श्रीमती इंदिरा गांधी और उनकी नीतियां-भाग-2

  • 2016-06-21 03:30:49.0
  • राकेश कुमार आर्य

श्रीमती इंदिरा गांधी

दुर्भाग्यवश इंदिरा जी अपने शासनकाल में इस्लामिक फन्डामेन्टलिज्म’ के प्रति उसी प्रकार आंखें मूंदे रहीं जिस प्रकार उनके पिता पंडित नेहरू जी मूंदे रहे थे। अत: सदियों से जिस उदारता को भारत अपनाता आया था कि विदेशी मुस्लिम आक्रांता को पकड़ा और छोड़ दिया, या उन पर विश्वास कर लिया, उसी गलती को सन 1971 ई. में इंदिरा जी ने दोहरा दिया। कितनी बड़ी विडंबना थी कि इंदिरा जी ने पाकिस्तानी सेना के 93 हजार सैनिकों के रूप में आये हुए और फंसे हुए शिकार को छोड़ दिया।

परिणाम वही हुआ जो अपेक्षित था अर्थात बांग्लादेश ने ‘धन्यवाद’ देते हुए भारत की सीमा में अपने लगभग डेढ़ दो करोड़ नागरिकों को भारत में भेज दिया, जिससे वे लोग भारत में आकर कई जिलों में आज जनसांख्यिकीय संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। आज की तिथि में जो लोग भारत को ‘इस्लामिक जेहाद’ और आतंक की स्थली बना देने पर उतारू हैं, उनमें बांग्लादेश व पाकिस्तान दोनों का हाथ भारत के विरूद्घ मिल चुका है। कूटनीति तात्कालिक लाभ प्राप्ति और श्रेय लूटने का नाम नही होता, यह तो राजनीति होती है।

कूटनीति में देश के लंबे और दीर्घकालीन भविष्य के हित जुड़े होते हैं, जो सर्वोपरि होते हैं। उन्हीं के दृष्टिगत शत्रु को अपने जाल में फंसाकर चित्त किया जाता है। जिससे राष्ट्र लंबे समय तक लाभान्वित होता रहे, तीन दशक गुजरने पर ही बांग्लादेश डंक मारने पर उतारू हो गया है, जिससे मानना पड़ेगा कि उसके निर्माण में राजनीति काम कर रही थी, कूटनीति नही। कूटनीति कहकर जिसे प्रचारित किया गया वह तो मूर्ख बनाने की नीति थी।

घोर अंधकार में तो मिट्टी का एक दीपक भी अच्छा लगता है। परंतु फिर भी हम मान लेते हैं कि नेहरूजी के काल में अहिंसा के नाम पर जब कूटनीति की घोर उपेक्षा हो रही थी तब इंदिरा जी की ऐसी शत्रु राष्ट्र तोडक़’ नीति भी कम प्रशंसनीय नही थी। मूलरूप में इन सबके लिए यही नेहरू एण्ड कंपनी’ ही दोषी है, जिन्होंने भारतीय इतिहास के उस सच से आंखों को बंद करने का आत्मघाती प्रयास किया, जिसके अंतर्गत भारत को ‘दारूल हरब’ की श्रेणी में इस्लाम ने प्रारंभ से ही रखा है।

राष्ट्र के साथ किये गये इस छल को इंदिरा जी भी समझ नही पायी थीं या समझ कर भी अनसमझ बनी रहीं। फलत: जाने अनजाने उनके द्वारा राष्ट्र के साथ पुन: एक छल और हो गया।

इंदिरा जी के उत्साही नेतृत्व से राष्ट्र जिस गौरवपूर्ण स्थान पर पहुंचा था वह उन्हीं के द्वारा वार्ता की मेज पर हारकर अपना बहत कुछ गंवाकर भी मुट्ठी में मिट्टी लेकर वापिस घर में आ बैठा।

आज की हिंसा किसकी देन है?

बांग्लादेश के निर्माण के पश्चात शिमला में दोनों देशों पाकिस्तान और भारत के नेताओं की शिखर बैठक आयोजित की गयी थी। इसमें गिड़गिड़ाते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा जी से कहा था कि-

‘‘मैडम भारत में इस बार उनकी सेना को छोड़ दे तो वह भविष्य में कभी भी इस देश की तरफ आंख उठाकर भी नही देखेगा।’’


एक हजार साल भारत से लडऩे का दम भरने वाला एक हजार घंटे भी नही लड़ पाया और इतना बेबस हो गया कि गिड़गिड़ाने लगा। भारतीय क्षात्रधर्म को श्रीमती इंदिरा गांधी ने जिस प्रकार पहचान कर शत्रु को गिड़गिड़ाने की इस स्थिति में लाकर खड़ा किया वह सचमुच प्रशंसनीय बात थी।

इस स्थिति के पश्चात एक और कमी भारत की ओर से की गयी कि उसने पाकिस्तान की गिड़गिड़ाहट का राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूरा प्रचार किया। उसने और विशेषत: इंदिरा जी ने इस जीत को पाकिस्तान के बंटवारे को बहुत बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया। इससे पाकिस्तान को अपने नकली पूर्वजों अर्थात गजनी, गौरी, और बाबर (जो पाकिस्तान के पूर्वज नही हैं, पाकिस्तान के पूर्वज तो आर्य/हिंदू रहे हैं, यद्यपि वह उन्हें अपना पूर्वज ही मानता है, इसीलिए हमने उन्हें इनको
नकली पूर्वज’ कहा है) उनके रंग में रंगने और इसी प्रकार पुन: भारत के सामने आने में देर नही लगी। सन 1972 ई. में ही आनंदपुर साहिब प्रस्ताव लाया गया। इस प्रस्ताव का सारतत्व भारत की एकता और अखंडता को तोडक़र समाप्त कर देना था। भारत में सिखों के लिए एक अलग राज्य खालिस्तान की स्थापना कराना इसका उद्देश्य था।

पाकिस्तान इस सारे षडय़ंत्र के पीछे सूत्रधार की भूमिका निभा रहा था और आज तक भी निभा रहा है। उसने कभी भी अपने मुंह से इस षडय़ंत्र के सूत्रधार होने का दावा स्वीकार नही किया है-ये है कूटनीति। भारत ने अपनी मुक्तिवाहिनी सेना बांग्लादेश में भेजी और अपने सारे ताश के पत्ते दिखाकर पाकिस्तान और सारे विश्व के सामने यह खेल खेला।

बांग्लादेश निर्माण के मूल्य पर भारत ने (अपनी कूटनीति को संसार के समक्ष रखकर) आज के आतंकवाद और पंजाब में संत भिंडरावाला को पैदा किया और फिर जब भिंडरावाले को हाथ से बाहर जाता देखा तो उसे समाप्त करवाया। दस वर्ष तक खूनी होली से पंजाब सराबोर रहा। सुरक्षा बलों पर अरबों रूपया भारत का पानी की तरह पंजाब में बहाया गया। कितनी ही माताएं बिना बेटे की और कितनी ही ललनाएं बिना भाई की हो गयी। किसी का सुहाग लुट गया, तो किसी का बुढ़ापा लुट गया। किसी का यौवन लुट गया तो किसी का भविष्य लुट गया और अंत में ‘‘इंदिरा जी की घिनौनी हत्या के रूप में सारा देश की ‘लुट’ गया’’ यह हिंसा, यह खून खराबा और यह लूट खसोट का दौर इंदिरा गांधी की सी कूटनीति असफलता की देन था जिसे हमारी यह चतुर प्रधानमंत्री वार्ता की मेज पर हारकर भी शिमला से विजयी मुद्रा में दिल्ली लेकर आयी थीं। यह हिंसा उसी राजनीतिक व्यभिचार की देन थी जिसने इस राष्ट्र में एक बार फिर श्रेय लूटने के लिए वोटों का खेल खेला था, राष्ट्र को छला था तथा उसकी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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