तीर्थों का पुजारी बनूं

  • 2015-11-07 02:34:04.0
  • राकेश कुमार आर्य

महर्षि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं- ‘‘वेदादि सत्य शास्त्रों का पढऩा-पढ़ाना, धार्मिक विद्वानों का संग, परोपकार, धर्मानुष्ठान, योगाभ्यास, निर्वैर, निष्कपट, सत्यभाषण, सत्य का मानना, सत्य करना, ब्रहमचर्य, आचार्य, अतिथि माता-पिता की मानना, परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना, शान्ति, जितेन्द्रियता, सेवा, सुशीलता, धर्मयुक्तपुरुषार्थ ज्ञान, विज्ञान आदि शुभ गुण कर्म, दु:खों से तारने वाले होने से तीर्थ हैं, और जो जलस्थलमय हैं वे तीर्थ कभी नहीं हो सकते। क्योंकि ‘‘जनार्थैस्तरन्ति तानि तीर्थानि’’ अर्थात मनुष्य जिन कार्यों को करके दु:खों से तरे उसका नाम ‘तीर्थ है। जल स्थल तारने वाले नहीं किन्तु डुबाकर मारने वाले हैं। प्रत्युत नौका आदि का नाम तीर्थ हो सकता है, क्योंकि उससे हम समुद्र आदि को तरते हैं।
आज कल लोग किसी नगर, नदी, स्थल, तालाब, सरोवर आदि ऐसे स्थान को ‘तीर्थ’ मानते हैं जहाँ किसी साधु, संन्यासी की, पीर पैगम्बर या सम्प्रदाय के किसी नेता-प्रणेता की समाधि बनी हो या ऐसे किसी नेता प्रणेता का वह नगर या स्थान जन्म स्थल रहा हो, या ऐसे स्थान पर सत्संग (साम्प्रदायिक लोगों का जमावड़ा) होता हो। तीर्थ की यह परिभाषा भ्रामक है, जो हमें तारती नहीं, अपितु संसार के मायामोह में और भी फं साती है। यद्यपि महापुरुषों के जीवन से लोगों को प्रेरणा मिलती है, और वह शुभकर्मों की ओर बढऩे के लिए प्रेरित होता है। लेकिन आजकल जिस भावना से तीर्थयात्रायें की जाती हैं, उनके पीछे कोई स्वार्थपूर्ण उद्देश्य होता है। ये सारी मिथ्या बातें हैं।
यदि महर्षिदयानन्द प्रतिपादित तीर्थ की वास्तविक परिभाषा पर ध्यान दिया जाये तो सबसे पहले तीर्थ तो हमारे माता-पिता हैं जो हमारे भले के लिए अपना जीवन होम कर देते हैं। उनके सेवा सत्कार से हमारे भीतर विनम्रता, सेवाभाव का और दूसरों के प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा होता है। यदि हम माता-पिता के प्रति कृतज्ञ हैं तो ईश्वर के प्रति-आचार्य के प्रति अपने मित्रों, अपने सम्बंधियों के प्रति भी स्वभावत: कृतज्ञ होंगे, और यदि माता-पिता के प्रति कृतज्ञ नहीं हैं, तो किसी के प्रति भी कृतज्ञ हो ही नहीं सकते। गीता में भी कहा गया है कि सन्त महापुरुष ही वास्तविक तीर्थ और देवता हैं, क्योंकि इन संन्त महापुरुषों के दर्शन मात्र से ही कल्याण हो जाता है।
गीता का सन्त महात्माओं के दर्शन मात्र से कल्याण हो जाने का अर्थ है वैदिक विद्वानों का घर में सम्मान होना। ऐसे वैदिक विद्वानों को ही अतिथि कहा गया है जो संसार के कल्याणार्थ घर बार को त्यागकर निकले हों और संसार का उद्धार करना चाहते हों।
आजकल माता-पिता के प्रति उपेक्षा का भाव मिलता है, गुरू और शिष्य के बीच में ‘ट्यूशन’ और कक्षा में उत्तीर्ण होना एक स्वार्थ बनकर आ खड़ा हुआ है। इसलिए माता-पिता और गुरू तीर्थ नहीं माने जा रहे हैं। माता-पिता से अपने ऊपर खर्च कराना सन्तान अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती है। हर जगह पर ‘स्वार्थ’ की दीमक लग गयी है, और लोग घुन लगी हुई लकड़ी बन गये हैं।
maharshi dayanand saraswati
सिसरो ने कहा है कि कृतज्ञता सभी गुणों की खान है। जबकि लेसिंग का कथन है कि स्वर्ग की ओर कृतज्ञता पूर्ण भावना स्वयं ही एक प्रार्थना है। वो लोग कृतघ्न होते हैं जो दूसरों के उपकारों को याद नहीं रखते हैं।
कृतघ्न कबहुँ न मानहि कोटी करै जो कोय।
सर्वस आगे राखिये तऊ न अपनो होय।।
भारत में तीर्थों के प्रति आस्था लोगों में कृतज्ञता की देन है, कई लोगों में देखा गया है कि वह किसी व्यक्ति विशेष के संसर्ग में आने पर पाप कर्म से छूट गया, तो उसने अपने साथी को गुरू मान लिया। साथी के साथ लगकर उसके किसी साम्प्रदायिक गुरू के जन्मस्थल या समाधिस्थल पर गया। संयोग से उसका कोई बिगड़ा हुआ काम सुधर गया। बस, यहाँ से पैदा हो गयी कृतज्ञता और लग गया अपने गुरू के प्रचार में। ऐसा एक व्यक्ति ही सौ व्यक्तियों को ऐसे गुरू के तीर्थ पर पहुँचाने का कारण बन जाता है। ऐसी कृतज्ञता को लोग अपने स्वार्थ में पैदा कराते हैं। ऐसी कृतज्ञता ‘कृतज्ञ’ व्यक्ति के प्रति छल है। उसे किसी अपने सम्प्रदाय के प्रति आकर्षित करने के लिए तथा अपने किसी ‘गुरू’ के प्रति आस्थावान बनाने का एक प्रपंच हैं, जिसमें लोग बड़ी सरलता से फँ स जाते हैं।
हमें तीर्थ की सात्विकता पर विचार करना चाहिए। जैसा कि महर्षि दयानन्दजी महाराज ने आर्योद्देश्यरत्नमाला में लिखा है-‘‘जितने विद्याभ्यास, सुविचार, ईश्वरोपासना, धर्मानुष्ठान, सत्य का संग, विद्याभ्यास, सुविचार, ईश्वरोपासना, धर्मानुष्ठान, सत्य का संग, ब्रहमचर्य जितेन्द्रिय आदि उत्तम कर्म हैं, वे सब तीर्थ कहाते हैं, ब्रहमचर्य जितेन्द्रिय आदि उत्तम कर्म हैं, वे सब तीर्थ कहाते हैं, क्योंकि इन्हीं से जीव दु:खसागर से तर सकते हैं।’’
मनुष्य के लिए उत्तम मार्ग है सरलता से कठिन की ओर बढऩा। बच्चा पहले क, ख, ग सीखता है तब शब्दों की आकृति बनाना सीखता है, और उसके पश्चात भाषाज्ञान करता है। पश्चात् बड़ी-बड़ी शैक्षणिक उपाधियाँ प्राप्त करता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि उपाधियाँ पहले आ जायें और क, ख, ग को उसके पश्चात में सीखा जाये। लेकिन व्यवहार में मनुष्य ऐसा ही प्रयास करता है। वह शीघ्र ही पूरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए लालायित रहता है। विद्याभ्यास करना तो उस के लिए एक जटिल प्रक्रिया है, इसलिए व्यक्ति इस जटिल प्रक्रिया को छोडक़र सरल सी प्रक्रिया को अपनाता है, और सरल प्रक्रिया किसी ‘तीर्थ’ स्थान की यात्रा कर लेने से अधिक कुछ नहीं हो सकती। इसलिए संसार के प्रत्येक मजहब में तीर्थयात्रायें होती हैं।
सद्ग्रन्थों का अध्ययन, विद्याभ्यास आदि लोगों ने छोड़ दिये हैं। पूरे वर्ष धन के कीड़े बनकर कमाते हैं, और एकाध बार कहीं माता के दरबार में, या गुरू की समाधि पर जाकर थोड़ा सा प्रसाद चढ़ाकर लौट आते हैं। कहते हैं तीर्थ करके आया हूँ। एक बहुत बड़ा पुरुषार्थपूर्ण कार्य हमारे लिए एक चुनौती बना खड़ा है कि हम राष्ट्र को तीर्थ बना दें। बाहर के लोग भारत की पावन धरती को छूते ही नमन करें। इसके लिए झुकें और इसका वन्दन अभिनन्दन करें कि मैं धन्य हो गया, मेरा जीवन धन्य हो गया जो ऐसी पावन धरती पर मेरे पग पड़ गये हैं। पर स्मरण रहे कि ऐसी स्थिति किसी देश के लिए तभी बन सकती है जब उस देश के निवासियों में संस्कारों की प्रबलता होती है।
प्राचीनकाल में भारत के प्रति विदेशी लोगों की ऐसी सोच रही है, तो उसका कारण यही था कि उस समय भारत में जितेन्द्रियतादि शुभगुणों के धारण करने वाले लोगों का प्राबल्य था। सुसंस्कार शुभगुणों को धारण करने से आते हैं, और शुभगुण विद्याभ्यास करने से आते हैं। उससे राष्ट्र के निवासियों का राष्ट्रीय चरित्र बनता है, और लोग छल, कपट, झूठ, अन्याय ओर पाखण्ड को छोडक़र उचित मार्ग के अनुगामी बन चलते हैं। राष्ट्र में देवताओं का वास हो जाता है। हमारे यहाँ तैंतीस करोड़ देवताओं की जो परिकल्पना की गयी है, वो उस समय की बात है जब आर्यावत्र्त की कुल जनसंख्या तैंतीस करोड़ हुआ करती थी। कहने का अभिप्राय ये है कि उस समय पूरा राष्ट्र ही देवताओं का था। इसलिए सब एक दूसरे की पूजा करते थे। लोग स्वभावत: एक दूसरे के दु:ख में सम्मिलित होते थे और न केवल सम्मिलित होते थे, अपितु एक-दूसरे के दु:ख दर्द को मिल-जुलकर बाँटते थे। आज भी हमें उसी परिवेश के निर्माण की आवश्यकता है। राष्ट्र की प्रगति के लिए और उन्नति के लिए हमें तीर्थों का उपासक बनना चाहिए। परन्तु यह ध्यान रखना पड़ेगा कि वास्तविक तीर्थों के उपासक ही बनें। क्योंकि साम्प्रदायिक लोगों के तीर्थं हमें साम्प्रदायिक बनाते हैं, हमारी सोच को अवरूद्ध कर संकीर्ण बनाते हैं, जबकि विद्याभ्यासादि का तीर्थ हमारे दृष्टिकोण को विस्तार देता है, विशाल बनाता हैं। हमें विशालता का पुजारी होना चाहिए। इसलिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हमें संस्कारों के निर्माण करने के लिए अपनी सामूहिक प्रार्थना में तीर्थों की सच्ची पूजा करने को भी स्थान देना चाहिए। तीर्थ हमें भवसागर से तारते हैं और उन्नत राष्ट्र के निर्माण में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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