सर्वोच्च न्यायालय का लोकायुक्त

  • 2015-12-18 01:30:58.0
  • राकेश कुमार आर्य

Supreme_Courtउत्तर प्रदेश के लिए नया लोकायुक्त न्यायमूत्र्ति वीरेन्द्र सिंह यादव को बनाकर सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदेश की सपा सरकार के मुंह पर सचमुच करारा तमाचा जड़ा है। यह अत्यंत लज्जास्पद भी है और हमारी व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न भी लगाता है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय को यह कहना पड़े कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अपना दायित्व निभाने में असफल हो रहे हैं। बात स्पष्ट है कि लोकतंत्र के नाम पर लोगों से किसी भी प्रकार मत प्राप्त करके और सिरों (बहुमत के लिए अपेक्षित विधायक या सांसद) की गिनती पूरी करके हमारी सरकारें मनमाना और अलोकतांत्रिक आचरण करने लगती हैं। जिससे कानून के राज का उपहास उड़ता है, और  शासन की नीतियां जनापेक्षाओं के विपरीत जाने लगती हैं। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से सपा सरकार की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लग गया है। इस कार्य को हमारी सरकारें विधानमंडलों में तो अपने बहुमत के बल पर नही होने देती हैं, वहां तो शोर शराबा होता है, विधानमंडल की कार्यवाही स्थगित होती है, और इसी रस्साकशी में ही सत्रावधि पूर्ण कर ली जाती है। इस प्रकार अहम की लड़ाई लड़ते-लड़ते हमारी सरकारें और विपक्ष जनहित में कुछ न करके ‘असहमति की राजनीति’ के दांव पेंचों को ही एक दूसरे के विरूद्घ चलते चलाते रहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश ने देश में ‘असहमति की राजनीति’ के घातक परिणामों की ओर भी जनता का ध्यान आकृष्ट किया है।

अब थोड़ा समझें कि सर्वोच्च न्यायालय को इतना महत्वपूर्ण आदेश किन परिस्थितियों में देना पड़ा है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपना दायित्व संभालते ही लोकायुक्त एवं उपलोकायुक्त अधिनियम में संशोधन करते हुए लोकायुक्त का कार्यकाल छह वर्ष से बढ़ाकर आठ वर्ष कर दिया था। इतना ही नही मुख्यमंत्री ने अपनी पसंद का लोकायुक्त बनाये रखने के उद्देश्य से यह भी प्राविधान कर लिया कि नये लोकायुक्त की नियुक्ति तक पहले वाला लोकायुक्त ही अपना कार्य करता रहेगा। मुख्यमंत्री ने अधिनियम के सैक्शन 5(3) में संशोधन कर यह व्यवस्था भी बना डाली कि कोई व्यक्ति दोबारा भी इस पद पर बना रह सकता है। इसी प्रकार की व्यवस्थाओं का लाभ प्राप्त कर एन.के. मेहरोत्रा 15 मार्च 2014 को अपना कार्यकाल पूर्ण होने के उपरांत भी अपने पद पर बने रहे।

एन.के. मेहरोत्रा पर सरकार की कृपा हुई तो उन्होंने भी उस कृपा का ‘उचित लाभ’ सरकार को देना आरंभ कर दिया। दोनों ने मिलकर ‘गठबंधन धर्म’ निभाना आरंभ कर दिया। श्री मेहरोत्रा ने सपा के प्रति उदारता दिखाते हुए विधायक निधि के दुरूपयोग के आरोपों से घिरे सपा के पांच विधायकों की शिकायत जब उन्हें प्राप्त हुई तो उन्होंने उसे अनसुना करते हुए उस जांच को ही बंद करा दिया। श्री मेहरोत्रा ने सपा सरकार के मंत्री रहे नारदराम व ब्रह्मशंकर त्रिपाठी के विरूद्घ जांच बंद करा दी। इसी प्रकार मंत्री आजम खां और मंत्री महबूब अली के विरूद्घ प्राप्त शिकायतों की जांच भी साक्ष्य के अभाव में बंद कर दी। इस प्रकार के अन्य कई मामले दिखाई दिये, जिन्हें देखकर यह लगने लगा था कि प्रदेश में लोकायुक्त प्रदेश सरकार की एक ‘प्राइवेट कंपनी’ बनकर रह गया है। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की इस प्रकार की जुगलबंदी को देखकर यही कहा जा सकता है कि प्रदेश में शासन विधि का न होकर ‘निधि और मुठमर्दी’ का है। इस प्रकार की व्यवस्था को किसी भी स्थिति में किसी प्रदेश या देश के लोगों के लिए उपयोगी नही माना जा सकता। यद्यपि लोकायुक्त रहे एन.के. मेहरोत्रा ने इससे पूर्व कई अच्छे निर्णय भी लिये थे। आज के जिस मेहरोत्रा ने अपने आपको और अपने स्वाभिमान को सपा सरकार के यहां गिरवी रख दिया, यह वही मेहरोत्रा हैं जिन्होंने 31 मार्च 2012 को बसपा सरकार में मंत्री रहे रंगनाथ मिश्र, अवधपाल सिंह, बादशाह सिंह, रामअचल राजभर, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, राकेशधर त्रिपाठी, चंद्रदेव, रामयादव, बाबूसिंह कुशवाहा और रतनलाल अहीरवार को पद के दुरूपयोग व भ्रष्टाचार का दोषी ठहराया था। उनके कहने पर मुख्यमंत्री मायावती ने सिद्दीकी को छोडक़र सभी के विरूद्घ कार्यवाही की और उन्हें अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। पर अब यही मेहरोत्रा सपा सरकार के ‘बंधक’ बन गये। यदि वह मार्च 2014 में ही अपने पद से मुक्त हो जाते तो उन्हें अपना स्वाभिमान बेचकर स्वयं को याचक ही मुद्रा में लाने के लिए विवश न होना पड़ता।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 के आरंभ में उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि वह श्री एन.के. मेहरोत्रा के स्थान पर नये लोकायुक्त की नियुक्ति आगामी 6 माह में कर ले। जैसे ही श्री मेहरोत्रा का कार्यकाल समाप्त हुआ तो नये लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं दाखिल की गयीं। मई 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को सचेत किया कि नया लोकायुक्त नियुक्त न करने की स्थिति में उसके विरूद्घ अवमानना की कार्यवाही की जाएगी। इस पर 11 जून 2015 को राज्यपाल रामनाईक ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष स्वामीप्रसाद मौर्य और श्री मेहरोत्रा को पत्र लिखकर लोकायुक्त व उपलोकायुक्त नियुक्त करने का सुझाव दिया। तब सरकार ने न्यायमूर्ति रविन्द्र सिंह को लोकायुक्त बनाने का प्रस्ताव 5 अगस्त 2015 को राजभवन भेजा। जिसे राज्यपाल ने कुछ आपत्तियों के साथ तत्काल वापस भेज दिया। राज्यपाल ने 20 अगस्त 2015 को मुख्यमंत्री के लिए पुन: पत्र लिखा और चयन समिति के सभी सदस्यों के बीच सामंजस्य बनाकर नाम चयन का सुझाव दिया। उन्होंने 25 अगस्त को रविन्द्रसिंह का नाम निरस्त कर किसी अन्य का नाम भेजने की बात कही। तब सरकार ने 27 अगस्त 2015 को एक बिल पास कर लोकायुक्त चयन समिति से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका ही समाप्त कर दी। इस बिल पर राज्यपाल ने हस्ताक्षर नही किये।

ऐसी परिस्थितियों में 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगायी और 16 दिसंबर तक नया लोकायुक्त नियुक्त करने का निर्देश दिया। पर सरकार फिर लापरवाह रही और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नये लोकायुक्त के रूप में न्यायमूर्ति श्री वीरेन्द्रसिंह की नियुक्ति कर दी। सारी प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय कहीं अधिक स्पष्ट और शालीन रहा, पर सरकार हर बार अपने आप में शिथिलता, लापरवाही और असहमति की राजनीति करती रही। परिणाम हमारे सामने है। इस आदेश से जनता भी सावधान हो जनप्रतिनिधि भी जिससे  कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए।