तप, दीक्षा और राष्ट्र-भाग-2

  • 2015-11-04 02:30:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

300px-India_flagयदि तप और दीक्षा के गुण शासकों में भी नहीं रह पाते हैं, तो जनता अयोग्य शासकों को हटाने के लिए आगे आती है और एकनिष्ठ होकर कत्र्तव्य का पालन करने वाली शासन प्रणाली का या शासक का चयन करती है। संसार के इतिहास में जितनी भी क्रान्तियां हुई हैं उनका मूल कारण वहां के शासक वर्ग में अपने कत्र्तव्य के प्रति आयी असावधानी की भावना ही रही है।

‘काकोरी केस’ की सुनवाई के समय क्रान्तिकारियों के खिलाफ पं0 जवाहरलाल नेहरू के सगे साले जगतनारायण मुल्ला अधिवक्ता थे। मुल्ला उनका दूसरा नाम था। बहस के समय जगतनारायण मुल्ला की वाणी से काकोरी केस के अभियुक्तों के लिए ‘मुल्जिम’ की बजाय मुलाजिम (सरकारी सेवक) शब्द निकल गया।

देशभक्ति की जिन्दा मिसाल बने खड़े पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के लिए यह ‘मुलाजिम’ शब्द बड़ा असहनीय हो गया। वह सपने में भी ब्रिटिश सरकार के ‘मुलाजिम’ होना पसन्द नहीं करते थे। इसलिए उनके तन बदन में आग लग गयी। उन्होंने भरी अदालत में मुल्ला को अपनी बात कहने से रोक दिया और उन्हें तडक़कर कहा-

मुलाजिम हम को मत कहिए बड़ा अफ सोस होता है।
अदालत के अदब से हम यहाँ तशरीफ  लाये हैं।।
पलट देते हैं हम मौजे हवादिस को अपनी जुअत से।
कि हमने आंधियों में भी चिराग अक्सर जलाये हैं।।

मुल्ला को अपनी बात पर खेद व्यक्त करना पड़ा। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल की देशभक्ति की भावना और उनके रोम-रोम में बसे राष्ट्रवाद को देखकर लोग दंग रह गये।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस नहीं चाहते थे कि वे आई0 सी0 एस0 की परीक्षा में बैठें। उनकी इच्छा थी कि पूर्ण यौवन देश के नाम कर दिया जाये। भारतीयों के लिए अपने अंग्रेज अध्यापक के मुंह से अपशब्द सुनकर उसे थप्पड़ मारने वाले सुभाष के लिए यौवन देश सेवा का निमंत्रण लेकर आया था। वह उस निमंत्रण पर पुत्र को भेजना नहीं चाहते थे। इसलिए आई0 सी0 एस0 की परीक्षा से पीछे हटते सुभाष के स्वाभिमान को जगाते हुए पिता ने व्यंग्य किया कि तुम इस परीक्षा में इसलिए नहीं बैठना चाहते हो कि तुम्हें अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं है। स्वाभिमानी सुभाष को पिता की बात लग गयी, इसलिए उन्होंने पूर्ण मनोयोग से दिन रात अध्यापन कर आई0 सी0 एस0 की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। उनको अंग्रेजों ने अपनी नौकरी दी।

परन्तु राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत प्रोत सुभाष ने बड़े कड़े शब्दों में अंग्रेजों की सेवा त्याग दी और चल पड़े देश भक्ति के मार्ग पर। उनके जीवन ने लाखों, करोड़ों लोगों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाया और भारत को आजाद कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

‘राष्ट्रं पिपृहि सौभगाय’- यह वेद की आज्ञा है। यहाँ हमें वेद आदेशित कर रहा है कि हम राष्ट्र की समृद्धि के लिए सदा प्रयत्नशील रहें। अपने एकनिष्ठ कत्र्तव्य राष्ट्रोत्थान के प्रति कभी प्रयत्नशील रहें। यदि हम प्रमादी न बन जायें’’। यदि बन गये, सो गये, या थककर बैठ गये- तो खरगोश और कछुवा वाली कहावत चरितार्थ हो सकती है। खरगोश अपनी तेज चाल पर घमण्ड करता था, इसलिए सो गया था और कछुवा धीरे-धीरे चलता-चलता उस खरगोश से पहले अपने गंतव्य पर पहुंच गया और प्रतियोगिता में विजयी हो गया।

वैदिक संस्कृति के आगे इस्लाम और ईसाईयत कछुवे हैं। जब वैदिक संस्कृति के ध्वजवाहकों को आलस्य और प्रमाद ने आकर घेरा तो (देश के विषय में ये कहना कि ये सो गया था, तो हम उचित नहीं मानते, परन्तु) परिणाम बड़े निराशाजनक निकले, इसलिए जागते रहना है। इसलिए वेद (ऋ ग0 5-44-14) का कहना है-

‘‘यो जागार तमृच: कामयन्ते।’’ अर्थात जो जागता है, जो अपने एकनिष्ठ कत्र्तव्य के प्रति समर्पित है, जो तपस्वी है जिसका जीवन धर्मपालन (दीक्षा) में लगा हुआ है, ऋ चाऐं उसी की कामना करती हैं। कहने का अभिप्राय है कि वेद का ज्ञान उसी का मार्गदर्शन करता है जो जागृत है, जो सोया नहीं है। जिसने अपने ज्ञान को तकिया के नीचे रखकर सोने का अभ्यास नहीं किया है- अपितु उसे सदा ही अपने समक्ष रखा है और सोते में भी अपने मन को जो सदा ‘शिव संकल्प’ वाला बनाये रखने की प्रार्थना करता है, उसे ही वेद ज्ञान मार्ग दिखाता है। ऋ ग्वेद (4/33/11) में आया है कि ‘‘न ऋ ते श्रान्तस्य सख्याय देवा।’’ अर्थात जो श्रम से थककर चूर नहीं हो जाते, देव उनके मित्र नहीं बनते। इसका अभिप्राय भी यही है कि राष्ट्र के उत्थान के लिये तप और दीक्षा के उद्योग में कहीं प्रमाद नहीं करना है। स्वामी विवेकानन्द इसलिए भारतवासियों से आहवान किया करते थे कि कुछ समय के लिए सारे देवों की उपासना छोडक़र एक ‘राष्ट्रदेव’ की उपासना में लग जाओ। उनके आहवान का अनुकूल प्रभाव भारतीयों पर पड़ा और सारा राष्ट्र उठ खड़ा हुआ। भारत माँ की विशाल प्रतिमा की पूजा करने लगा। बोलने लगा, गाने लगा कि राष्ट्रदेव की जय, भारत माता की जय, वन्देमातरम।

महाराणा प्रताप का जब अन्तिम समय आया तो कई दिन वे मृत्यु शैय्या पर पड़े रहे। बड़ा कष्ट उन्हें हो रहा था। पर प्राण थे कि शरीर से निकल नहीं रहे थे। तब उनके सभी दरबारियों ने करबद्ध होकर उनसे निवेदन किया कि महाराज आपका जीवन सदा ही लोक कल्याण के लिए समर्पित रहा है। आपने सदा ही देशोत्थान के लिए कठिन यातनायें सही हैं, असीम कष्टों को झेला है, आपका जीवन बड़ा ही पुण्यमयी और प्रेरणास्पद रहा है, ऐसे में क्या बात है कि आपको जीवन और मृत्यु की लड़ाई इतनी वेदना के साथ देखनी या झेलनी पड़ रही है,  आपके प्राण अन्तत: किस चिन्ता में अटके पड़े हैं?’’

तब महाराणा ने अपने दरबारियों को बड़े ही प्रेम से अन्तिम बार देखने का प्रयास किया और अपनी पीड़ा को उन्हें बताया। महाराणा ने कहा कि ‘‘उनका पुत्र अमरसिंह एक बार झोपड़ी से बाहर निकल रहा था, तो उसकी पगड़ी झोपड़ी के बांस में अटक कर नीचे गिर गयी, तब उसे इतना क्रोध आया कि उसने अपनी तलवार से झोपड़ी के बांस को ही काट डाला। उस दृश्य ने मुझे दु:खी कर रखा है। मै मानता हूँ कि अमरसिंह देश के लिए इतने कष्ट नहीं उठा पायेगा, जितने हमने उठाये हैं और तब मेरा सारा परिश्रम व्यर्थ ही चला जायेगा।

हिन्दुत्व की अमर गौरवगाथा का प्रतीक बना मेरा मेवाड़ मेरे पश्चात मुगलों के सुपुर्द हो सकता है। क्योंकि अमरसिंह प्रमादी है, इसमें वैभवपूर्ण जीवन के जीने की अभिलाषा है। बस ये ही बात है जो मुझे चैन से मरने नहीं दे रही है।’’ बात सुनते ही सभी दरबारियों ने अपनी अपनी तलवारें म्यान से बाहर निकाल लीं और महाराणा के सामने सौगन्ध उठायी कि महाराणा जब तक हम जीवित हैं तब तक अपने अमरसिंह को अकबर के सामने झुकाकर भारत के गौरव का विक्रय नहीं करने देंगे, आप बिना कष्ट के प्राणत्याग कर दो, हम आपके सम्मान को रूकने नहीं देंगे और आपकी यश पताका को झुकने नहीं देंगे।

अपने सामन्तों की इस प्रकार की सौगन्ध पर विश्वास करते हुए महाराणा ने प्राण त्याग दिये। इस दृश्य को उर्दू शायर जैमिनी सोनीपती ने इन शब्दों में बांधने का प्रयास किया है:-

कितना इबरतखेज है मंजर जमाने के लिए।
मौत मीठी नींद आयी है, सुलाने के लिए।।
जमा हैं अहबाब और सबको कफ न की फि क्र है।
मरने वाले को मगर अब भी वतन की फि क्र है।।

सचमुच, जिनके रोम-रोम में राष्ट्र बस जाता है, उन वीरों का जीवन सबके लिए आदर्श बन जाता है। भारत के इतिहास में ऐसे हजारों प्रसंग हैं, जिनसे प्रेरणा ली जा सकती है और राष्ट्र जागरण के अपने पुनीत संस्कार को समझा जा सकता है। उन सभी महामानवों को, दिव्यात्माओं को प्रातरस्मरणीय देवों को हमारा कोटिश: नमन जिन्होंने देश के जागरण के लिए अपने जीवन होम किये या अपने सत्कृत्यों से उदाहरण प्रस्तुत किया।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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