सरकारी नौकरी के बाद छूटते खेल

  • 2015-11-21 06:30:58.0
  • उगता भारत ब्यूरो

भूपिंदर सिंह

खेल आरक्षण के अंतर्गत विभिन्न  खेलों के लगभग तीन सौ से भी अधिक खिलाड़ी सरकारी नौकरी प्राप्त कर चुके हैं, मगर आज एक भी ऐसा खिलाड़ी नजर नहीं आ रहा है, जो सरकारी नौकरी में आने के बाद लगातार अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम को जारी रख पाया होज्खेलों में उत्कृष्टता का मतलब है उस प्रदेश व देश का पूर्ण रूप से विकसित होना होता है। खिलाड़ी के उत्कृष्ट प्रदर्शन से जहां उसके शारीरिक रूप से उन्नत होने का पता चलता है, वहीं उसके प्रदेश व देश की खुशहाली का भी अंदाजा हो जाता है। खेलों में खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक प्राप्त करने के लिए दस से 15 वर्ष तक का कठिन प्रशिक्षण प्राप्त करना पड़ता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम जहां खिलाड़ी के विद्यार्थी जीवन से शुरू होता जाता है, वहीं उसके सरकारी नौकरी में पहुंचने तक अभी चल रहा होता है। इसलिए उसे उस समय प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी रखने की बहुत अधिक जरूरत होती है। हिमाचल प्रदेश में धूमल सरकार ने एक दशक पूर्व सरकारी नौकरियों में खिलाडिय़ों को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने पर तीन प्रतिशत पद आरक्षित कर दिए थे। सरकारी नौकरी sarkari naukri
इस खेल आरक्षण के अंतर्गत विभिन्न खेलों के लगभग तीन सौ से भी अधिक खिलाड़ी सरकारी नौकरी प्राप्त कर चुके हैं, मगर आज एक भी ऐसा खिलाड़ी नजर नहीं आ रहा है, जो सरकारी नौकरी में आने के बाद लगातार अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम को जारी रख पाया हो। सरकारी नौकरी में आने के बाद कुछ ही नाम हैं, जो जैसे-तैसे अपना खेल जारी रख पाए हैं। जिलाधीश कार्यालय हमीरपुर में कार्यरत 400 मीटर की राष्ट्रीय पदक विजेता धाविका पुष्पा ठाकुर ने कई वर्षों तक लड़-झगडक़र अपना प्रशिक्षण  कार्यक्रम जारी रखकर हिमाचल को कई बार राष्ट्रीय स्तर पर गौरव दिलाया है। मगर उसे आज तक जब उसे खेल छोड़े आधा दशक से भी अधिक समय हो गया है, फिर भी उसे उस जायज प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी रखने के लिए तंग किया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम, जो कि राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय खेल की तैयारी के मद्देनजर किया जाता है, उसे नियमानुसार आज ड्यूटी माना जाता है, मगर उसके विभाग के बाबुओं को यह नियम पढऩा ही नहीं आता है।इस समय कबड्डी में पूजा ठाकुर व कुश्ती में जौनी चौधरी आदि कई नाम हैं, जो आज सरकारी नौकरी में हैं, मगर क्या उनके प्रशिक्षण जारी रखने के लिए राज्य में कोई कार्यक्रम है। हिमाचल प्रदेश के विभिन्न विभागों में आज कई खेलों के ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ी हैं, उन्हें अगर कुछ वर्षों तक लगातार प्रशिक्षण का प्रबंध करके उनके खेल संघ व राज्य का खेल विभाग मिलकर करते हैं, तो भविष्य में प्रदेश का नाम राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा हो सकता है। हिमाचल प्रदेश पुलिस अपने खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण के नाम पर आज बीस से तीस दिन अधिकतम पूरे वर्ष में समय देने का नियम बता रही है, जबकि खिलाड़ी बनने के लिए लगातार कई वर्षों तक प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी रखना पड़ता है। क्या यह बात हिमाचल प्रदेश पुलिस के अधिकारियों को समझ नहीं आ रही है। बीस हजार से अधिक नफरी वाली पुलिस क्या अपने प्रतिभावान खिलाडिय़ों को, जो गिनती में कुछ दर्जन होंगे, प्रशिक्षण के लिए सेवामुक्त नहीं कर सकती है। हां, यह सच है कि वर्षों पूर्व कई वर्षों तक राज्य पुलिस ने खिलाडिय़ों के लिए प्रशिक्षण शिविर लगाए थे। मगर उन पर उचित निरीक्षण तथा खिलाडिय़ों के न होने से बाद में यह सब बंद ही कर दिया जाता है, जो उचित नहीं है। अति प्रतिभावान खिलाडिय़ों का चयन कर उन्हें अच्छे प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रबंध राज्य पुलिस विभाग को करना चािहए। साथ ही अपने खिलाडिय़ों व प्रशिक्षकों पर नजर भी रखनी होगी, ताकि कामचोर प्रशिक्षक व खिलाड़ी प्रशिक्षण शिविर में घुस न पाएं और फिर उनकी वजह से एक बार फिर से खेल प्रशिक्षण शिविर बंद न हो सकें। वन विभाग के पास भी कई बहुत अच्छे-अच्छे खिलाड़ी हैं। क्या वन विभाग अपने खिलाडिय़ों को आगे बढऩे का कोई कार्यक्रम बना रहा है या वर्ष में एक बार खेल करवाकर अपने को अति प्रतिभावान खिलाडिय़ों के लिए उनके विभागों के साथ मिलकर प्रशिक्षण का प्रबंध करना होगा। अगर ऐसा ईमानदारी से हो पाता है, तभी हिमाचल में खिलाड़ी नौकरी में रहकर खेल कर पाएंगे।यही सबसे बड़ा कारण है कि हिमाचल के बाहर केंद्र सरकार या अन्य राज्यों में जिन खिलाडिय़ों ने नौकरी की, वे काफी आगे तक भारत के तिरंगे को ऊंचा कर पाए हैं। मगर राज्य में नौकरी करने वाले उनके बराबर प्रतिभावान खिलाड़ी यूं ही गुमनामी के अंधेरे में खो गए हैं। खेल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ मुद्दा है। हिमाचल प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों के अधिकारियों को चाहिए कि वे अपने यहां नौकरी कर रहे प्रतिभावान खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण का मौका दें। सरकारी नियमों में खेल प्रशिक्षण राष्ट्रीय स्तर से ऑन ड्यूटी माना जाता है। हिमाचल के बेटे-बेटियों के नाम के साथ भी हिमाचल का नाम हो, जब वे तिरंगे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा कर रहे हों। यह तभी हो सकता है, जब राज्य में कर्मचारी खिलाडिय़ों को प्रशिक्षण का पूरा-पूरा मौका मिलेगा।

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