संसार का मर्यादा पथ: ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’

  • 2016-03-19 03:30:38.0
  • राकेश कुमार आर्य

योग भारतीय संस्कृति का प्राण है। योग का शाब्दिक अर्थ जोडऩा है। आत्मा का परमात्मा से मिलना योग की अंतिम अवस्था है। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाना मोक्षावस्था है-मुक्ति की अवस्था है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष  में से अंतिम अवस्था मोक्ष की है, जिसे भारतीय संस्कृति में व्यक्ति के जीवन का अंतिम ध्येय माना गया है। यह मोक्ष या मुक्ति या स्वतंत्रता है क्या? अब यह जानना भी आवश्यक है।

मानव जीवन में स्वतंत्रता का प्रमुख स्थान है, पश्चिमी जगत के विद्वानों ने स्वतंत्रता को उतनी गहराई से नही जाना-समझा-जितना हमारे ऋषि-मुनियों ने जाना समझा था। बंधनों से मुक्त हो जाना अर्थात आवागमन के चक्र से छूट जाना मोक्ष है। हमारे ऋषियों ने मुक्ति की नींव खोदकर देखी तो पाया कि इसके साथ एक नकारात्मक ऊर्जा भी पहले दिन से कार्य कर रही थी। इस नकारात्मक ऊर्जा को उन्होंने ‘बंधन’ का नाम दिया। यह बंधन माया का था, ममता का था, मोह का था, संसार के भौतिक ऐश्वर्यों का था। इसी का नाम परतंत्रता हो गया-परतंत्रता अर्थात स्वतंत्रता की विपरीत अवस्था। ऋषियों ने चिंतन किया कि जीव अपनी स्वतंत्रता को बचाकर कैसे रखे? इसका उत्तर उन्होंने खोजा कि जीव को बंधनमुक्त किया जाए। इसके चारों ओर माया-मोह इत्यादि के पाशों को या बंधनों को काटा जाए और इसे मुक्ति का मार्ग दिखाया जाए। वास्तव में वह मुक्ति का मार्ग ही ‘अष्टांग’ योग है।

हमारे ऋषियों ने जीवन और जगत का और भी अधिक गहराई से अध्ययन किया तो उन्हें ज्ञात हुआ कि संसार का हर मनुष्य ‘स्व’ और ‘स्वतंत्रता’ की खोज और उनकी रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। कहने का अभिप्राय है कि संसार का हर मनुष्य  ‘स्व’ और ‘स्वतंत्रता’ की रक्षा को अपना मौलिक अधिकार मानता है। अब इस ‘स्व’ और ‘स्वतंत्रता’ की रक्षा कैसे हो यह प्रश्न था। देखा गया कि हर जीव अपने कर्मों में स्वतंत्र बना है परंतु फल पाने में सदा परतंत्र है। अत: फल प्राप्ति के इस बंधन को  या परतंत्रता को कैसे मिटाया जाए? कैसे यह सुनिश्चित किया जाए कि किये हुए कर्म का फल तो मिले पर वह फल दुखदायक न होकर सुखदायी हो, कष्टप्रद न होकर आनंददायक हो, और बंधन की यातना न देकर स्वतंत्रता या मुक्ति की खुली हवाओं को दिलाने वाला हो। इसके लिए मनुष्य को वेद के माध्यम से आज्ञा मिली कि संसार में रहकर तुझे ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’ का अवलंब ग्रहण करना है। यदि तूने इस मर्यादा पथ का ग्रहण कर लिया तो तुझे अपनी यात्रा में कोई कष्ट नही होगा और मार्ग की सारी बाधाओं को पार करता हुआ तू निष्कंटक अपने ‘यात्राधाम’ अर्थात मोक्ष पर पहुंच जाएगा, इसी यात्राधाम को लोगों ने अपने-अपने ढंग से हरिधाम, मुक्तिधाम, परमपद, स्वर्गलोक इत्यादि काल्पनिक  नाम दिये हैं।

हमारा मानना है कि यदि व्यक्ति अपने जीवन में ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’ की इन दो मर्यादाओं का पालन करना सीख ले तो यह संसार स्वयं ही मुक्तिधाम बन जाएगा। इसे मृत्युलोक तो हमने अपने निकृष्ट कार्यों से बना दिया, अन्यथा वास्तव में तो यह मुक्ति प्राप्ति का ही धाम है। ऊपरिलिखित मर्यादाओं को जब से अपने ऊपर व्यक्ति ने एक बंधन मान लिया तब से यह संसार नरक बन गया है। इन मर्यादाओं को अपने लिए बंधन मानकर इनसे मुक्ति की प्राप्ति करने की मनुष्य की संघर्ष की भावना भी यही बताती है कि मनुष्य जन्मना स्वतंत्रता की खोज कर रहा है-यह अलग बात है कि मर्यादा से मुक्ति का उसका यह संघर्ष उसे विपरीत दिशा में ले गया। आज हम जहां जिस गर्त में डूबे पड़े हैं, या जिस कलह-कटुता से सारा संसार पीडि़त है, इसका कारण यही है कि सारा संसार मर्यादाओं से मुक्ति चाहता है। मर्यादाओं को अपने ऊपर एक बंधन मानता है। अब सारा संसार दलदल में फंसा खड़ा है, वह इस दलदल से जितना निकलना चाहता है उतना ही इसमें फंसता-धंसता जा रहा है। मर्यादा से मुक्ति चाहोगे तो यही दुर्गति होगी, और यदि मुक्ति के लिए मर्यादा की खोज करोगे या मर्यादा की स्थापना करोगे तो सदगति प्राप्त होगी।

मेरे प्यारे देशवासियो! आपका मार्ग सदगति का है, आपके सारे वेदादि सत्य शास्त्र आपको सदगति का मार्ग बता रहे हैं। आपका मार्ग दुर्गति का नही है, पर आपको कुछ लोगों ने दुर्गति में फंसा अवश्य दिया है। ये वही लोग हैं जो भारत में पश्चिमी जगत के मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं और साम्यवाद जैसी घातक विचारधारा के नाम पर भारत की सत्यम्वद और धर्मम् चर की मर्यादा को छिन्न-भिन्न कर समाप्त करने के षडय़ंत्र रच रहे हैं। इनके अगवा इस देश में नास्तिकवाद फैलाकर बहुत बड़ा जनसंहार करने की योजना बना रहे हैं, क्योंकि इनका आदर्श स्टॉलिन है, चंगेज खान है, हलाकू है,  तैमूर है, और अफजल खान है। इन सारी योजनाओं से और षडय़ंत्रों से देश को सावधान करने की आवश्यकता है। ये वही पश्चिमी संस्कृति के उपासक लोग हैं जिन्हें सदगति का अर्थ तक भी ज्ञात नही है। जो नही जानते कि मोक्ष क्या है और मुक्ति या स्वतंत्रता क्या है? क्योंकि इन्होंने स्वतंत्रता के वाह्य स्वरूप की उपासना की है, इन्हें नही पता कि स्वतंत्रता भीतरी जगत की वस्तु है और यह हमें भीतर से आनंद से भरकर सदा-सदा के लिए मुक्त करने वाली अमोघ औषधि है। यह क्रूरता दिखाने वाले किसी शासक, समाज या व्यक्ति से किसी व्यक्ति को या वर्ग को या समुदाय को आजाद कर लेने को ही स्वतंत्रता मानते हैं। ऐसा वर्ग या समुदाय जो दूसरों का दमन करता हो या दूसरों पर क्रूरतापूर्वक शासन करता हो, कभी समाप्त नही हो सकता जबतक उसे भीतर से परिवर्तन के लिए तैयार नही किया जाएगा और भीतरी परिवर्तन तभी आता है जब व्यक्ति ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’  का उपासक बनता है।

पश्चिमी जगत के चिंतकों ने ना तो यह समझा और न उन्हें उनके पूर्वजों ने यह समझाया कि हमें वास्तविक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए  ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’ का अनुगामी बनना है। उन लोगों ने स्वतंत्रता को बाहरी जगत की वस्तु मानकर यह नही समझा कि उसका संबंध आत्मा से है और जो आत्मा के अनुकूल हो उसे ही करते जाना मनुष्य का जीवन ध्येय है। पश्चिमी के विद्वानों ने किसी देश की स्वतंत्रता के अपहरण और फिर अपहरण से मिली किसी की स्वतंत्रता को बलात् अपने अधीन किये रखने की कसरत करते रहना उचित माना।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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