संसार का मर्यादा पथ: ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’-भाग-2

  • 2016-03-21 03:30:21.0
  • राकेश कुमार आर्य

ऐसा ही इस्लाम के मानने वालों ने किया। इन दोनों विचारधाराओं ने लोगों की स्वतंत्रता का अपहरण किया और विश्व इनकी इस अत्याचारपूर्ण नीति से मुक्ति के लिए आंदोलित हो उठा। भारत ने विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए देर तक संघर्ष किया, और जहां अनेकों सभ्यताएं अपनी स्वतंत्रता को मिटाकर स्वयं मिट गयीं या जिन्होंने दूसरों के हाथों अपने आपको मिटाना अपना दुर्भाग्य मान लिया, वे सभ्यताएं आज संसार में नही हैं, या नामशेष रह गयी हैं। इस्लाम और ईसाइयत की इन दोनों विचारधाराओं के आने पर सारा संघर्ष स्वतंत्रता के अपहरण पर केन्द्रित हो गया और आज भी केन्द्रित है। संसार में जितना कोलाहल, कष्ट और क्लेश का वातावरण इस समय है वह सब इसीलिए है कि मनुष्य आज भी वर्ग, संप्रदाय और मजहब के नाम पर एक दूसरे को नीचा दिखाने या मिटाने की योजनाएं या षडय़ंत्र बना रहा है। इसके उपरांत भी इस्लाम और ईसाइयत की इन दोनों विचारधाराओं को प्रगतिशील और स्वतंत्रता प्रेमी होने का पाखंडी प्रचार कुछ लोगों द्वारा किया जाता रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत में जेएनयू जैसी संस्था स्वतंत्रता के पश्चात भारतीयता का प्रचार-प्रचार करने के स्थान पर उस कार्य को करने में लग गयी जिससे देश की संस्कृति का विनाश हो सके और ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’ की जीवनदायिनी शैली का अंत हो सके।

यदि यह संसार वास्तव में सुख शांति चाहता है तो इसे मानना पड़ेगा कि वह भारत की सी मर्यादा को अपनाए और सत्य बोलने और धर्म आचरण करने को विश्व का कानून घोषित करे, विश्व की सर्वोत्तम मर्यादा घोषित करे। यदि ऐसा होता है तो विश्व के सारे कष्ट क्लेश मिट जाएंगे। जो हर व्यक्ति इस मर्यादा पथ का पथिक हो जाएगा तो संसार की गति सीधी हो जाएगी और सीधी गति ही तो सद्गति कहलाती है।

मेरा विचार है कि ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’  को विश्व अपनी विरासत के रूप में मान्यता दे दे तो संसार के जितने भर भी कानून हैं वे सबके सब स्वयं ही समाप्त हो जाएंगे। संसार में नित्य प्रति करोड़ों-अरबों रूपया का कागज कानूनी लिखा पढ़ी में व्यय होता है, करोड़ों-अरबों रूपया हम कानून व्यवस्था पर व्यय करते हैं, करोड़ों-अरबों रूपया हम न्याय प्रणाली पर व्यय होता है। करोड़ों-अरबों रूपया हम कार्यपालिका पर और व्यवस्थापिका पर व्यय करते हैं-केवल इसीलिए कि ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’ से मनुष्य ने मुंह फेर लिया। संसार के सभ्य लोग और चिंतनशील लोग संसार की वर्तमान व्यवस्था से दुखी हैं, पर उन्हें उपाय नही मिल पा रहा है कि इस दुर्गति से संसार को सद्गति की ओर कैसे ले चलें? इसका उपाय भारत की संस्कृति में है, इसका कानून और इसका मर्यादा पथ यही है कि ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’ के हम उपासक बनें।

वेद ने हमें उपदेश दिया कि हमारी स्वतंत्रता योगक्षेमकारी हो। योग अर्थात जो मिला है उसकी रक्षक हो और क्षेम अर्थात जो अभी प्राप्त करना है उसकी प्राप्ति में सहायक हो। इसका अभिप्राय है कि हमारी स्वाधीनता किसी की स्वाधीनता का अपहरण करने वाली न हो। किसी को कष्ट पहुंचाने वाली न हो। भारत का दीर्घकालीन स्वतंत्रता संग्राम ‘योगक्षेमकारी’ स्वाधीनता की साधना का संघर्ष था। पर जब देश स्वाधीन हो गया तो अंग्रेजों के मानस पुत्रों ने स्वतंत्रता के इन दोनों मूलभूत तत्वों की उपेक्षा कर दी। उल्टी हवा चला दी, जिन मूल्यों की प्राप्ति के लिए स्वतंत्रता का दीर्घकालीन संघर्ष किया गया था, उन मूल्यों को मिटा दिया गया, और पश्चिमी जगत के जिन मूल्यों से देश को देश की संस्कृति को बचाना था उन्हें प्राप्त करा दिया गया। फलस्वरूप देश का धर्म, देश की संस्कृति और देश का इतिहास  विदेशी संस्कृति और विदेशी इतिहासकारों की कालीछाया से मुक्त नही हो पाये। यही कारण है कि आज का हमारा सारा परिवेश दुखदायक बन चुका है और उसमें ‘कन्हैया’ जन्म ले रहे हैं जिनके लिए मोहनभागवत कह रहे हैं कि अब हमें बच्चों को भी ‘भारत माता की जय’ कहना सिखाना पड़ेगा। जो देश की संस्कृति की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं या करते रहे हैं उनके लिए कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद कह रहे हैं कि इन लोगों में अर्थात आरएसएस और आईएस में कोई अंतर नही है।  जबकि ओवैसी का कहना है कि वह भारतमाता की जय नही बोलेगा, चाहे उसके गले पर छुरी रख दी जाए। ये सारा चिंतन कहां से आ गया और क्यों आ गया? यदि इस पर चिंतन करें तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि हमने भारत की ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’ की परंपरा से और वेदाज्ञा से मुंह फेर लिया।

भारत के लिए कहा जाता है कि इसे कानून का पढऩा-पढ़ाना अंग्रेजों ने सिखाया था। जो लोग ऐसा कहते हैं या ऐसा मानते हैं उन्हें भारत के विषय में समझना चाहिए कि भारत की वर्तमान दुर्गति अंग्रेज के कानून ने ही की है। यदि आज अंग्रेज भारत के कानून के केवल इन चार शब्दों ‘सत्यम्वद धर्मम् चर’  को समझ लें तो उन्हें अपने कानून की निस्सारता को स्वयं ही बोध हो जाएगा। हमने किसी दुर्गतिदायक कानून के राज के लिए संघर्ष नही किया था, और न ही उसके लिए अपनी स्वतंत्रता की साधना की थी, हमने तो धर्म के शासन के लिए, मर्यादाओं की रक्षा के लिए और मर्यादाओं की स्थापना के लिए संघर्ष किया था। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को लड़ते-लड़ते हमारी पीढिय़ां गुजर गयीं, इतनी देर में हमारे भीतर अशिक्षा और अज्ञानता का शत्रु आ घुसा जिससे हम अपने अतीत से कट गये या काट दिये गये। यह मानना पड़ेगा कि जब हमें स्वतंत्रता मिली तो हम अपने अतीत के उस गौरवमयी पक्ष से बहुत दूर हो गये थे जिसके लिए हमने अपनी लड़ाई का शुभारंभ किया था। कांग्रेस जो कि अंग्रेजों की चाटुकार संस्था थी और जिसने अपने कार्य का शुभारंभ ही अंग्रेजों के गुणगान से किया था, ने हमें अंग्रेजों के मूल्यों और उनकी शासनप्रणाली की ओर देखने के लिए प्रेरित किया, पर उसने हमें अपने अतीत से जोडऩे का प्रयास नही किया। इसलिए उसने जेएनयू जैसी संस्थाएं यहां खड़ी कर दीं। आज प्रधानमंत्री मोदी इन सारी बाधाओं और समस्याओं से अकेले जूझ रहे हैं। हमें समझना होगा कि हमारे प्रधानमंत्री किस दशा में रहकर किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। जब नायक की दिशा सही हो तो देश की जनता को उसके समर्थन के लिए आगे आना चाहिए। देश और संस्कृति को बचाने के लिए तो यह और भी आवश्यक होता है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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