर विश्वमानस की गंगा बहा देना चाहता था। कहने का अभिप्राय है कि ‘ग्लोबल विलेज’ में तो विलेज शब्द लगा है जो गांव का प्रतीक है पर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की धारणा इससे भी कहीं अधिक महान और ऊंची है। अशोक जी उसी महान और ऊंची धारा के प्रहरी रहे थे। आज उस महान आत्मा को जो इस जगत में कल तक हमारे मध्य अशोक सिंहल नामक व्यक्ति के शरीर में विराजमान थी-स्व. कहने में भी कष्टï हो रहा है क्योंकि आत्मा स्वर्गीय हो नही सकती और यह शरीर वहां जा नही सकता, पर वह शरीर आज उस अमर आत्मा के साथ एकाकार होकर इस प्रकार हमारी हवाओं में और हमारे देश के वायुमंडल में रच बस गया है कि अब उसे युग-युगों तक हमारा इसी रूप में मार्गदर्शन करना है।

श्री सिंहल जी से मेरी पहली भेंट दिल्ली के कामाख्या मंदिर में विराजे कांची कामकोटिपीठम् के शंकराचार्य जी के पावन सान्निध्य में अब से लगभग पांच वर्ष पूर्व हुई थी। उनका शंकराचार्य जी से गंभीर संवाद चल रहा था। जब मैंने अपना परिचय दिया और उनसे आशीर्वाद लिया तो उन्होंने बड़ी आत्मीयता से जो आशीर्वाद दिया था वह मेरे लिए एक धरोहर बन गया।

आज ‘डायन’ राजनीति को देखिए, जो कल तक उस व्यक्ति को उसके लक्ष्य की प्राप्ति होने में बाधा पहुंचा रही थी, वही राजनीति आज उस व्यक्ति के लिए छाती पीट रही है। जो समाचार पत्र उनके जीवन को किसी और रूप में देखते थे वही समाचार पत्र आज उनके जीवन आदर्शों का गुणगान कर रहे हैं। पर जो अपने थे ही नही उनसे कोई गिला शिकवा हमें नही होना चाहिए। गिला शिकवा का यह समय भी नही है-पर भाजपा को अवश्य अब अंतर्मन्थन करना चाहिए। उसे सोचना चाहिए कि उसने आम चुनाव 2014 के दौरान किये गये अपने उन वायदों का जनाजा स्वयं ही क्यों निकाल दिया जिनको उसने देश में  हिंदुत्व को मजबूत करने के लिए जनता से किया था? अशोक जी जैसी पवित्रात्माओं के साथ छल क्यों किया गया और उनके सपने को उनके जीवन काल में ही पूर्ण क्यों नही किया गया? सत्ता में आते ही भाजपा अपने चुनावी वायदों को भुलाती है और हिन्दुत्व के साथ घातक छल करती है।

अशोक सिंहल विहिप के संरक्षक थे। पर आज उन्हें इससे भी बढक़र ‘मानवता के संरक्षक’ कहने को मन करता है। क्योंकि उनके विचारों में हिंसा नही थी, सर्वमंगल कामना थी वह भारतीय जीवन शैली के उपासक थे और भारतीय संस्कृति एवं धर्म से उन्हें गहरा लगाव था, जिन्हें वह मानवता के कल्याणार्थ समस्त संसार के लिए उपयोगी मानते थे और समस्त संसार की जटिलताओं और सामाजिक विसंगतियों का समाधान भी भारतीय धर्म और संस्कृति की परंपराओं में ही खोजते थे, इसलिए वह हिंदुत्व के उदभट प्रस्तोता थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्री सिंहल के निधन को अपनी व्यक्तिगत क्षति बताया है। यह सच भी है, मोदी उनसे कितने ही अवसरों पर आशीर्वाद लेते रहे। अब श्री मोदी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने संरक्षक को उनके अधूरे कार्यों को पूर्ण करके श्रद्घांजलि दें। उनके पास शक्ति है, सत्ता है, सामथ्र्य है, साहस है और समस्याओं को समझने-सुलझाने की सूझबूझ है। आज भारत का उपवन सूना है, क्योंकि  एक सुर्ख गुलाब शाख से टूट गया है। वह पथिक तो अमर पथ पर चला गया है पर देश की फिजाओं में गमी है, हर दिल कहता है-‘उनकी कमी  है।’ वैसे जीवन उन्हीं का सफल होता है जिनके जाते समय उनके अपने चेहरे पर तो शांति की मुस्कान हो पर संसार के लोगों के चेहरों पर गमी के आंसू हों। जिनके महान कार्यों की एक लंबी सूची हो और जिस पर सभी लोगों को गर्व और गौरव की अनुभूति होती हो। भारत माता अपने आर्यपुत्र को अपने श्री चरणों में स्थान दें। अपनी इन्हीं भावनाओं के साथ समस्त ‘उगता भारत’ परिवार श्री सिंहल जी को अपनी विनम्र श्रद्घांजलि अर्पित करता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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