शिक्षा मंदिरों के माध्यम से फैलता पूंजीवाद भाग-1

  • 2015-12-21 02:59:02.0
  • राकेश कुमार आर्य

मैं एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र में विश्व के और भारत के दस सर्वाधिक धनी व्यक्तियों की छपी तस्वीरें देख रहा था। उन तस्वीरों को देखते-देखते मैं एक बात सोच रहा था कि हमारे मीडिया बंधु ऐसे ‘सैल्फ मेड’ व्यक्तियों की तस्वीरें छापते क्यों हैं? अंतत: इन तस्वीरों के छापने से जनसाधारण को शिक्षा क्या मिलती है? यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति ‘सैल्फ मेड’ नही हो सकता। हर व्यक्ति के निर्माण में उसके माता-पिता, गुरू, ज्येष्ठ-जनों, वरिष्ठजनों, कनिष्ठजनों एवं समाज के श्रेष्ठजनों का बहुत बड़ा योगदान होता है। इतना ही नही इन सबसे हटकर उसके प्रारब्ध के आधार पर ईश्वरीय अनुकंपा का और उसके इर्द गिर्द की परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसलिए कोई व्यक्ति ‘सैल्फ मेड’ नही हो सकता। हर व्यक्ति ‘हैल्प मेड’ होता है। हर व्यक्ति को दूसरों की सहायता से ही अपना उच्चासन प्राप्त होता है।

[caption id="attachment_24608" align="alignright" width="420"]
coaching classes
कोचिंग कक्षा[/caption]

जहां तक सबसे बड़ा धनी होने का प्रश्न है तो इसके लिए यह देखना आवश्यक है कि व्यक्ति के साधन, साधना और साध्य में कितना समन्वय रहा? यदि इन तीनों का समन्वय उचित नही रहा है-तो ऐसे व्यक्ति को ‘बड़ा’ नही माना जा सकता। कोई भी धनाढ्य व्यक्ति बिना अत्याचार और बिना अन्याय के आगे नही बढ़ सकता। उसकी पूंजी श्रम पर शासन करती है। वह उद्योग लगाता है, उसमें अपना धन कम और सरकारी ऋण अधिक लगाता है, और फिर उस अपने द्वारा लगाये गये धन को तथा सरकारी ऋण को श्रमिकों के खून पसीने से चुकता करता है। यह भी तो एक प्रकार का अत्याचार और अन्याय ही है कि उसकी पूंजी श्रम पर शासन करती है और वह स्वयं ‘मौज’ व मजे का जीवन व्यतीत करता है। उसकी पूंजी बढ़ती जाती है और श्रमिक वर्ग की अंतडिय़ां सूखती जाती हैं, किसी ‘सैल्फ मेड’ व्यक्ति की कहानी को यदि निचोड़ोगे तो उसका जितनी बड़ी पूंजी का साम्राज्य होगा, उसकी कहानी में से उतने ही अधिक श्रमिकों का रक्त टपकने लगेगा। उसकी कहानी में से पानी के स्थान पर टपकते हुए रक्त को देखकर आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे। इसलिए ‘मीडिया बंधु’ इन रक्त पिपासु लोगों की तस्वीरें छापकर समाज के साथ अन्याय न करें। इनसे हमारे युवा वर्ग पर दुष्प्रभाव पड़ता है, क्योंकि वह भी इन्हीं जैसा बनने का सपना देखने लगता है।

वैसे हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण को परिवर्तित करने में हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान है। इसने किसी अपरिग्रहवादी ऐसे संत-महात्मा या सदगृहस्थी को अपने लिए वंदनीय और अभिनंदनीय मानना छोड़ दिया जिन्होंने आवश्यकता से अधिक धन संचय को अपने लिए त्याज्य और हेय माना। संसार का आनंद जिन्होंने ‘छोडऩे-छोडऩे’ में माना और जाना उन्हें उन लोगों ने पीछे छोड़ दिया जिन्होंने संसार का आनंद ‘जोडऩे-जोडऩे’ में माना। भारत की संस्कृति तो ‘छोडऩे-छोडऩे’ (इदन्नमम्) की है, उसने ‘जोडऩे जोडऩे’ को भोगवादी अपसंस्कृति का हेतु माना और उसके विषय में यह जाना कि यह प्रवृत्ति अंत में मनुष्य को मारने में सहायक होती है।

मीडिया बंधु भौतिकवादी चकाचौंध से प्रभावित हुए और उन्होंने सर्वाधिक अमीरों को सुर्खियां देनी आरंभ कर दीं। उन्होंने यह भी नही सोचा कि इस प्रकार की प्रतियोगिताओं के आयोजन करने से समाज में सबसे बड़ा धनी बनने का कोई मानदण्ड न अपनाया जाएगा, या कोई मानदण्ड निर्धारित नही किया जाएगा और केवल धन संपत्ति का मूल्यांकन करने से ही व्यक्ति का मूल्यांकन कर लिया जाएगा तो समाज में पूंजीवादी रक्तिम प्रतियोगिता की भावना तो बलवती होगी ही। जिससे धनी और निर्धन के बीच की दूरी बढ़ेगी ही। भारत में इसी कारण जहां मुट्ठी भर लोग अरबों-खरबों की संपत्ति के स्वामी हैं, वहीं बड़ी संख्या में लोगों के पास दो जून की रोटी खाने तक के साधन नही हैं। मानो उन करोड़ों भूखे नंगे लोगों के भाग्य की रोटी को इन मुट्ठी भर धनी लोगों ने ही हड़प लिया है।

अब शिक्षा के विषय में कुछ और चिंतन करते हैं कि इसने व्यक्ति को कैसे अर्थ केन्द्रित कर दिया है? वास्तव में हमारी आज की शिक्षा प्रणाली ‘कोचिंग प्रधान’ शिक्षा प्रणाली है इसमें कोचिंग और ट्यूशन के माध्यम से अध्यापक वर्ग भी केवल धनोपार्जन कर रहा है। वह अपने विद्यार्थी वर्ग को केवल धन का कीड़ा बनाकर तैयार कर रहा है, इससे अलग वह उसके विषय में कुछ भी नही सोचता। अध्यापक ने शिक्षा का व्यापारीकरण कर दिया है और विद्यार्थी को वह अपने लिए केवल अर्थोपार्जन का एक माध्यम मानने लगा है। इसलिए छात्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण का शिक्षक और शिक्षा का उद्देश्य समाप्त हो गया है।

देश के कई शहर अपनी पुरानी छवि के विपरीत आजकल कोचिंग की एक नई छवि के साथ उभर कर सामने आये हैं। जैसे राजस्थान का कोटा शहर अब अपनी औद्योगिक छाप के स्थान पर कोचिंग इंडस्ट्री के रूप में स्थापित हो गया है। इस शहर में अब एक सवा लाख विद्यार्थी उत्तर भारत से कोचिंग लेने के लिए पहुंच रहे हैं। स्पष्ट है कि इतनी बड़ी संख्या में यहां आकर कोचिंग लेने वाले विद्यार्थियों के लिए होटल, रेस्तरां, किराये के कमरे, शॉपिंग के लिए अच्छी दुकानें इत्यादि भी चाहिए। अत: कोचिंग इंडस्ट्री के साथ-साथ यहां होटल, रेस्तरां, किराये के कमरे, शॉपिंग सैंटर्स आदि की इंडस्ट्री को भी लाभ मिलता है। पर दूसरी ओर किसी की क्षति भी हो रही है। कोचिंग इंडस्ट्री से लेकर शॉपिंग सैंटर्स तक विद्यार्थियों के लिए हर स्थान पर उनकी जेब पर डकैती डालने की पूरी योजना बनायी जाती है, जिससे अभिभावकों को क्षति उठानी पड़ती है। उससे भी अधिक क्षति उन लोगों को होती है जिनके पास कोटा भेजकर अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने का प्रबंध नही होता, और इसी कारण उनके बच्चे किसी प्रतियोगिता से वंचित रह जाते हैं। समान शिक्षा न होने के कारण अवसरों की समानता का संवैधानिक आदर्श भी कहीं यूं ही विस्मृत या उपेक्षित होता जा रहा है।

क्रमश:

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.