प्रकृति की पीड़ा

  • 2015-08-06 03:45:37.0
  • विजेंदर सिंह आर्य

मानव मत मदहोश में रह, एक दिन मीनारें भी ढहती।
क्षणभंगुर जीवन की कलिका, धीरे-धीरे मुरझाएगी।

संभवत: सच्चाई जीवन की, तब तेरी समझ में आएगी।
काश! अरे भोले मानव, तू समय रहते हुए चेत।
फिर पछताए होगा क्या, जब चिडिय़ा चुग जाए खेत?

अवसर बीते, तब तू चेते, प्रयास रहे निष्फल।
जीवन बीत रहा पल पल,

अच्छा अवनि तू सांच बता, तेरे कितने बार छिने गहने?
तेरी फसल कटी, तू मौन लुटी, तुझे कितने घाव पड़े सहने?

गोदी में सुरम्य नजारे हैं, कहीं कूहकती कोयल डोलती है।

विजेंदर सिंह आर्य ( 326 )

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