संविधान अपना राजधर्म घोषित करे

  • 2016-01-28 02:30:10.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमारे संविधान में कोई भी ऐसा अनुच्छेद नहीं है जिसे संविधान का राजधर्म कहा जा सके। संविधान राजनीतिक लोगों की आचार संहिता भी होता है। आचार संहिता को लागू करने के लिए राजनीतिज्ञों का राजधर्म सम्बंधी प्राविधान होना भी आवश्यक है।

विश्व के प्राचीनतम संविधान वेद ने शासक वर्ग के कत्र्तव्यों को ‘राजधर्म’ मानते हुए घोषण की है कि-

‘कोई भी दुष्ट दुराचारी अन्यायकारी हम पर शासन न करे।

हमारी वाणी पर पाबन्दी लगाने वाला, अर्थात भाषण और

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन करने वाला, हम किसानों से हमारी भूमि छीनने वाला तथा हम पशु पालकों से हमारी गौ आदि पशु छीनने वाला व्यक्ति अर्थात ऐसा व्यक्ति कि जो व्यक्तियों की आजीविका के साधनों का हनन करने वाला हो, हमारा शासक न बने। भेडिय़ा बकरियों का राजा कदापि न बनाया जाये। हे ईश्वर! हमारी ऐसी प्रार्थना को सुनकर आप हमारी रक्षा करें।’ (अथर्ववेद)inm_21012_p_consitution

आपातकाल में इन्दिरा गांध्ी ने देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लिये थे। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता समाप्त कर दी गयी थी। आज किसानों की भूमि बिना उनकी स्वीकृति एवं सहमति के छीनी जा रही है। किसान आतंकित हैं कि किसी भी योजना का बहाना लेकर उसकी भूमि उससे छीनी जा सकती है।

भूमि लेने के लिए सरकारें किसानों की मांगों के अनुरूप नहीं, अपितु अपनी इच्छानुसार भूमि का मूल्य निर्धारित करती हैं, और अपनी शर्तो के अनुसार भूमि अधिग्रहण करती हैं। इस प्रकार भूमि को किसान से छीना नहीं जायेगा। यह राजधर्म हमारे संविधान में स्पष्टत: उल्लेखित होना चाहिए।

स्वतन्त्रता के उपरान्त हमने चर्मकार, वस्त्रकार, कुम्भकार वर्ण के लोगों के कुटीर उद्योगों को पूर्णत: उपेक्षित कर दिया। मशीनी युग में प्रवेश करके भारत के कितने ही लोगों का परम्परागत व्यवसाय/आजीविका का साधन उनसे छीन लिया। जबकि समाजवादी व्यवस्था की मांग थी कि हम अपने ऐसे कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करते और उन्हें आर्थिक सहायता भी प्रदान करते। मानव के हाथ से उसका व्यवसाय छीनकर उसका लाभ हमने जिस प्रकार एक उद्योगपति को पहुँचाने का प्रयास किया है वह पूंजीवादी व्यवस्था का पक्ष पोषण करता है। बड़े उद्योगों के हम विरोधी नहीं हैं। किन्तु देश में बढ़ती बेरोजगारी और भिक्षावृत्ति की अमानवीय परम्परा हमारे लिए कष्टकारी और चिन्ता का विषय है। इस पर संविधान को मुखर होना चाहिए था-स्पष्ट होना चाहिए था। चोरों को सत्ता से दूर रखने के लिए विशेष रक्षोपाय घोषित करने चाहिए थे। ‘कमीशन’ नामक रोग आज देश में ऊपर से नीचे तक फेेल गया है। इस ‘कमीशन’ ने ही राजधर्म का रूप ले लिया है। हम यह मान लेते हैं कि ‘कमीशन’ को राजधर्म घोषित करना भी इस संविधान का उद्देश्य नहीं था किन्तु यह भी तो सत्य है कि यह ‘कमीशनवादी व्यवस्था’ इसी संविधान की दुर्बलताओं की परिणति है। इसलिए हमारा मानना है कि संविधान अपने राजधर्म को वेद की शैली में ही स्पष्ट करे। इस संविधान ने देश में लोकतन्त्रात्मक तानाशाही की स्थापना की है। जिसके विषय में शतपथ ब्राह्यण में आया है-

‘यदि राजवर्ग पर प्रजा का नियंत्रण न रहे तो राजवर्ग प्रजा का ऐसे नाश कर देता है जैसे जंगल में शेर सभी हष्टपुष्ट पशुओं को मारकर खा जाता है। इसलिए किसी एक को स्वतन्त्र शासन का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।’ ‘वैदिक ग्रन्थों में सभापति को ही राजा या राष्ट्रपति कहा गया है। यह राजा या राष्ट्रपति कोई वंशानुक्रम का व्यक्ति नहीं होता अपितु प्रजा द्वारा चुना हुआ ही होता है। शास्त्रों में ऐसा बताया गया है कि राजा के ऊपर सभा का नियन्त्रण, सभा के ऊपर राजा का, प्रजा के ऊपर सभा का तथा राजा और सभा दोनों के ऊपर प्रजा का नियन्त्रण रहना चाहिए।’

हमारा संविधान भी ऐसी ही व्यवस्था करता हुआ सा जान पड़ता है, किन्तु इसके उपरान्त भी राजा और सभा पर प्रजा का नियन्त्रण कैसे हो, यह कहीं स्पष्ट नहीं? ‘वयस्क मताधिकार’ की व्यवस्था नियन्त्रणात्मक व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण नहीं कर पायी है, जो कि एक निराशाजनक पक्ष है। शासकदल लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल कई बार प्रधानमंत्री पर अंकुश स्थापित नहीं कर पाया है। प्रधानमन्त्रियों ने स्वयं को सभा से ऊपर प्रदर्शित किया है। आज हमारी राज्यव्यवस्था अनियन्त्रित है।

सारी व्यवस्था को वंशानुगत बना दिया गया है। नेहरू वंश की पारिवारिक वंशानुक्रम व्यवस्था को भारत में बलात आरोपित करने के लिए जो लोग पानी पी पीकर गालियां दिया करते थे उन्होंने स्वयं अपना ‘आदर्श’ कुचल दिया है। ऐसे लोगों के नाम गिनाने की आवश्यकता नहीं है। इनकी संख्या अंगुलिगणेय मात्र नहीं है।

लोकतन्त्र का इस प्रकार अपहरण किया गया है कि सारी व्यवस्था ही चरमरा गयी है। विधायक और सांसद विधानसभाओं में तथा संसद में ‘रबर-स्टाम्प’ बने बैठे हैं। उनका नेता जैसे चाहे, जब चाहे, जहाँ चाहे उनका उपयोग कर सकता है।

मनुस्मृति में आया है-

यत्रा धर्मोहि अधर्मेण सत्यं यत्रा अनृतेन च।

हन्यते प्रेक्षमाणानो हतरस्तत्र सभासद:।।

अर्थात जिस सभा में अधर्म से धर्म यानि अन्याय से न्याय और असत्य से सत्य सब सभासदों के देखते हुए मारा जाता है, उस सभा में सब मुर्दे के समान हैं।’ इसलिए हमारे विधायकों व सांसदों के लिए भी यह अनिवार्य व्यवस्था की जानी चाहिए कि वे न्यायसंगत पक्ष पर अपने विचार अवश्य रखें। ‘पार्टी व्हिप’ का अंकुश उन पर नहीं लटकना चाहिए। ‘पार्टी-व्हिप’ को लोकतन्त्र के विरूद्घ माना जाना चाहिए। राष्ट्रहित में अपने विचार प्रकट करने की छूट सभी को मिलनी चाहिए।