संस्कार शालाएं बन जाएं निर्माण शाला

  • 2016-02-03 03:30:55.0
  • राकेश कुमार आर्य

प्राचीनकाल में एक हंस नामक संन्यासी हुए हैं। हमारे संन्यासियों व ऋषि-मुनियों के नाम उनके गुण-कर्म और स्वभाव के अनुसार ही दिये जाते थे। हंस ऋषि को भी यह नाम इसीलिए मिला था कि वह हंस की भांति नीर-क्षीर विवेक शक्ति संपन्न थे। उन्हीं हंस ऋषि के वाणी संयम संबंधी उपदेश पर प्रकाश डालते हुए विदुर कहते हैं कि हे देवो! मैंने बड़ों से वह कत्र्तव्य उपदेश सुना है कि धृति, शम और सत्य धर्म का निरंतर पालन करने से हृदय की ग्रंथियां खुल जाती हैं जिससे मनुष्य मित्र और शत्रु से अपने समान बर्ताव करने लगता है। उत्तम मनुष्य गाली खाता हुआ भी गाली न दे, क्योंकि सहनशील का मन्यु गाली देने वाले को जला देता है और गाली देने वाले के पुण्य को वह प्राप्त कर लेता है। मनुष्य न गाली देने वाला और न ही किसी का तिरस्कार करने वाला हो। न ही मित्र द्रोह करे और न नीच का सेवक हो, न ही अभिमानी हो और न ही हीनवृत्त (आत्महीनता) वाला हो, रूखी वाणी मनुष्यों के मर्म-हृदय और प्राणों को जला देती है। अत: धर्म प्रेमी जलाने वाली रूक्षण वाणी का सदा त्याग करे। मर्मघाती, कठोर, रूखे वचनों और वाणी रूपी कंटकों से दूसरों को दुखाने वाले मनुष्य को सबसे अधिक अभागा और मुख में पाप का धारण करने वाला जाने। विरोधी यदि निरंतर सूर्य व अग्नि के समान जाज्वल्यमान, अत्यंत तीखे वचन रूप बाणों से बींधे तो वह बींधा गया ज्ञानी जलाया जाकर भी यह समझे कि यह मेरे कुकर्मों का संचय कर रहा है।

हमारी यह शिक्षा प्रणाली थी-जिसमें किसी जिज्ञासु की जिज्ञासा को हमारे ऋषि लोग इसी प्रकार शांत कर दिया करते थे। इस प्रकार की शिक्षा से देश का सामाजिक परिवेश ऊंचा रहा करता था, शुद्घ पवित्र और सबके प्रति सहिष्णु रहा करता था।ashram brahmacharya

इसके विपरीत आज की शिक्षा प्रणाली अत्यंत दूषित हो चुकी है। इस शिक्षा प्रणाली में व्यापक स्तर पर अशुद्घता और अपवित्रता का प्रवेश हो चुका है। हमारे यहां ऋषियों के आश्रमों में और विद्यालयों में बच्चे साफ सफाई का कार्य स्वयं करते थे। इतना ही नही स्वयं प्राचार्य और आचार्य भी ‘अपना कार्य अपने आप’ के आदर्श पर कार्यशील रहते थे। उससे बच्चे को सेवा संस्कार की भावना से परिचय होता था। परसेवा को बच्चा अपना धर्म मानता था और उसके भीतर अहंकार शून्यता का विकास होता था। यही कारण था कि हमारे प्राचीन समाज में राजा और रंक के बच्चे साथ-साथ पढ़ते थे। उसके परिणाम स्वरूप समाज में अस्पृश्यता की भावना पनपती ही नही थी। लार्ड मैकाले प्रणीत शिक्षा प्रणाली में इस सेवाभावी व्यवस्था और अहंकारशून्य मानसिकता का सर्वथा लोप होता चला गया। इसका कारण यह है कि इस शिक्षा प्रणाली ने बच्चों में अंतर करना आरंभ किया। इसने निर्धन के बच्चे को और अशिक्षित माता-पिता के बच्चे को पढ़ाना ही उचित नही माना। आज भी कितने ही इंग्लिश मीडियम स्कूल ऐसे हैं जिनमें निर्धन या अशिक्षित माता-पिता के बच्चों का प्रवेश वर्जित है। इस पश्चिमी शिक्षा प्रणाली के दीवाने लोग एकलव्य का उदाहरण देकर यह सिद्घ करने का प्रयास करते हैं कि प्राचीनकाल में शिक्षा की समानता नही थी। ऐसे लोगों को चाहिए कि वह आज की शिक्षा प्रणाली को तनिक ध्यान से देखें तो उन्हें पता चल जाएगा कि इसने तो कितने ही ‘एकलव्यों’ को शिक्षा के मौलिक अधिकार से वंचित कर दिया है। इस देश में आज हजारों-लाखों ‘एकलव्य’ हैं जो अच्छे विद्यालयों की ओर देखने तक का भी साहस नही कर पाते हैं।

शिक्षा प्रणाली में आये दोषों के कारण बच्चे अपने अध्यापकों के प्रति भी सेवा भावी नही रह गये हैं। वहां से निकलकर वह अपने माता-पिता और बड़ों के प्रति भी असहिष्णु होते जा रहे हैं। नित्यप्रति इस प्रकार की असहिष्णुता बढ़ती जा रही है और देश की सामाजिक संस्थाएं एवं पूरा का पूरा राजनीतिक तंत्र इस ओर से आंखें मूंदे बैठे हैं। ये असहिष्णु बच्चे राजनीति में जाकर देश में असहिष्णुता का निर्माण कर रहे हैं। जिसका परिणाम यह आया है कि देश में राजनीतिक गाली गलौच का माहौल बड़ी तेजी से बढ़ा है।

हमारे राजनीतिज्ञ भूल गये हैं कि सत्य को कैसे बोला जाता है? क्योंकि वह व्यापारिक संस्थानों में पढ़े हैं, और उन्होंने साधना की राह न पकडक़र व्यापार की अर्थात स्वार्थ की राह पकड़ी है। उन्हें नही पता कि यदि कोई सज्जन की सेवा करता है अथवा असज्जन की, तपस्वी की अथवा चोर की सेवा करता है, तो वह उन सेव्यों के वश में वैसे ही हो जाता है जैसे वस्त्र रंग के अधीन हो जाता है। किसी के संबंध में न स्वयं अत्युक्ति करे और न दूसरों से कराये। जो मनुष्य चोट  खाकर भी न तो चोट करे और न दूसरों से कराये, और जो पापी को भी नही मारना चाहता, ऐसे पुरूष की निष्काम ज्ञानी भी स्पृहा करते हैं। बोलने से न बोलने को अच्छा माना जाता है। यदि बोला हुआ सत्य है तो वह पहले से अधिक श्रेष्ठ है। यदि सत्य कथन को प्रिय करके कहे तो वह तृतीय अर्थात अधिक श्रेष्ठ है। यदि सत्य तथा प्रिय वचन को धर्मयुक्त करके कहे तो वह चतुर्थ अर्थात सर्वश्रेष्ठ है। मनुष्य जैसों के साथ उठता बैठता है और मेल मिलाप करता है, वैसा ही हो जाता है।

हमारे राजनीतिज्ञ इस समय हमाम में नंगे हैं। इनकी भाषा में शालीनता नही है-मसखरापन है। जनता को हंसाने के लिए व्यंग्य कसते हैं और मौलिक मुद्दों से उसका ध्यान हटाकर अपनी वोटों की राजनीति करते हैं। इनमें से शायद एक भी ऐसा उत्तम साधक नही है जो किसी से न हारता है और न दूसरों को जीतना चाहता है, न किसी से वैर करता है और न किसी के साथ प्रतिघात करता है, निंदा और प्रशंसा  में एक स्वभाव रखता है, न शोक करता है और न हर्ष करता है, सबका कल्याण चाहता है, किसी के प्रति अकल्याण का विचार नही करता, सत्यवादी कोमल-स्वभाव, जितेन्द्रिय है।

आज राजनीति की फसल को शिक्षा प्रणाली के कुसंस्कारों की बाढ़ मार गयी है। राजधर्म केवल गालियों का व्यापार कर रहा है उसमें से धृति-शम और सत्य धर्म का लोप हो गया है। जिसका परिणाम जनता की मानसिकता में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। इस स्थिति को रेाकने का एकमात्र उपाय है कि शिक्षा में व्यापक परिवर्तन किये जाएं, शिक्षा पर सरकार का नियंत्रण हो, ना कि व्यापारियों का। व्यापारियों  का व्यापार यथाशीघ्र बंद किया जाए। संस्कारों की संस्कारशालाएं स्थापित की जाएं और उन संस्कारशालाओं में राष्ट्र का भविष्य ढाला जाए, पाला जाए। संस्कारशालाएं निर्माणशालाएं बन जाएं-क्योंकि राष्ट्र स्वयं एक महान संस्था है। केन्द्र की मोदी सरकार इस ओर जितनी शीघ्रता से ध्यान देगी उतना ही अच्छा होगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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