शिक्षा मंदिरों के माध्यम से फैलता पूंजीवाद (2)

  • 2015-12-22 03:00:04.0
  • राकेश कुमार आर्य

एशियाई विकास बैंक ने एक अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि कोटा की कोचिंग इंडस्ट्री का आधार 600 करोड़ रूपये का है और इसमें प्रति वर्ष पंद्रह प्रतिशत की वृद्घि होती जा रही है। यह तो केवल एक कोटा शहर का अध्ययन है, कोचिंग की यह इंडस्ट्री देश के अन्य स्थानों में छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और गांव-गांव में किसी न किसी रूप में फैल रही है। इसके फैलने का एक कारण पैसे की भूख ही नही है, अपितु कई कारण हैं। यह खेल जीविकोपार्जन के लिए पैसे की आवश्यकता से आरंभ होकर भूख में जाकर परिवर्तित हो जाता है। यहां पर ‘पैसे की आवश्यकता’ और ‘पैसे की भूख’ में थोड़ा अंतर करके समझने की आवश्यकता है। पैसे की आवश्यकता वहां है जहां पब्लिक स्कूलों ने पढ़े लिखे युवक-युवतियों को बेरोजगार कर दिया है, उन्हें सरकारी नौकरी मिलती नही है, तो वह विवश होकर कोचिंग और ट्यूशन से अपना गुजारा करते हैं। इसमें कुछ ऐसे युवक युवतियां भी सम्मिलित हैं, जिन्हें विवश होकर किसी पब्लिक स्कूल में नौकरी करनी पड़ रही है और उन्हें वहां बहुत कम वेतन दिया जाता है। कम वेतन के बदले में स्कूल प्रबंधन उन्हें लडक़े-लड़कियों के ट्यूशन और कोचिंग देने का प्रस्ताव रखता है। जिससे स्कूल को यह लाभ होता है कि ये लडक़े-लड़कियां उसी स्कूल में अध्ययनरत रहकर उसे समय से फीस आदि देते रहते हैं पर अपनी अच्छी तैयारी सर या मैडम से ट्यूशन या कोचिंग लेकर उसके माध्यम से करते रहते हैं। जब उनका अच्छ परिणाम आता है तो लाभ स्कूल को मिलता है। मेहनत टीचर की होती है और क्रेडिट स्कूल को मिलता है।

इससे कम वेतन देकर भी स्कूल अपने टीचर से दोहरा लाभग उठा लेता है। इसी को कहते हैं-दोनों हाथों में लड्डू होना। यहां तक तो कोचिंग या ट्यूशन देने वाले को पैसे की आवश्यकता है। क्योंकि उसे जीविकोपार्जन के लिए उसे अर्जित करना है।

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अब आते हैं पैसे की भूख पर। पैसे की भूख भी स्कूल-कॉलेजों से ही आरंभ होती है। हर पब्लिक स्कूल या कॉलेज या कोचिंग सेंटर इस समय इसी बीमारी से ग्रसित है। आवश्यकताएं पूरी कर लेने पर भी जब अपनी तिजोरियां भरने की चाहत आरंभ हो जाती है तो व्यक्ति निश्चित की गयी मर्यादा का ध्यान नही रखता है। तिजोरी भरने का यह खेल तनिक ऊंचे स्तर पर होता है। इसमें हमारे जनप्रतिनिधि भी कई बार सम्मिलित होते हैं। इसमें शिक्षा का पूर्णत: व्यापारीकरण कर लिया जाता है, बच्चे की संवेदनाएं शांत की जाती हैं और उसे पूरी तरह चूसने का खेल खेला जाता है। उसे समाज के लिए एक संवेदनशील मानव के स्थान पर ‘धन कमाऊ मशीन’ बनाकर भेजा जाता है। ऐसे कोचिंग सैंटर्स से बाहर आने वाले बच्चे जब समाज में अपना स्थान बनाने का संघर्ष आरंभ करते हैं तो उनके लिए संबंध या संबंधी कुछ नही होते-उन्हें चाहिए केवल पैसा। इस ‘कोचिंग इंडस्ट्री’ का सबसे बुरा प्रभाव स्कूली शिक्षा पर ही पड़ा है। दसवीं से निकलकर लाखों किशोर आईआईटी की जे.ई.ई. परीक्षा में बैठने के लिए कोचिंग में लग जाते हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने 2010-11 में भारत में कोचिंग इंडस्ट्री के आकार का अनुमान 40,000 करोड़ से भी अधिक का लगाया था। 2014-15 में यह 75,629 करोड़ का हो गया। ऐसोचैम के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में कोचिंग इंडस्ट्री का आकार 2.60 लाख करोड़ रूपया है। एशियाई विकास बैंक का सर्वेक्षण है कि भारत में हाईस्कूल में पढ़ रहे विद्यार्थियों में से 83 प्रतिशत विद्यार्थी कोचिंग कक्षाओं में जाते हैं। यह आवश्यक नही है कि इन 83 प्रतिशत छात्र-छात्राओं के प्रत्येक के अभिभावक भी स्थिति अपने बच्चों को कोचिंग कराने की हो।

अभी पिछले दिनों एक बैठक में दिल्ली में एक मेरे मित्र कह रहे थे कि शिक्षारत एक बच्चे का मासिक खर्चा लगभग दस हजार आ रहा है। यदि दो बच्चे भी स्कूल जाते हैं तो जिन माता-पिता की मासिक आय पंद्रह बीस हजार ही है, उन्हें घर चलाना और बच्चे पढ़ाना बड़ा कठिन हो गया है। इस पर भी सर्वाधिक कष्टïप्रद बात यह है कि जो शिक्षा माता-पिता अपने बच्चों को दिला रहे हैं, वह भी केवल रोजगारप्रद है, संस्कारप्रद नही है। रोजगार पाते ही बच्चे के माता-पिता का सारे जीवन का परिश्रम व्यर्थ जा रहा है, जो इस आशा में अपने यौवन की भेंट अपने बच्चों पर चढ़ा देते हैं कि जब बच्चे कमाने लगेंगे तो कुछ सुख की नींद लेंगे। ऐसी शिक्षा पाकर देश का युवा वृद्घि आश्रम (धन कमाने) की ओर जा रहा है और माता-पिता वृद्घाश्रम की ओर भेजे जा रहे हैं। देश की सामाजिक स्थिति बड़ी दयनीय है।

इतना सब कुछ होकर भी आईआईटी संस्थानों की 10,000 सीटों पर प्रवेश के लिए जिस संयुक्त प्रवेश परीक्षा का वार्षिक आयोजन किया जाता है उसमें तेरह लाख के लगभग विद्यार्थी अपना भाग्य आजमाते हैं, जिनमें से केवल डेढ़ लाख विद्यार्थियों का चयन जेईई परीक्षा के लिए किया जाता है। इस प्रकार चाहे जितने कोचिंग दिलाये जा रहे हों पर उनसे भी युवाओं को संतुष्टिï नही मिल रही है, क्योंकि तेरह लाख प्रवेशार्थियों के लिए रोजगार के अवसर मात्र दस हजार ही हैं। इस प्रकार लूट अधिक है, और संतुष्टिï न्यून है। अधिकतर अभिभावक जीवन भर कोचिंग सेंटर्स और स्कूलों के लिए कमा-कमाकर देकर अंत में थककर घर बैठ जाते हैं। इस खेल को देखकर यही लगता है कि जैसे देश के अभिभावकों को कुछ कोचिंग सैंटर्स और स्कूल कॉलेजों ने अपने लिए कमाऊ पूत बनाकर छोड़ दिया है कि बच्चों तुम लाते रहा, और हम खाते रहें। देश में पूंजीवाद अपने घृणास्पद रूप में देश के ज्ञान मंदिरों के माध्यम से घुस चुका है, और हम अभी तक इसके घातक परिणामों की ओर नही देख पा रहे हैं। जिसे हम लोकतंत्र समझकर अपने लिए सुरक्षा कवच मान रहे हैं, उसमें आग लग चुकी है और हम सोये पड़े हैं। ‘‘हर शाख पर उल्लू बैठा है-अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?’’

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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