संस्कृति के विनाश की सबको मिल गयी छूट

  • 2016-05-10 04:56:05.0
  • राकेश कुमार आर्य

culture
कई नये राज्य बनने से समाज में कई नई राजनीतिक अपेक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं ने जन्म लिया। उदाहरण के रूप में अधिक राज्य बन जाने से राजनीतिक दलों के नेताओं के भीतर यह भाव विकसित हुआ कि यदि अधिक राज्य होंगे तो कहीं ना कहीं मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिल सकता है। कुमारी मायावती ने उत्तर प्रदेश का विभाजन चार प्रदेशों में कराने का निर्णय लिया, इसके पीछे उनकी भी यही सोच कार्य कर रही थी कि यदि उत्तर प्रदेश का विभाजन चार प्रांतों में हो जाता है तो उनकी पार्टी के दो-चार मुख्यमंत्री हमेशा किसी न किसी प्रदेश में बने रह सकते हैं। छोटे राज्यों की मांग के समर्थन में चौ. अजीत सिंह भी इसीलिए रहते हैं कि पूरे प्रदेश में मैदानी लड़ाई लडक़र अपने उद्यम और पुरूषार्थ के बल पर उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना तो उनके लिए असंभव है, पर यदि उनकी पसंद का ‘हरित प्रदेश’ बन जाता है तो उसका मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना कभी न कभी पूरा हो सकता है। इसी प्रकार के ‘अजीत मार्का’ छोटे राज्यों के समर्थक नेता या दल लगभग हर प्रांत में हैं। उनमें से अधिकांश ऐसे हैं जो लोगों में विद्रोह की चिंगारी सुलगा सुलगाकर अलग राज्य बनाने की मांग को हवा देते रहते हैं। लोक कल्याण और जनहित का गीत गाने वाले इन राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों का वास्तविक उद्देश्य निहित स्वार्थ होता है। पर उस निहित स्वार्थ को लोक कल्याण के रूप में प्रस्तुत करने में हमारे राजनीतिज्ञों का विश्व में भी कोई सानी नही है, अपने निहित स्वार्थ की पूत्र्ति के लिए राजनीतिक दल लोगों में भाषा, संप्रदाय, जाति, पिछड़ापन विकास में आने वाली बाधाओं और शिक्षा-स्वास्थ्य की समस्याओं को इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं, जैसे कि अलग प्रांत बनते ही ये सारी समस्याएं-छूमंतर हो जाएंगी। पर आंकड़े बताते हैं कि छोटे राज्यों में भी विकास आदि की स्थिति संतोषजनक नही है।

छोटे राज्यों की मांग करने वाले राजनीतिक दल (विशेषत: उत्तर प्रदेश में) हरियाणा का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि उसने कम समय में अधिक विकास किया है। पर आंकड़े बताते हैं कि हरियाणा (‘हरि’ राजा का ‘अरण्य’-जंगल) का क्षेत्रफल 44,212 वर्ग कि.मी. है। जबकि इसकी जनसंख्या 2,53,53,081 (2011 की जनगणना के अनुसार) है। यहां की जनसंख्या का घनत्व 573 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है। हरियाणा का लिंगानुपात 877 महिलाएं (प्रति एक हजार पुरूषों पर) है। यह प्रांत भारत का सर्वाधिक न्यूनतम लिंगानुपात वाला राज्य है। यहां की साक्षरता 76.10 प्रतिशत है। ये सारे आंकड़े 2011 के हैं। शिक्षा, उद्योग, कृषि विकास एवं लोगों की बेरोजगारी दूर करने के क्षेत्र में भी हरियाणा ने पूरी तरह बाजी मार ली ऐसा नही कहा जा सकता।

अब सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु प्रांत की ओर चलें। इस प्रांत का क्षेत्रफल हरियाणा से लगभग तीन गुणा अधिक है अर्थात 1,30,058 वर्ग किमी. है। इसी प्रकार जनसंख्या भी लगभग तीन गुणी अर्थात लगभग 7.25 करोड़ है। यहां का जनसंख्या घनत्व 555 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है। इस प्रांत का, लिंगानुपात 995 महिलाएं प्रति हजार पुरूषों पर है, अर्थात हरियाणा की अपेक्षा लगभग शत-प्रतिशत लिंगानुपात यहां है। जिसका अभिप्राय है कि छोटे राज्य हरियाणा में ‘कन्याभू्रण हत्या’ अधिक हो रही है,-तमिलनाडु की अपेक्षा। दिल्ली से सर्वाधिक दूरी पर स्थित इस प्रांत में सामाजिक और नैतिक चेतना हरियाणा की अपेक्षा कहीं अधिक है, भारत के प्राचीन संस्कारों के प्रति लगाव कहीं अधिक है-तभी तो यह प्रांत, लिंगानुपात को अच्छी स्थिति में रख पाने में सफल हो सका है। इस प्रांत ने साक्षरता में भी हरियाणा को पीछे छोड़ दिया है। आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि छोटा राज्य हो जाने से विकास नही होता है अपितु ‘बड़ा दिल’ बनाये रखने से और ‘राजनीतिक इच्छाशक्ति’ को बनाये रखकर ‘सबका विकास और सबका साथ’ बनाकर चलने से विकास होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग आदि में भी तमिलनाडु की स्थिति हरियाणा की अपेक्षा बेहतर है।

अब आते हैं उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की ओर। इस राज्य के विषय में भी 2011 के उपलब्ध आंकड़े हमें बताते हैं कि इस प्रांत का क्षेत्रफल 2,40,928 वर्ग किमी. है। 2011 की जनसंख्या के अनुसार इस प्रांत की जनसंख्या 19,95,81,477 है। इस प्रकार यह प्रांत भारत का सबसे अधिकतम जनसंख्या वाला प्रांत है। यहां जनसंख्या घनत्व 828 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है। प्रदेश का लिंगानुपात 908 महिलाएं प्रति हजार पुरूषों पर हैं। जबकि साक्षरता दर 69.25 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश के साथ दक्षिण के कर्नाटक की स्थिति देखिए। 2011 की जनसंख्या के आंकड़े इस प्रांत के विषय में हमें बताते हैं कि इस राज्य का क्षेत्रफल 1,91,791 वर्ग किमी. है। यहां की जनसंख्या 6,11,30,704 है। प्रदेश का जनसंख्या घनत्व 319 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है। जबकि यहां का लिंगानुपात 988 महिलाएं प्रति हजार पुरूषों पर और साक्षरता 75.49 प्रतिशत है। आप देख रहे हैं कि कर्नाटक उत्तर प्रदेश से जनसंख्या में तीन गुणा कम है। जबकि क्षेत्रफल में तीन गुणा कम नही होकर केवल 49,000 वर्ग किमी. कम है। जनसंख्या घनत्व उत्तर प्रदेश में जहां 828 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है, वहीं कर्नाटक में केवल 319 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. है। परंतु साक्षरता उत्तर प्रदेश से कुछ ही अधिक है। इसका अर्थ है उत्तर प्रदेश बहुत पिछड़ा हुआ प्रांत नही है। समस्याएं हर स्थान पर हैं। कहीं किसी के पास जादू की छड़ी नही है कि जिसे घुमा देने से सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

अब पूर्वोत्तर भारत की ओर चलते हैं। यहां कई छोटे-छोटे प्रांत हैं। जिनके नाम हैं-अरूणांचल प्रदेश, आसाम, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड। इनमें से (2011 के आंकड़ों के अनुसार) आसाम की जनसंख्या का 73.04 प्रतिशत भाग साक्षर है। जबकि अरूणाचल में 66.63 प्रतिशत, मेघालय में 75.48 प्रतिशत, मिजोरम में 91.56 प्रतिशत, मणिपुर में 79.83 प्रतिशत, त्रिपुरा में 87.67 प्रतिशत और नागालैंड में 80 प्रतिशत साक्षरता है।

पूर्वोत्तर भारत के इन सातों प्रांतों को ‘पूर्व की बहनें’ भी कहा जाता है। इन प्रांतों में साक्षरता का अच्छा आंकड़ा दिखाई देता है, जिसे भारत के लोकतंत्र ने अपनी उपलब्धि के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया है। पर वास्तविकता यह है कि यहां की साक्षरता की अच्छी प्रतिशतता लोकतंत्र की पराजय है। यहां हमारी राजनीति और हमारा लोकतंत्र मतिभ्रम का शिकार हुआ है, छद्म धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ गया है। कारण कि पूर्वोत्तर भारत के इन प्रांतों में हमने ईसाई मिशनरीज को खुलकर कार्य करने की छूट दे दी है। फलस्वरूप ईसाई मिशनरीज ने धड़ाधड़ भारतीय धर्म पर कुठाराघात करना आरंभ कर दिया और यहां के लोगों का भारी संख्या में धर्मांतरण कर उन्हें शिक्षित और साक्षर बनाना आरंभ कर दिया। इन प्रांतों में लोगों को अपने ही देश के विरूद्घ विद्रोही बनाने की शिक्षा दी जाती है, उसी शिक्षा को हमारा लोकतंत्र इन प्रांतों की साक्षरता दर में सम्मिलित करता है और धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ी हमारी राजनीति उस पर ताली बजाती है। देश को पता तब चलेगा जब यहां भी ‘ईसाई स्थान’ की मांग प्रबलता से सामने आएगी। ‘पराजय’ पर शोक करना चाहिए आत्ममंथन करना चाहिए, मुंह फेरकर निकलने वाली राजनीति को ‘देश निकाला’ देना चाहिए। पूर्वोत्तर भारत को हम अपनी ‘भूलों का क्षेत्र’ बनाते जा रहे हैं। इससे पहले कि यह क्षेत्र हमारी ‘भूलों का स्मारक’ बने हमें आत्मविस्मृति के गहवर से बाहर आना चाहिए। हमने पूर्वोत्तर को छोटे-छोटे प्रांतों में बांट दिया, इसलिए कि वहां का विकास हो, और फिर उसे ईसाई मिशनरीज को उनका भोजन बनाकर उनके सामने फेंक दिया, यह समझकर कि यह क्षेत्र पथरीला, अनुपजाऊ और बेकार है। इस उपेक्षावृत्ति को समझने का प्रयास किया जाए और इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए कि छोटे राज्यों से अच्छा विकास होता है जैसे राजनीति इन सात छोटे राज्यों का राजनीतिक विकास नही कर पायी है वैसे ही उत्तराखण्ड और झारखण्ड का छत्तीसगढ़ की स्थिति भी दृष्टव्य है। उनके आंकड़े हमें जो कुछ बताते हैं वह भी इस धारणा को भ्रामक और मिथ्या सिद्घ करते हैं कि छोटे राज्यों से अच्छा विकास होता है। देश की स्थिति को देखकर बस यही कहा जा सकता है :-

राजनीति के खेत में अक्ल को चर गयी भैंस।
कत्ल वतन का कर रहे, हो हथियारों से लैस।।
अब चारों तरफ यहां हो रही देशधर्म की लूट।
संस्कृति के विनाश की सबको मिल गयी छूट।।

राकेश कुमार आर्य ( 1596 )

उगता भारत Contributors help bring you the latest news around you.