श्रीहनुमान और महाभारतकालीन कपिध्वज

  • 2016-04-13 12:30:21.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

कपिध्वज

सनातन भारतीय संस्कृति परम्परा में श्रीहनुमान जी की उपासना अत्यन्त व्यापक रूप में ग्राम-ग्राम, नगर-नगर तथा प्रत्येक तीर्थ स्थलों में ,राम मन्दिरों में, सार्वजनिक चबूतरादि स्थलों पर होता है। इसके साथ ही घर-घर में हनुमान जी की उपासना के अनेक स्तोत्र, पटल, पद्धतियाँ, शतनाम तथा सहस्त्रनाम एवं हनुमान चालीसादि का पथ होता हैे कपिरूप में होने पर भी वे समस्त मंगल और मोदों के मूल कारण, संसार के भार को दूर करने वाले तथा रूद्र के अवतार माने गये हैं। श्रीहनुमानजी को समस्त प्रकार के अमंगलों को कोसों दूर कर कल्याण राशि प्रदान करने वाला तथा भगवान की तरह साधु संत, देवता-भक्त एवं धर्म की रक्षा करने वाला माना जाता है। रामायण एवं पुराणादि ग्रन्थों के अनुसार हनुमान जी के ह्रदय में भगवान श्रीसीताराम सदा ही निवास करते हैं।

भारतीय परम्परा की विशिष्टता रही है कि जिस विग्रह की प्रधान रूप से उपासना की जाती है, वह ब्रह्म का प्रतीक माना बन जाता है, तथा अन्य देवतागण उस रूप के उपासक बन जाते हैं। शिव की पूजा विष्णु और विष्णु की पूजा शिवादि करते हैं और ब्रह्मा, विष्णु, शिवादि सभी सरस्वती, काली, कृष्णादि की पूजा-अर्चना करते हैं, परन्तु हनुमान के साथ ऐसा नहीं है। हनुमान इसके महत्वपूर्ण उदहारणस्वरुप हैं। भारतीय पुरातन ग्रन्थों में कहीं भी हनुमान को ब्रह्म का प्रतीक नहीं माना गया है, परन्तु भगवान श्रीराम के परम प्रिय भक्त के रूप में श्रीहनुमान की उपासना सर्वत्र होती देखी जाती है।

भारतीय धार्मिक परम्परा में यह अद्भुत बात दृष्टिगोचर होता है कि हनुमान सम्बन्धी न कोई उपनिषद है और न स्वतंत्र रूप में किसी ग्रन्थ की रचना हुई है तथापि मन्त्र सम्बन्धी निबन्ध ग्रन्थों में इनकी उपासना के अनेक प्रकरण अंकित हैंद्य आनन्द रामायण में इनके कवच, पटल, स्तोत्रादि भी उपनिबद्ध हैं। नारदादि पुराणों में, एवं यामल ग्रन्थों तथा हनुमदुपासना नामक ग्रन्थों में इनकी विस्तृत उपासना पद्धति अंकित है। ऐसी मान्यता है कि हनुमान की उपासना से राम की भक्ति तथा इनकी प्रसन्नता से वाद-जय, युद्ध में विजय, पृथ्वी एवं राज्य की प्राप्ति, दीर्घ-आयुष्य एवं सर्वाभ्युदय कल्याण की प्राप्ति होती है। हनुमान की स्तुतियों में हनुमान चालीसा का सर्वाधिक प्रचार है। इसके साथ हि बजरंग वाण, हनुमान बाहुक, हनुमान साठिकादि अनेक सुन्दर पद्यबद्ध श्लोकमय स्तुतियाँ प्रचलित हैं। इसके अतिरिक्त इनकी प्रसन्नता हेतु वाल्मिकी रामायण, आध्यात्म रामायण एवं रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड के पाठ भक्त-उपासक गण किया करते हैं। प्रत्येक मंगल एवं शनिवार को हनुमान जी की मन्दिरों में भक्तगण बड़ी श्रद्धा से हनुमान का दर्शन कर समस्त अभिलाषाएं पूर्ण करने के लिए प्रार्थनायें करते व मनौतियाँ मानते देखे जाते है। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के सायंकाल इनका जन्म-उत्सव तथा कार्तिक अमावस्या एवं चैत्र पूर्णिमा को इनकी जयन्तियाँ मनाई जाती हैं तथा माँगलिक दर्शन किया जाता है। इसके अतिरिक्त भगवान श्रीराम के अवतार दिवस चैत्र शुक्ल नवमी को जहाँ-जहाँ हनुमान के परम उपास्य श्रीराम का पूजा-अर्चना, उपासना, नाम, कथा-कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ कपिध्वज फहराकर रामभक्तों के परमाधार, रक्षक और श्रीराम मिलन के अग्रदूत, श्रीराम के अंतरंग पार्षद श्रीहनुमान की पूजा-अर्चना, कीर्तनादि होती है तथा उनकी जयकार के नारे लगाए जाने की परिपाटी है। लोगों में ऐसी मान्यता है कि जहाँ-जहाँ श्रीरघुनाथ के नाम,रूप,गुण, लीलादि का कीर्तन होता है वहाँ-वहाँ मस्तक से बंधी हुई अंजलि लगाये नेत्रों में आंसू भरे हनुमान जी उपस्थित रहते हैं, अत: राक्षस वंश के कालरूप उन मारुति को नमस्कार करना चाहिएद्यकहा भी गया है-

यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तन तत्र-तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम् ।
वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम् ।।

अमंगल विनाशक

समस्त अमंगलों के विनाशक मंगलमूर्ति भक्वर श्रीहनुमान का चरित्र परम पवित्र, परम आदर्श तथा कल्याणमय के साथ ही अत्यन्त विचित्र भी है। ब्रह्मपुराणादि ग्रन्थों के अनुसार श्री हनुमान वृषाकपि अर्थात शिव-विष्णु के के तेजोमय दिव्य विग्रहधारी देवता के रूप में निरुपित हुए हैं। विविध पुराणों एवं अनेकाधिक रामायणों के अनुसार वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हनुमान जी अंजना नामक अप्सरा से केसरी पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। इसलिए श्री हनुमान आञ्जनेय तथा केसरीनन्दन के नाम से जाने जाते हैं। वायु के अंश से उत्पन्न होने के कारण वायुपुत्र या पवनसुत (वायुपुत्र), श्रीराम की सेवा में रामदूत तथा महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा अर्जुन के रथ की ध्वजा पर कपिध्वज के रूप में स्थित होकर हुंकारमात्र से महाभारत के वीरों को प्राणस्त्ब्ध करने के फलस्वरूप फाल्गुणसख के नाम से प्रसिद्ध हुए। गरुड़ादि के वेग के सदृश तीव्रगति से समुद्रलंघन के कारण हनुमान का नाम उदाधिक्रमण पड़ गया एवं कभी पराजित नहीं होने से अपराजित तथा शिव के अंश से उत्पन्न होने के फलस्वरूप शिवात्मज और शंकरसुवन आदि नाम जाने जाते हैं, लेकिन सर्वप्रचलित नाम हनुमान ही है।

भारतीय इतिहास का श्रीगणेश ऋग्वैदिक काल से ही प्रारम्भ होता है। ऋग्वेद में भारतीय ज्ञान-विज्ञान का अंकुर है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति, आचार-विचार, युद्ध-कौशलादि की प्रथम झलक विश्व की इस प्राचीन ग्रन्थ में अंकित मिलती है। ऋग्वैदिक आर्य सुसंगठित गिरोहों में जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें आर्येतर जातियों से सदा लडऩा-भिडऩा पड़ता थाद्यअत: इस दिव्य ग्रन्थ में युद्ध और ध्वजा दोनों ही शब्दों का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद में झण्डे अर्थात ध्वजा के लिए धूमकेतु एवं द्रप्स शब्दों का प्रयोग हुआ है (ऋग्वेद 1/27/11 एवं 4/13/2 )द्य विद्वानों का मत है कि ऋग्वेद 4/13/2  में प्रयुक्त द्रप्स शब्द जेंद के द्रप्स का पर्यायवाची है। महाभारत आर्यों का प्राचीन ग्रन्थ है। इसमें ध्वजाओं का पूरा विवरण अंकित है। इस युग में भिन्न-भिन्न आकार, रंग तथा योजना के झण्डे थे।
-अशोक प्रवृद्ध