सूर्योपासना का पर्व सूर्य षष्ठी

  • 2015-11-16 08:30:48.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

सातों द्वीपों एवं समुद्रों के विस्तार को तथा समस्त भूतल के अद्र्धभाग को और उसके बाहर के अन्य प्रदेशों को अपने प्रकाश से उद्भाषित करने वाले भगवान् सूर्य अपने प्रकाश को विश्व की अन्तिम सीमा तक फैलाते हैं । सूर्य सामान्यत: तीनों लोकों में शीघ्रतापूर्वक भ्रमण करते हैं । भुवनभास्कर भगवान् सूर्यनारायण को प्रत्यक्ष देवता माना गया है । वे प्रकाश रूप हैं । ‘अव’ धातु रक्षण और प्रकाशार्थ है ।प्रकाश फैलाने और प्राणियों की रक्षा करने के कारण सूर्य को रवि कहा जाता है । तारों में पृथ्वी से अत्यंत समीप वस्तु सूर्य के चारों ओर पृथ्वी चलती है और जिससे हम लोगों को इतना ताप, वृष्टि आदि मिल रही है, और जो पृथ्वीवासियों के लिए जीवन रूप है , यहाँ तक कि जिसकी शक्ति का ध्यान वैदिक ग्रन्थों में भी हुआ है तथा वैदिक लोग अपनी गायत्री में ध्यान करते हुए कहते हैं-
सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । - ऋग्वेद 1/115/1 अथवा यजुर्वेद

अर्थात - जो जगत् नाम प्राणी चेतन और जंगम अर्थात जो चलते-फिरते हैं, ‘तस्थुष:’ अप्राणी अर्थात स्थावर जड़ अर्थात पृथ्वी आदि है, उन सबके आत्मा होने और सर्वप्रकाशस्वरुप सबके प्रकाश करने से परमेश्वर का नाम सूर्य है।
सूर्य का एक नाम सविता भी है । सविता का अर्थ ‘सृष्टि करने वाला’ होता है । निरूक्ताचार्य ने निरुक्त में कहा है- सविता सर्वस्य प्रसविता। - निरुक्त 10/31
भगवान् आदित्य को निरुक्त में द्युस्थानीय देवों में परिगणित किया गया है । ऋग्वेद के अनुसार भास्कर ही सृष्टि कर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं ।
भगवान् सूर्य समस्त स्थावर- जंगमात्मक विश्व के अन्तरात्मा हैं । आदित्य मण्डल के अन्त:स्थित सूर्य देवता सबके प्रेरक, अन्तर्यामी, परमात्मस्वरूप हैं ।सम्पूर्ण स्थावर और जंगम के कारण सूर्य को उदय से अस्त तक दैनंदिन सृष्टि के प्रत्यक्ष ही उद्भावक, जागरणकर्ता, संचालनकर्ता तथा रात्रिकाल में प्रजावर्ग के शयन कर जाने पर उनको विश्राम देने वाला माना गया है । सूर्य की महिमा का वखान करते हुए यजुर्वेद में कहा गया है-
आद्यं गौ: पृश्निरक्रमीदसदन्मातरंपुर: ।
पितरं च प्रयन्तस्व: ।। -यजुर्वेद 3/6
यह भूगोल जल के सहित सूर्य के चारों ओर घूमता जाता है इसलिए भूमि घुमा करती है। यजुर्वेद में ही कहा है -
आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्मृतं मत्र्य च ।
हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यानि ।।
-यजुर्वेद 33/43
जो सूर्यादि अर्थात सूर्य, वर्षादि का कर्ता, प्रकाशस्वरूप, तेजोमय, रमणीयस्वरुप के साथ वर्तमान, सब प्राणी अप्राणियों में अमृतस्वरूप वृष्टि व किरण द्वारा अमृत का प्रवेश करा और सब मूर्तिमान द्रव्यों को दिखलाता हुआ सब लोकों के साथ आकर्षण गुण से यह वर्तमान, अपनी परिधि में घूमता रहता है, किन्तु किसी लोक के चारों ओर नहीं घूमता ।वैसे ही एक-एक ब्रह्माण्ड में एक सूर्य प्रकाशक और दूसरे सब लोक-लोकान्तर प्रकाश्य हैं । कहा गया है-
दिवि सोमो अद्यंश्रिन्त:।-अथर्ववेद 14/1/1
जैसे यह चन्द्रलोक सूर्य से प्रकाशित होता है वैसे ही पृथ्वी आदि लोक भी सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं । परन्तु दिन और रात सर्वदा वर्तमान रहते हैं क्योंकि पृथ्वी आदि लोक घूमकर जितना भाग सूर्य के सामने आता है उतने में दिन और जितना पृष्ठ में, आड़ में होता जाता है उतने में रात । अर्थात उदय,अस्त, संध्या, मध्याह्न, मध्य रात्रि जितने कालवयव हैं, वे देश-देशान्तरों में सदा वर्तमान रहते हैं ।
सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता के रूप में भगवान सूर्य या आदित्य देवाधिदेव, सर्वदेवात्मक, सम्पूर्ण विश्व के साक्षी, स्वामी, क्षण से लेकर युगादिकाल के प्रवर्तक, धाता, विधाता, पोषक, आप्यायक सम्पूर्ण विश्व के आधार, प्रकाश, ऊष्मा एवं जीवन के मूल स्रोत वायु, आकाश, आदि के मूल कारण, योगियों, तपस्वियों, मनस्वियों द्वारा एकमात्र प्राप्य तत्व, बालखिल्य, पंचशिख, शुकदेव तथा भक्तों, साधकों एवं उपासकों के (स्तोतव्य) स्तुत्य तथा प्राप्यस्थान के रूप में वेद, उपनिषद्, पुराणादि ग्रन्थों में निर्दिष्ट अंकित हैं । ऋग्वेद में कण्वतनय महर्षि प्रषकण्व ने सूर्यदेव की प्रार्थना करते हुए कहा है-
उद्यन्नद्य मित्रमह आरोह्न्नुतरां दिवम् ।
हद्रोगं मम सूर्यहरिमाणं च नाशय ।।- ऋग्वेद 1/50/11
हे सूर्यदेव ! आज उदय होते हुए और आकाश में अग्रसर होते हुए आप मेरे ह्रदय रोग को दूर कर दीजिए और शरीर की विवर्णता को नष्ट कर दीजिए ।
बृहद्देवता नामक ग्रन्थ में शौनक ने सूर्य मन्त्र की महिमा में कहा है - उद्यन्नद्य इत्यादि मन्त्र सूर्य स्तुति परक है । इसका जप पापापहारी, रोगनाशक, विष-प्रभाव-विध्वंसक है एवं जागतिक, अभ्युदय आता पारमार्थिक नि:श्रेयस विधायक भी है।
ऋग्वेद में सूर्य का देवताओं में महत्वपूर्ण स्थान है ।सूर्य की उपासना वैदिक काल से विशेष रूप से प्रचलित रही है । प्रसिद्द गायत्री मन्त्र भी सूर्य-परक है ।ऋग्वेद 7/62/2, कौषीतकी ब्राह्मण उपनिषद् 2/7, आश्वलायन गृह्यसूत्र एवं तैतिरीय आरण्यक में सूर्योपासना के स्त्रोत, विधि-विधानादि का वर्णन है। वेद में विष्णु सूर्य का पर्यायवाची नाम है ।
उपनिषदादि ग्रन्थों में भगवान् सूर्य के तीन रूप निर्गुण-निराकार, सगुन-निराकार एवं सगुन साकार रूपों का वर्णन अंकित करते हुए कहा गया है की यद्यपि भगवान सूर्य निर्गुण-निराकार हैं तथापि अपनी माया-शक्ति के सम्बन्ध में सगुन-साकार भी हैं । उपनिषदों में भगवान् सूर्य के स्वरुप, महिमा आदि का विशद गूढ़ वर्णन अंकित है। छान्दोग्य उपनिषद् में सूर्योपासना से होने वाली आध्यात्मिक उन्नत्तियों का वर्णन करते हुए कहा गया है -
या एवासौ तपति तमुद्गीथ मुपासीत्। - छान्दोग्य उपनिषद् 3/3/1
जो ये भगवान् सूर्य आकाश में तपते हैं, उनकी उद्गीथ रूप से उपासना करनी चाहिए।
इसी उपनिषद् में आदित्यो ब्रह्मेति (छान्दोग्य उपनिषद् 3/3/1 ) आदित्य ब्रहम है - इस रूप में आदित्य की उपासना करने का विधान कहा गया है । मैत्रायणी उपनिषद् 5/3 में अंकित है कि ‘आदित्य ही ? है’ इस रूप में आदित्य का ध्यान करते हुए अपने को तद् रूप करना चाहिए । भगवान् भुवनभास्कर का स्थान आदित्यलोक सूर्यमंडल है । नारायणोपनिषद में अंकित है कि सूर्य ही कालचक्र के प्रणेता हैं, सूर्य से ही दिवा रात्रि , घटी, पल, मास, पक्ष, अयन तथा सम्वत आदि का विभाग होता है । सूर्य को सम्पूर्ण संसार के प्रकाशक के रूप में महिमामण्डित करते हुए कहा गया है कि सूर्य के अभाव में सब अन्धकार है ।
नारायणोपनिषद 15 में कहा गया है कि सूर्य ही जीवन तेज, ओज, बल, यश, चक्षु, श्रोत्र, आत्मा और मन है । मार्कण्डेय पुराण अध्याय 98 व 99 के अनुसार, सूर्य ब्रह्मस्वरूप हैं। सूर्य से जगत उत्पन्न और उसी में ही स्थित है। इस तरह यह जगत सूर्यस्वरूप है।