श्री कल्पवृक्ष चालीसा

  • 2015-12-05 12:30:31.0
  • नितिन खरे

12310643_838902256229892_2108877660630190721_nमात पिता सिर नाय के, गुरुवर करूँ प्रणाम |
सब देवन को सुमिर के, ले शारद का नाम ||


वेद पुराणों में निहित, तव महिमा तरुराज |
सकल जगत में गा सकूँ, यह आशिष दो आज ||


जय जय जय जय विटप विशाला, जय तरुवर जय निपट निराला |१|
जय सुर नर के पूजनहारी, जय जय कल्पतरू अति भारी |२|


जय सुरतरु जय मोहक रूपा, जय जय जय जय गाछ अनूपा |३|
जय जय कल्पलता वरदानी, तव महिमा ऋषि मुनिन बखानी |४|


जग के तुम ही हो तरुराजा, तुमको पूजत सकल समाजा |५|

ऋषि मुनि नारद तुमको ध्यावैं, देव सभी तुम्हरे गुण गावें |६|


वेद पुराणों में है गाथा, यति गंधर्व नवावहिं माथा |७|
तुलसी ने जब कलम चलाई, मानस में महिमा तव गाई |८|


देव दनुज जब जलधि मथाये, भांति चतुर्दश रत्नहिं पाये |९|
पहली बार हलाहल आवा, जो भोले की भेंट चढ़ावा |१०|


दूजे कामधेनु को पावा, जे ऋषियन को दान करावा |११|
अश्व तीसरा रतन निराला, दानवराज ताहि सम्हाला |१२|


फिर ऐरावत हाथी आये, तिनको इन्द्रलोक पैठाये |१३|

पंचम रतन मणी अनुरागी, जो भगवन को अति प्रिय लागी |१४|


षष्ठम रत्न कल्पतरु पाए, देव दनुज दोनों हर्षाये |१५|
सबहिं देवगण आयहु आगे, भांति विविध गुण वर्णन लागे |१६|


देवराज के अति मन भावा, कल्पलता को स्वर्ग भिजावा |१७|
मिल सबहिं देव तव स्तुति गाते, कर सेवा जल आदि चढ़ाते |१८|


सुंदर पुष्प रहें बड़ नीके, मनहुँ चकोर संग रजनी के |19|


ऋषि नारद धरती महँ आये, संग कल्पतरु मँजरी लाये |२०|
पावन पल्लव साथ समेटे, जाय कृष्ण भगवन को भेंटे |२१|


यह सतभामा को प्रिय लागे, कीन्ह लालसा प्रभु के आगे |२२ |
इन्द्रलोक श्री कृष्ण सिधाए, कल्पतरू धरती ले आये |२३|


पूजन करते जो नर नारी, तिनकी पीड़ हरहु सब भारी |२४|
जो श्रद्धा से माथ नवाते, उनके कष्ट सबहिं मिट जाते |२५|


वंध्या करै पाठ गर कोई, देवपुत्र निश्चय तेहि होई |२६|
जो पावहिं तरुवर की छाया, रोग न आवहिं तिनकी काया |२७|


जैसी करहि कल्पना जोई, फल पावहिं ते वैसे सोई |२८|
नित्त नेम जो भोग चढ़ाते, तुम उनकी सब पीर मिटाते |२९||


तुम्हरे ढिग जो विप्र जियावैं, धन वैभव व्यापार बढावें |३०|
कन्या भोज करावे लाई, रोजगार मह उन्नति पाई |३१|


जो बालक नित दीप जलावैं, अति कुशाग्र बुद्धि तेहिं पावैं |३२|
भक्त हजारों जय जय गाते, साधू आकर अलख जगाते |३३|


निर्धन के तुम घर भर देते, कष्ट सभी के तुम हर लेते |३४|
जो भी शरण आपकी आता, नहीं हाँथ खाली वो जाता |३५|


तुमने सबके भाग्य सँवारे, दुखियन के तुम कष्ट निवारे |३६|


जो करहिं स्तुती रख उपवासा, पावहिं ते नर ज्ञान प्रकाशा, |३७|

कलियुग में जो तुमकों ध्यावैं, उनके नेक काज बन जावैं |३८|


जो पढ़े कल्पवृक्ष चालीसा, मुदित होंहि तिनसे जगदीशा |३९|
चेतन कलम भयो शुभ काजा , कृपा करो हम पर तरुराजा |40|


कल्पतरू महिमा कही, रखो दास की लाज |
पाठ करे नित नेम जो, पूर्ण होंहि सब काज ||


बैठ तिहारी छाँव में, माँगें तेरा प्यार ||
नेक कल्पना जो करें, करना प्रभु साकार ||