सुविधाभोगी लोकतंत्र और नये राज्यों की स्थापना

  • 2016-05-11 03:29:50.0
  • राकेश कुमार आर्य

loktantra

9 नवंबर 2000 को उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश का विभाजन करके अलग प्रदेश बनाया गया। इस प्रदेश के लोगों को अपने उच्च न्यायालय के लिए इलाहाबाद भागना पड़ता था और राजधानी लखनऊ भी इनसे बहुत दूर थी। इलाहाबाद का उच्च न्यायालय एक कोने में है। जिसे कभी अंग्रेजों ने दिल्ली हावड़ा रेलमार्ग पर अपनी सुविधा के दृष्टिगत स्थापित किया था कि यदि यहां से किसी जज को दिल्ली या कलकत्ता जाना हो तो वह आराम से यात्रा कर सके और किसी उपद्रव या विद्रोह की स्थिति में यहां से अंग्रेज अधिकारी या जज आराम से भाग जाएं या उनकी प्राणरक्षा के लिए शीघ्रातिशीघ्र अंग्रेज सेना भेजी जा सके।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की स्थापना के समय उत्तर प्रदेश आगरा और अवध दो प्रांतों में विभक्त था। जिसे बाद में अंग्रेजों ने एक साथ कर दिया, और दोनों प्रांतों को मिलाकर 1901 में संयुक्त प्रांत बनाया गया। इस संयुक्त प्रांत को अंग्रेजी में यूनाइटेड प्रोविंस कहा जाता था। उसका संक्षिप्त स्वरूप भी यूपी ही बनता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 1950 में इस प्रांत का नाम यूनाइटेड प्रोविन्स से बदलकर उत्तर प्रदेश किया गया। इस उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय अंग्रेजों ने अवध प्रांत में इलाहाबाद में बनाया था। यही उच्च न्यायालय आगरा प्रांत के लोगों के वादों को भी सुनता था। उस समय लोगों में वाद विवाद बहुत कम थे और उन्हें भी लोग अक्सर अपनी पंचायतों के माध्यम से सुलझा लेते थे। अंग्रेजों ने अपने न्यायालय 1857 की क्रांति में भाग लेने वाले भारतीयों को फांसी पर चढ़ाने के लिए स्थापित किये थे, अपने कानून भी उन्होंने इसी लिए लागू किये थे। क्योंकि भारत का कानून तो हमारे देशभक्तों को देशभक्त कहता था और छोड़ देता था, उन्हें किसी विद्रोह में भाग लेने पर फांसी नही देता था, इसलिए अंग्रेजों ने अपने न्यायालय स्थापित किये, उन्हीं में से एक था इलाहाबाद उच्च न्यायालय।

अंग्रेजों ने भारतीय लोगों के पंचायती निर्णयों पर पूर्णत: प्रतिबंध लगा दिया था और वे इन पंचायतों का बहिष्कार करते थे। क्योंकि ये पंचायतें अंग्रेजों को फिरंगी मानती थीं और उनके विरूद्घ निर्णय देती थीं। इसका प्रतिकार करते हुए भारतीयों ने भी अंग्रेजी न्यायालयों का बहिष्कार करने की नीति का अनुकरण किया। उन्होंने अपनी समानांतर न्याय व्यवस्था लागू रखी। यही कारण था कि भारत के लोगों के वाद उस समय अंग्रेजी न्यायालयों में नही जाते थे। धीरे-धीरे अंग्रेजी पढ़े लिखे भारतीय अंग्रेजों ने अंग्रेजी न्यायालयों को मान्यता देनी आरंभ की। वास्तव में देश के संकल्पों का और देश के धर्म और संस्कृति का इन अंग्रेजी पढ़े लिखे लोगों ने ही अधिक नाश किया है।

उत्तराखण्ड के लोगों को इस उच्च न्यायालय के लिए तथा लखनऊ के लिए दूर जाना पडता था तो यह उनकी उचित मांग थी कि उनका प्रदेश अलग दे दो। उस मांग में कहीं अलगाव नही था, अपितु लोकतंत्र की उस शिथिलता के प्रति आक्रोश था जो आजादी के 53 वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी उत्तराखण्ड वासियों के साथ न्याय नही कर पायी थी। सुविधाभोगी राजनीति ने लोकतंत्र को संवेदनाशून्य बना दिया तो जन आंदोलन फूट पड़ा। उत्तराखण्ड के लोग किसी भाषा या संप्रदाय के नाम पर अपना अलग देश नही मांग रहे थे अपितु वे अपनी समस्याओं के दृष्टिगत अपना अलग प्रदेश चाहते थे।

राजनीति में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जिन लोगों ने प्रवेश किया था, उनके आचरण और व्यवहार में देशभक्ति और कत्र्तव्यशीलता छिपी रहती थी। इसलिए उनके कार्य व्यवहार में पक्षपात नही होता था। परंतु धीरे-धीरे राजनीति व्यापार होती चली गयी तो ऐसे लोग राजनीति में आ गये जिनकी मानसिकता संकीर्ण हो चुकी थी। पहली पीढ़ी के लोग अपने परिवार का और मित्र संबंधियों का काम करने को पाप मानते थे, यहां तक कि जनप्रतिनिधि मंत्री या मुख्यमंत्री बनकर अपने गांव या अपने क्षेत्र का विकास करना भी पाप मानते थे। उनके चिंतन में
सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ की भावना छिपी रहती थी, इसलिए वह अपने ऊपर किसी प्रकार के पक्षपात का आरोप नही लगवाते थे। कितने ही ऐसे नेता हमारे बीच रहे जिनके मरणोपरांत शासन ने देखा कि उनके पैत्रक गांव के लिए सडक़ तक नही गयी थी। इसके विपरीत जब अगली पीढ़ी आयी तो उसने ‘समाजवादी’ होकर भी ‘सैफई’ के विकास पर ध्यान दिया, सारा प्रदेश भाड़ में जाए पर अपनी ‘सैफई’ चमकनी चाहिए। सारा प्रदेश कहीं जाए पर अपने परिवार का हर बालिग राजनीति में हो और हर परिजन किसी न किसी महत्वपूर्ण दायित्व को लेकर राजनीति के माध्यम से प्रदेश का खून चूस रहा हो यह घोर स्वार्थवादी (समाजवादी नही) राजनीति थी। इसने नेतृत्व को और नेता को संकीर्ण किया और लोगों के कार्य उनके होने लगे जो ‘नेताजी’ की अपनी पार्टी से या ‘बहनजी’ के अपने समुदाय से था। समाजवाद के स्थान पर स्वार्थवाद और सर्वजन के स्थान पर आंकड़ों के खेल से बना ‘बहुजन’ शब्द आ गया। यह राजनीति की अधोमुखी अवस्था थी। जिससे प्रदेश का वास्तविक विकास अवरूद्घ हो गया। फलस्वरूप प्रदेश में अकुलाहट का वातावरण बना और हमने देखा कि उत्तराखण्ड इस अकुलाहट की प्रसव पीड़ा से जन्म लेने वाला पहला ‘शिशु’ बना। इसे लोकतंत्र की सफलता नही माना जा सकता। यह घोर असफलता थी क्योंकि नेतृत्व की ‘स्वार्थवादी’ सोच के विरूद्घ जनता का यह खुला विद्रोह था। पर इतिहास में इसे स्वार्थवादियों की लोकतंत्रप्रियता और जनमत को विनम्रभाव से लेने की प्रवृत्ति के रूप में महिमामंडित किया जाएगा। यह भुला दिया जाएगा कि उनके रहते किस प्रकार लोकतंत्र की हत्या की गयी थी या की जाती रही थी और उसके विरूद्घ विद्रोही होकर उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश से अलग हो गया था।

अब उत्तराखण्ड के विकास के आंकड़ों पर आते हैं तो यहां की जनसंख्या लगभग एक करोड़ दो लाख है और यह प्रांत 53,483 वर्ग किमी. में फैला है। जनसंख्या घनत्व 190 व्यक्ति प्रति किमी. है। लिंगानुपात 963 महिलाएं प्रति हजार पुरूषों पर है। साक्षरता 79.52 प्रतिशत है। अर्थव्यवस्था और कृषि एवं उद्योग धंधों की व्यवस्था दयनीय है। खेती योग्य भूमि भी नही है। लोग आज भी रोजगार ढूंढऩे के लिए अन्य प्रदेशों की ओर भाग जाते हैं। इसीलिए यहां की अर्थव्यवस्था को ‘मनी आर्डर’ अर्थव्यवस्था कहा जाता है-क्योंकि लोग दूसरे प्रदेशों से अपने परिजनों के लिए कमा-कमाकर मनीऑर्डर से पैसे भेजते हैं। अलग प्रदेश बन जाने पर भी इस प्रदेश की कायापलट हो गयी हो यह नही कहा जा सकता। लोगों का संघर्ष और उनकी अपेक्षाएं फिर राजनीति की भेंट चढ़ गयी हैं। लोकतंत्र आज भी सिसक रहा है और प्रदेश का राजभवन मौन होकर सारा दृश्य देख रहा है। इसी को सपनों का टूट जाना कहा जा सकता है।

अब झारखण्ड की ओर चलते हैं। यह प्रांत बिहार में से काटकर बनाया गया था। इसका क्षेत्रफल 79,714 वर्ग किमी. है। यहां की जनसंख्या तीन करोड़ तीस लाख के लगभग है। लिंगानुपात 947 महिलाएं प्रति हजार पुरूषों पर हैं। साक्षरता दर 67.36 प्रतिशत है। इस राज्य को अभिशाप सा मिला हुआ है कि यह अपने जन्मकाल से ही राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है। यहां की कुल भूमि में से मात्र 38 लाख हेक्टेयर भूमि ही कृषि योग्य है। राजनीतिक स्तर पर अन्य भूमि को कृषि योग्य बनाये जाने की ओर ध्यान देने की आवश्यकता थी, पर ऐसा नही किया गया है। यहां पर बड़े उद्योग धंधे लोगों के परंपरागत कार्यों (लुहार, बढ़ई, जुलाहा आदि) को समाप्त कराके लोगों को बेरोजगार करने में ही सफल रहे हैं। आज भारी उद्योग धंधों की स्थापना करके लोगों को बेरोजगार करने के स्थान पर हर व्यक्ति को स्वरोजगार उपलब्ध कराने की आवश्यकता है-पर इस प्रदेश में ऐसा कुछ भी नही किया जा रहा है। जबकि यहां कृषि विकास, पर्यटन विकास, कुटीर उद्योगों के विकास की अपार संभावनाएं हैं। इस प्रकार झारखण्ड का अलग प्रदेश बनाकर लोगों का समग्र विकास करने का सपना भी खण्ड-खण्ड हो गया है। यद्यपि इसके निर्माण से पूर्व राजनीतिक लोगों ने जनसाधारण को बड़े-बड़े सपने दिखाये थे।

उत्तराखण्ड और झारखण्ड की भांति छत्तीसगढ़ का भी विकास से छत्तीस का ही आंकड़ा रहा है। इस प्रदेश की जनसंख्या लगभग ढाई करोड़ है। जनसंख्या घनत्व 189 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है। महिलाएं 931 प्रति हजार पुरूषों पर हैं। साक्षरता 71.02 प्रतिशत है। यहां खनिज संपदा पर्याप्त है, जिससे खनिज माफियाओं का आतंक बना रहता है। उद्योग धंधे भी पर्याप्त रूप से है। परंतु इन सबके उपरांत भी लोकतंत्र जनता की समस्याओं का समाधान करके कुछ भी ऐसा नही कर पाया है जिसे उल्लेखनीय उपलब्धि के रूप में महिमामंडित किया जा सके। अशिक्षा, बेरोजगारी, महिला उत्पीडऩ, मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाएं वैसी ही हैं जैसी अन्य तथाकथित छोटे राज्यों में नित्यप्रति होती देखी जाती हैं। फिर कैसे कहें कि छत्तीसगढ़ या उत्तराखण्ड और झारखण्ड ने अलग राज्य बनकर लोकतंत्र की विजय पताका फहरा दी हो?

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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