संयुक्त राष्ट्र और प्रधानमंत्री श्री मोदी की विदेश नीति

  • 2016-06-02 03:43:26.0
  • राकेश कुमार आर्य

मोदी की विदेश नीति

जिस समय संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गयी थी तो उस समय उसकी उद्देश्यिका स्पष्ट करते हुए उसकी प्रस्तावना इस प्रकार लिखी गयी थी-‘‘हम इकरार करने वाले पक्ष अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की वृद्घि के लिए और अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा की स्थापना के प्रयोजन से यह आज्ञानुवर्तिका स्वीकार करके कि युद्घ का आश्रय नही लिया जाएगा, यह निर्धारण करके कि राज्यों में न्याय और सम्मानास्पद संबंध स्थापित किये जाएंगे। यह स्थापित करके कि सरकारों के पारस्परिक व्यवहार के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानून समुचित आधार है, और यह मान करके कि राज्य के रूप में संगठित मनुष्यों को आपस के वर्ताव में सान्धियों का अविकल रूप से पालन तथा न्याय आवश्यक है, राष्ट्र संघ के इस इकरार को स्वीकार करते हैं।’’

संयुक्त राष्ट्र के ये उद्देश्य स्पष्ट करते हैं कि इस वैश्विक संगठन का मूल उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की वृद्घि, शांति और सुरक्षा की स्थापना, किसी भी स्थिति में सहयोग की वृद्घि, शांति और सुरक्षा की स्थापना, किसी भी स्थिति में युद्घ का आश्रय न लेना, राज्यों में न्याय और सम्मानस्पद संबंधों को स्थापित करना है। जिस समय इस वैश्विक संगठन की स्थापना हुई थी उस समय विश्व के सभी देशों में परस्पर अविश्वास का भाव व्याप्त था, सर्वत्र अशांति और असुरक्षा व्याप्त थी। एक देश दूसरे देश का विश्वास करने को तैयार नही था। यही कारण था कि विश्व को बीस वर्ष के अंतराल पर ही दो विश्व युद्घों की विभीषिका में उलझना पड़ा।

इस विश्व संगठन ने कुछ प्रशंसनीय कार्य भी किये हैं, परंतु अपनी स्थापना के पश्चात से अब तक इस वैश्विक संगठन को अपनी न्यायप्रियता और विश्वसनीयता का जिस स्तर पर परिचय देना चाहिए था, उस स्तर पर यह दे नही पाया है। जिससे इसका निरंतर क्षय होता गया है। अमेरिका ने इराक पर आक्रमण किया और उस आक्रमण में कई देशों ने उसका साथ दिया, संयुक्त राष्ट्र ने अमेरिका को ऐसा करने की अनुमति दी बस तब से संयुक्त राष्ट्र आभाहीन होता गया। दूसरी बात ये है कि संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, की दादागीरी चलती है। इनमें से प्रत्येक देश के पास अपनी वीटो पॉवर है, जिसका प्रयोग कर वह संयुक्त राष्ट्र को अपने अनुसार हांक सकता है। इस वीटो पावर ने इन देशों को न्यायशील न रहने दिया है।

अपनी बात मनवाने के लिए तथा संयुक्त राष्ट्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के दृष्टिकोण से ये पांचों देश इस पवित्र वैश्विक संगठन के मंच पर भी अपनी कुटिल चाल चलते रहते हैं। जिससे इस संगठन के मंच पर भी देशों के परस्पर के कलह कटुता और परस्पर ईष्र्या भाव को स्पष्टत: देखा जा सकता है। फलस्वरूप यह संगठन ना तो विश्व में शांति स्थापित कर पाया है और ना ही अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहित कर पाया है। इसने किसी देश की संप्रभुता पर हमला करने की अनुमति देकर अपनी इस पवित्र शपथ को भंग कर दिया है कि हम किसी भी स्थिति में युद्घ का आश्रय नही लेंगे।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट प्राप्त करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को विशेष प्रयास करते हुए देखा है। संप्रग शासनकाल में इस दिशा में चर्चा तो होती थी पर वह किसी सही दिशा में जाती जान नही पड़ती थी। देश का तत्कालीन नेतृत्व अनमने मन से अपनी सीट मांगता था। वह कभी भी यह नही कह पाया कि अंतर्राष्ट्रीय शांति का मूल मंत्र ‘‘ओ३म् द्यौ शांति रन्तरिक्ष...’’ तो हमारे पास है। जिसे हम अपने हर मांगलिक कार्य के यज्ञोपरांत बोलते हैं, और संपूर्ण विश्व में शांति की सकारात्मक ऊर्जा को और भी बलवती करने की प्रार्थना करते हैं। हमारे नेतृत्व की शिथिलता का परिणाम यह निकला कि हमारी बातों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उपेक्षित किया जाने लगा। इससे देश में आत्म विश्वास को ठेस लगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने यू.एन. की नब्ज को टटोला। उन्होंने अपनी स्थायी सीट की प्राप्ति के लिए मुहिम चलायी और पिछले दो वर्षों में हमने देखा कि देश का आत्मविश्वास धीरे-धीरे बढऩे लगा। आज अमेरिका उस स्थिति में है कि वह पाकिस्तान को लताड़ रहा है और भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दिलाने की बात कह रहा है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी अप्रैल 2016 के प्रारंभ में यू.एन. को संबोधित करने पहुंचे। तब उन्होंने इस वैश्विक संगठन की निष्क्रियता और शिथिलता को ललकारते हुए इसके औचित्य पर ही प्रश्न चिह्न लगाने का साहसिक कार्य किया। जिसे कई देशों का समर्थन मिला। विश्व को पता चल गया कि जिस भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से रोका जा रहा है वह उसको मिलनी ही चाहिए क्योंकि यह उसका अधिकार है। प्रधानमंत्री श्री मोदी की सरकार से पूर्व हमारी सरकारें सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट की मांग एक याची के रूप में कर दी थी। जबकि आज हम  उसे अपने एक अधिकार के रूप में मांगते हैं। पिछली सरकार और वर्तमान सरकार की विदेशनीति का यह मौलिक अंतर है। श्री मोदी जब अप्रैल में अपने संयुक्त राष्ट्र दौरे से लौटे थे तब हमने लिखा था-‘ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस समय फिर विदेशी दौरे से लौटे हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में खड़े होकर इस वैश्विक संगठन की निष्क्रियता को बड़े स्पष्ट शब्दों में ललकार कर इसे चेतावनी देने का अद्भुत और साहसिक कार्य किया है। इस संगठन ने अपनी निष्क्रियता दिखाकर या कुछ खास शक्तियों  के हाथों की कठपुतली बनकर विश्व को तीसरे महायुद्घ की ओर धकेल दिया है। इसलिए भारत के प्रधानमंत्री मा. नरेन्द्र मोदी का यह कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है कि-‘‘अगर आप आतंकवाद के बारे में पूछेंगे तो संयुक्त राष्ट्र को अभी तक नही पता कि आतंकवाद क्या है और उससे कैसे निपटा जाए? चूंकि उसका (संयुक्त राष्ट्र का) जन्म भीषण युद्घों के फलस्वरूप हुआ। इसीलिए वह इससे परे कुछ सोच नही पाता। ..आतंकवाद के नये युग और मानवता के लिए चुनौती होने के बावजूद इस खतरे से निपटने में दुनिया की प्रमुख संस्था अपने दायित्वों का निर्वाह नही कर पा रही है।’’इस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री की हाल ही यह यात्रा स्पष्ट करती है कि वह एक विश्व राजनेता के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुके हैं  कारण कि एक विश्व राजनेता ही विश्व संस्था को इस प्रकार आईना दिखाने का साहस कर सकता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की विदेश यात्राओं को लेकर विपक्ष प्रारंभ से ही काफी आक्रामक रहा है। विपक्ष की आलोचना समझ में नही आती-विशेषत: उस कांग्रेस की जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी को निरर्थक विदेश यात्राओं का ऐसा चस्का लगा था कि लोग यह मानने लगे थे कि राजीव गांधी इस देश के प्रधानमंत्री न होकर विदेश के प्रधानमंत्री हैं। हमें इस विषय में किसी भी प्रकार की आवश्यक आलोचना के अतिरेक से बचना चाहिए। कारण कि प्रत्येक प्रधानमंत्री के विषय में यह सत्य होता है कि वह अपने देश का नेता तो होता ही है साथ ही विदेशों में वह अपने देश की आवाज भी होता है। इसलिए उसे विदेशों में अपने मित्र ढूंढऩे पड़ते हैं। देश के हितों की सुरक्षा विदेशों में देश का प्रधानमंत्री ही करता है, इसलिए किसी भी देश की विदेश नीत के निर्धारण में उस देश के प्रधानमंत्री की विशेष भूमिका होती है। यदि प्रधानमंत्री कमजोर है और आत्मविश्वास से भरा नही है तो विदेशों में कूटनीति की शतरंजी चालों में वह अपने देश के हितों की रक्षा नही कर पाएगा। विदेशी दौरों को दो उद्देश्यों से किया जाता है-प्रथम तो अपने देश के लिए विदेशों में मित्र खोजना दूसरे कूटनीति के स्तर पर अपने शत्रुओं को झटका देना।




प्रधानमंत्री मोदी जी जब देश के प्रधानमंत्री बनने के लिए गुजरात से दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे तो उनके विरोधी उन पर जिन आरोपों को लगाया करते थे उनमें से एक यह भी था कि उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई पहचान नही है और उन्हें विश्व स्तर पर कोई जानता तक नही है। जब वह देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने देखा कि देश की सारी सीमाएं असुरक्षित हैं, गुजरात से लेकर कश्मीर तक पाकिस्तान सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा था तो कश्मीर से लेकर अरूणाचल प्रदेश की विस्तृत सीमा पर चीन उपद्रव मचाता रहता था। इतना ही नही बांग्लादेश भी भारत को आंखें दिखाता था।

मोदी जी के लिए यह एक चुनौती थी कि इन सबको रास्ते पर कैसे लाया जाए। उनके विरोधी उन्हें केवल ‘साम्प्रदायिक आग लगाने वाला’ सिद्घ करना चाहते थे-जिसका अभिप्राय था कि वह ‘विनाश’ के प्रतीक हैं। उधर मोदी जी स्वयं को ‘विकास’ के साथ जुड़ा दिखाना चाहते थे जबकि सर्वत्र विनाश के काले बादल छाये थे। ऐसे में उनके लिए बड़ी चुनौती यही थी कि वह विनाश के बादलों को छांटें और बिना किसी युद्घ के छांटें।राजनीति में कूटनीति साथ-साथ चलती है। राजनीति जहां व्यक्ति को सीधा चलने के लिए और जनाधार को अपने साथ लगाये रखने के लिए प्रेरित करती है, वहीं कूटनीति व्यक्ति को छुपकर खेलने के लिए प्रेरित करती है। वास्तव में कूटनीति वह चीज है जो व्यक्ति को राजनीति में सफलता पर पहुंचाती है।

जो लोग कूटनीति को कपटनीति मानते हैं उनका शीघ्र ही पतन हो जाता है पर जो कूटनीति को अपने देशवासियों की सुरक्षा, शांति और विकास के लिए प्रयोग करते हैं, ऐसे लोग सफल राजनेता बन जाया करते हैं। यह मोदी जी हैं जिन्होंने पाकिस्तान में स्थित दुग्र्याणा मंदिर को बनाने में वहां की सरकार को प्रेरित किया है, और 70 वर्ष में पहली बार पाकिस्तान में किसी मंदिर का विध्वंस न होकर निर्माण हो रहा है, सऊदी अरब में भव्य मंदिर बनाने के लिए वहां की सरकार ने बड़ी धनराशि इस पवित्र कार्य के लिए दी है, पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं ने पहली बार होली का त्यौहार मनाया है। जो लोग कहते हैं मोदी जी देश की छवि खराब कर रहे हैं, वे बतायें कि इन कार्यों से देश की छवि बनी है या बिगड़ी है?

मोदी जी अपने देश की शांति-सुरक्षा और विकास के प्रति समर्पित हैं, इसलिए उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं के संदर्भ में भी इसी  मार्ग को अपनाया है। उन्होंने चीन को उसके शत्रुओं से और उसके पड़ोसी देशों से घेरने में सफलता प्राप्त की है। जिसका परिणाम यह आया है कि पिछले ड़ेढ़ वर्ष से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर चीन भारत को दूसरे नजरिये से देखने लगा है, यह ठीक है कि उसने अजहर मसूद के प्रकरण में फिर भारत को यूएन में घेरने की कोशिश की है, पर यह भी देखने लायक बात है कि भारत फिर उससे नजरें तरेर कर बात करने की स्थिति में है, और यह हमारे नेतृत्व का ही चमत्कार है कि हम इस स्थिति में हैं। चीन की सक्रियता अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर घटी है और भारत की बढ़ी है। भारत ने लगभग दो सौ देशों को अपने पक्ष को लेकर ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ की घोषणा करायी साथ ही वह चीन-पाक की नापाक दोस्ती को विश्व मंचों पर इस प्रकार स्पष्ट करने में सफल रहा है कि ये दोनों देश दक्षिण एशिया में सैन्य असंतुलन उत्पन्न कर इसे विनाशकारी युद्घ की भूमि बनाने के लिए सक्रिय हैं। अपने इस मिशन में सफलता पाने के लिए प्रधानमंत्री जी ने अनेकों विदेश यात्राएं की। वह जहां भी गये वहीं उन्हें अभूतपूर्व सम्मान मिला। उनकी बातों को हर राष्ट्राध्यक्ष ने बड़े मनोयोग से सुना और हमने देखा कि उनकी यात्रा से हर वह देश भारत के साथ खड़ा होने के लिए स्वत: स्फूत्र्त प्रेरणा से प्रेरित होता दिखा, जिसकी वह यात्रा करके लौटे थे। इस प्रकार प्रधानमंत्री को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर न केवल मित्र मिले अपितु उन्हें कूटनीतिक सफलता भी मिली। कूटनीति का अभिप्राय ही यह है कि बंदूक की गोली पश्चिम दिशा में दागी जाए और उसका निशाना हो पूरब में खड़ा हमारा कोई शत्रु।

आज मोदी जी इसी नीति का परिणाम है कि पाकिस्तान हमें आतंकी घटनाओं में सहयोग कर रहा है। चीन नेपाल से अपने आपको दूर रख रहा है। चीन के सैनिकों से सीमा पर हमारा जवान अब आंख में आंख डालकर बात करता है। बांग्लादेश सीमा में रहकर मर्यादित भाषा बोलता है। बर्मा, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश भारत को अपना संरक्षक मान रहे हैं। दुनिया भारत को शांति के प्रति संकल्पबद्घ देश मान रही है।  भारत विकास की ओर बढ़ रहा है। अब जो विपक्ष मोदीजी को ‘विनाश पुरूष’ कहता था और मानता था कि उनके आने पर भारत को अपनी अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाने में कष्ट होगा-उसके पेट में दर्द होना स्वाभाविक है-क्योंकि विश्व में चारों ओर ‘भारत माता की जय’ बोली जा रही है, और विपक्ष इस बात पर राजनीति कर रहा है कि भारत में भारत माता की जय बोली जाए या न बोली जाए?  कूटनीति की गोली कांग्रेस को भी लगी है-अब उसने ओवैसी का साथ न देकर देश का साथ दिया है और ‘भारत माता की जय’ बोलने को ही अच्छा माना है। इसे वर्तमान में दुर्दशाग्रस्त भारतीय राजनीति का एक शुभसंकेत माना जा सकता है कि कांग्रेस भारत माता की जय बोलने वालों के साथ है।’