तनाव को कम करती एक पहल

  • 2016-01-15 02:35:02.0
  • राकेश कुमार आर्य

पठानकोट की घटना के पश्चात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपेक्षाकृत शांत थे, उनका मौन कुछ बोल रहा था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इस घटना के पश्चात सक्रिय थे, उनकी सक्रियता कुछ बोल रही थी। इसी समय अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा स्पष्ट कह रहे थे कि पाकिस्तान आतंकियों के लिए एक ‘जन्नत’ बन चुका है। इन तीनों राष्ट्र प्रमुखों के इन तेवरों का परिणाम यह रहा कि आतंकी संगठन जैश-ए-मौहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिया गया।

प्रधानमंत्री मोदी का शांत रहना और नवाज शरीफ का सक्रिय होना स्पष्ट कर रहा था कि दोनों नेताओं में पारस्परिक समझ-बूझ बढ़ी है, दोनों का एक दूसरे पर विश्वास बढ़ा है। यह स्थिति दोनों देशों के लिए ही नही विश्वशांति के लिए भी आवश्यक है, जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पिछले वर्ष के अंत में हुई पाकिस्तान यात्रा का शुभ परिणाम माना जा सकता है। नवाज शरीफ और उनके अपने साथी यह भलीभांति जानते थे कि भारत अब आतंकवादी गतिविधियों को सहन करने की स्थिति में नही है, और यदि इस बार उन्होंने भारत को भ्रमित करने का प्रयास किया तो भयंकर युद्घ की स्थिति दोनों देशों के मध्य आ सकती है। वह यह  भी जानते थे कि युद्घ में यदि पाकिस्तान ने परमाणु बम का प्रयोग कर दिया तो पाकिस्तान चाहे एक बार भारत को ‘बड़ी चोट’ पहुंचाने में सफल हो जाए, पर उसके पश्चात उसका तो अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसलिए शांति की चाह में नवाज शरीफ आगे बढ़े। उनको पसीना आ रहे थे, और उनकी इस बात के लिए प्रशंसा करनी पड़ेगी कि वह एक अनचाहे युद्घ से भारतीय उपमहाद्घीप को बचाने में वत्र्तमान परिस्थतियों में तो सफल हो ही गये हैं। मसूद अजहर को पाकिस्तानी सेना का वरदहस्त प्राप्त रहा है, इसलिए वह भारत के विरूद्घ अघोषित युद्घ का मुखिया बन चुका था। उसके हौंसले बढ़ते ही जा रहे थे, और उसे लगने लगा था कि उस पर हाथ डालना किसी के वश की बात नही है। पाकिस्तान में सेना की मजबूत स्थिति से सभी परिचित हैं, उसकी सहमति के बिना वहां की सरकार भी कोई निर्णय नही ले सकती। ऐसी परिस्थितियों में मसूद अजहर पर हाथ डालना हर किसी के वश की बात नही थी। यह वही अजहर है जिसे अटल सरकार के समय 1999 में कंधार विमान अपहरण काण्ड के बाद भारत को रिहा करना पड़ा था। तब से वह भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों में व्यस्त रहा है। इस प्रकार के आतंकवादी पर हाथ डालकर नवाज शरीफ ने वर्तमान में तो दिखाया ही है कि वह दिल से युद्घ के पक्षधर नही हैं, और दक्षिण एशिया में स्थायी शांति की दिशा में कुछ करना चाहते हैं।
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वैसे प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के लिए पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष राहिल शरीफ का बढ़ता कद भी चिंता का कारण बनता जा रहा था। राहिल पाकिस्तान में ‘भारत विरोधी’ के रूप में लोकप्रिय होते जा रहे थे। उनकी लोकप्रियता शरीफ के लिए कोई भी गुल खिला सकती थी। भारत-पाकिस्तान में एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का पक्षधर है। भारत में मोदी के प्रधानमंत्री रहते राहिल ‘सत्ता पलट’ की कार्यवाही को बहुत शीघ्र नही कर सकते हैं। वह ऐसा करने से पहले कई बार सोचेंगे।  विशेषत: तब जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी पाकिस्तान को आतंकियों के लिए ‘जन्नत’ बता रहे हों। ओबामा की यह भाषा मोदी की दोस्ती के पश्चात परिवर्तित हुई है और ऐसी ही भाषा विश्व के अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों या शासन प्रमुखों की बनी है। इस प्रकार भारत के सक्षम नेतृत्व ने दक्षिण एशिया में किसी नये तानाशाह के उभरने या पनपने की परिस्थितियों पर रोक लगा दी है। इसलिए पाकिस्तान में नवाज शरीफ को खुलकर कार्य करने की परिस्थितियां उपलब्ध हुई हैं। यह मोदी की विदेश नीति की सफलता का सुखद परिणाम है कि बिना युद्घ किये ही एक युद्घ जीत लिया गया है। पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहली बार स्वयं ही नंगा हो गया है और मसूद को गिरफ्तार करके उसने एक प्रकार से यह मान लिया है कि उसकी ओर से गलती हुई है। यह आवश्यक नही है कि युद्घ ही किसी समस्या का समाधान है। आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति और सक्षम नेतृत्व के गुण ही समस्याओं के समाधान दिया करते हैं। मोदी की उपस्थिति ने ही स्पष्ट कर दिया है कि भारत के नेतृत्व में ये सभी गुण हैं। उनके पठानकोट की घटना पर मौन साधने की प्रक्रिया ने समस्या का समाधान दिया है। अमेरिका की ओर से पूर्व से ही यह संकेत दिये जा रहे थे कि यदि पाकिस्तान ने अबकी बार कोई आतंकी घटना भारत के विरूद्घ की तो भारत इस बार प्रतिशोध की कार्यवाही करेगा।

पाकिस्तान ने जो कुछ किया है, उस पर यह मान लेना कि युद्घ अब बीते दिनों की बात हो गया है, या अब भारत को किसी प्रकार की चुनौतियों का सामना भविष्य में नही करना पड़ेगा-एक भूल ही होगी। पर विश्व इस समय जिस प्रकार की उमस और तपिश भरी परिस्थितियों में जी रहा है उनमें युद्घ को चार कदम पीछे धकेल देना भी अच्छा ही कहा जाएगा। युद्घ से पूर्व शांति के हर उपाय पर विचार करना चाहिए। क्योंकियुद्घ केवल उन्मादी मानसिकता में ही उपजा करता है। हमारा यह भी मानना है कि जब विश्व बारूद के महाविनाशकारी ढेर पर बैठा हो तब इस बात की बहुत संभावना है कि उस बारूद का प्रयोग भी कभी न कभी होगा ही। जिससे यह हंसती खेलती दुनिया महाविनाश के अंधकार में विलीन हो जाएगी। बड़ी समझबूझ से इस समय वैश्विक तनाव को एक-एक कदम दूर करने में कुछ विश्व नेता लगे हुए हैं। यह सौभाग्य की बात है कि भारत अपने पीएम के माध्यम से इस दिशा में विशेष कार्य कर रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वह ‘विश्व नेता’ के रूप में आगे बढऩे की नेहरू परंपरा का निर्वाह तो भले ही करें पर नेहरू जी की भांति कहीं भी राष्ट्रहितों को उपेक्षित न कर दें। हम 1962 को दोहराने के लिए तैयार नही हैं। हां, मोदी 1965, 1971 और 1999 को चाहे जितनी बार दोहराएं।

हमें सावधान रहना होगा। नवाज शरीफ को असफल करने के लिए उनके ही देश में चालें चली जाएंगी। उनके लिए प्राणों का संकट भी आ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में वह अजहर को या तो मुक्त कर सकते हैं, या उसे शाही मेहमान के रूप में अपनी जेल में रख सकते हैं। इसलिए इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें याद रखना होगा कि ‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ वाली कहावत कभी भी चरितार्थ हो सकती है। अत: प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का नैतिक समर्थन करते हुए उनके मनोबल को बढ़ाये रखकर अपने हितों की रक्षा करने की आवश्यकता है। पठानकोट के शहीदों को नमन।

राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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