टीपू विवाद आखिर किस तरह देश हित में है ?

  • 2015-11-19 10:00:40.0
  • शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कर्नाटक की कांग्रेस शासित सरकार 10 नवंबर से टीपू सुल्तान की जयंती मना रही है। बीजेपी के अलावा वीएचपी और बजरंग दल जैसे हिंदू संगठन इसके खिलाफ हैं। इतिहास में टीपू सुल्तान को अंग्रेजों के खिलाफ लडऩे वाले एक मजबूत राजा के तौर पर जाना जाता है लेकिन हिंदू संगठन उसे एक क्रूर शासक मानते हैं। टीपू पर लाखों हिंदुओं के धर्मपरिवर्तन एवं हिंदू मंदिरों तथा ईसाइयों के गिरजाघरों को तोडऩे का आरोप लगाया जा रहा है। इस विवाद के मूल में फ्रीडम स्ट्रगल इन केरला नामक संकलन है। सरदार के एम पणिक्कर का नाम लेकर कुछ हिन्दू संगठन कुछ इस तरह अपना नफऱत अभियान चला रहे हैं जो सोशल मीडिया पर भी वायरल किया है – टीपू सुलतान को हमारे इतिहास में एक प्रजावत्सल राजा के रूप में दर्शाया गया है। टीपू ने अपने राज्य में लगभग 5 लाख हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया। लाखों की संख्या में कत्ल कराये। कुछ एतिहासिक तथ्य मेरे पास उपलब्ध हैं जिनसे टीपू के दानवी हृदय का पता चलता है। टीपू के शब्दों में यदि सारी दुनिया भी मुझे मिल जाए, तब भी मैं हिंदू मंदिरों को नष्ट करने से नहीं रुकूंगा-(फ्रीडम स्ट्रगल इन केरल)। आश्चर्य की बात यह है कि पणिक्कर विद्वान साहित्यकार और लेखक थे तथा एक अच्छे प्रशासक भी थे उन्होंने अंग्रेजों से लेकर कांग्रेस के शासन में देश-विदेश में कई महत्त्वपूर्ण जगहों पर कार्य किया था। न तो उनकी विचारधारा हिंदूवादी थी न ही बहुत ढूंढने के बावजूद मुझे उनका कोई ऐसा लेख या टिप्पणी देखने को मिली। अलबत्ता ‘फ्रीडम स्ट्रगल इन केरल’ में रवि वर्मा के नाम से एक लेख प्रकाशित किया है ‘टीपू सुल्तान एज नोन इन केरला’ जिसमें इस तरह के विचार अवश्य शामिल हैं जिसमें टीपू को एक क्रूर, कट्टर और धर्मांध मुसलमान बताया गया है। इसमें बहुत से संदर्भ हैं जिनमें प्रमुख स्रोत है मलाबार के तत्कालीन कलेक्टर विलियम लोगन का सरकारी संकलन ‘मलाबार मैनुएल’। विलियम लोगन स्वयं एक बेहद असहिष्णु और भारतीयों से नफऱत करने वाला अंग्रेज था। एक और बात जो प्रचारित की जा रही है वह है कि – दी मैसूर गजेतिअर में लिखा है – टीपू ने लगभग 1000 मंदिरों का ध्वस्त किया। 22 मार्च 1727 को टीपू ने अपने एक सेनानायक अब्दुल कादिर को एक पत्र लिखा की 12000 से अधिक हिंदू मुसलमान बना दिए गए। ध्यान देने की बात है कि टीपू का जन्म ही 1750 ईसवीं में हुआ था तब 1727 में पत्र कैसे लिखना संभव था। फिर कहा गया कि 14 दिसम्बर 1790 को उसने अपने सेनानायकों को पत्र लिखा कि मैं तुम्हारे पास मीर हुसैन के साथ दो अनुयाई भेज रहा हूँ उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बंदी बना लेना और 20 वर्ष से कम आयु वालों को कारागार में रख लेना और शेष सभी को पेड़ से लटकाकर वध कर देना और भी कि टीपू ने अपनी तलवार पर भी खुदवाया था मेरे मालिक मेरी सहायता कर कि, मैं संसार से काफिरों (गैर मुसलमान) को समाप्त कर दूँ। ऐसे कितने और ऐतिहासिक तथ्य टीपू सुलतान को एक मतान्ध, निर्दयी, हिन्दुओं का संहारक साबित करते हैं क्या ये हिन्दू समाज के साथ अन्याय नही है कि, हिन्दुओं के हत्यारे को हिन्दू समाज के सामने ही एक वीर देशभक्त राजा बताया जाता है ? यहां ध्यान देने की बात है कि सुल्तान अंग्रेजों के सामने हार नहीं मान रहा था जबकि मराठों की संधि अंग्रेजों से बनी हुई थी। मराठे टीपू से परास्त हुए थे इसलिए वे उसके शत्रु थे। अंग्रेज भारत के स्वतंत्रता संग्राम को हर कीमत पर कमजोर करना चाहते थे इसलिए उन्होंने ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाई थी। लेकिन तब भी ऐसा कुछ मैसूर गजेतिअर में दिखाई नहीं देता। अब एक दूसरा पक्ष भी है। उड़ीसा के भूतपूर्व राज्यपाल, राज्यसभा के पूर्व सदस्य और इतिहासकार प्रो. विशम्भरनाथ पाण्डेय ने अपने अभिभाषण और लेखन में कुछ ऐतिहासिक तथ्यों और वृतान्तों को उजागर किया है। उन्हीं के शब्दों में ‘‘कुछ मैं ऐसे उदाहरण पेश करता हूं, जिनसे यह स्पष्ट हो जायेगा कि ऐतिहासिक तथ्यों को कैसे विकृत किया जाता है। जब मैं इलाहाबाद में 1928 ई0 में टीपू सुल्तान के सम्बन्ध मे रिसर्च कर रहा था, तो ऐंग्लो-बंगाली कालेज के छात्र-संगठन के कुछ पदाधिकारी मेरे पास आए और ‘हिस्ट्री-एसोसिएशन’ का उद्घाटन करने के लिए मुझको आमंत्रित किया। ये लोग कालेज से सीधे मेरे पास आए थे। उनके हाथों में कोर्स की किताबें भी थीं, संयोगवश मेरी निगाह उनकी इतिहास की किताब पर पड़ी। मैने टीपू सुल्तान से संबंधित अध्याय खोला तो मुझे जिस वाक्य ने बहुत ज्यादा आश्चर्य में डाल दिया वह यह था ‘‘तीन हजार ब्राह्मणों ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि टीपू उन्हें ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना चाहता था।’’। इस पाठ्य-पुस्तक के लेखक महामहोपाध्याय डा. हरप्रसाद शास्त्री थे जो कलकत्ता विश्वविद्यालय में संस्कृत के विभागाध्यक्ष थे। मैने तुरन्त डा. शास्त्री को लिखा कि उन्होंने टीपू सुल्तान के सम्बन्ध में उपरोक्त वाक्य किस आधार पर और किस हवाले से लिखा है। कई पत्र लिखने के बाद उनका यह जवाब मिला कि उन्होंने यह घटना ‘गजेटियर’ से उद्धृत की है। मैसूर गजेटियर न तो इलाहाबाद में और न ही इम्पीरियल लाइब्रेरी, कलकत्ता में प्राप्त हो सका। तब मैने मैसूर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति सर बृजेन्द्र नाथ सील को लिखा कि डा. शास्त्री ने जो बात कही है, उसके बारे में जानकारी दें। उन्होंने मेरा पत्र प्रोफेसर श्री कन्टइया के पास भेज दिया जो उस समय मैसूर गजेटियर का नया संस्करण तैयार कर रहे थे। प्रोफेसर श्री कन्टइया ने मुझे लिखा कि तीन हजार ब्राह्मणों की आत्महत्या की घटना ‘‘मैसूर गजेटियर’’ में नहीं है, और मैसूर के इतिहास के एक विद्यार्थी की हैसियत से उन्हें इस बात का पूरा यकीन है कि इस प्रकार की कोई घटना घटी ही नही हैं। उन्होंने मुझे सूचित किया कि टीपू सुल्तान के प्रधानमंत्री पुनैया नामक एक ब्राह्मण थे और उनके सेनापति भी एक ब्राह्मण कृष्णराव थे। उन्होंने मुझको ऐसे 156 मंदिरों की सूची भी भेजी जिन्हें टीपू सुल्तान वार्षिक अनुदान दिया करते थे। उन्होंने टीपू सुल्तान के तीस पत्रों की फोटो कापियां भी भेजीं जो उन्होने श्रृंगेरी मठ के जगदगुरू शंकरचार्य को लिखे थे और जिनके साथ सुल्तान के अति घनिष्ठ मैत्री सम्बन्ध थे। मैसूर के राजाओं की परम्परा के अनुसार टीपू सुल्तान प्रतिदिन नाश्ता करने से पहले रंगनाथ जी के मंदिर में जाते थे, जो श्रीरंगापटन के किले मे था।

शैलेन्द्र चौहान ( 10 )

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