साम्प्रदायिक नही राष्ट्रीय मुद्दा है-रामजन्मभूमि

  • 2016-01-09 02:18:03.0
  • राकेश कुमार आर्य

रामजन्मभूमि के विषय को लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय में 9 जनवरी से एक संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम  के आयोजक संजय कुमार हैं। संगोष्ठी के आयोजन की सूचना मिलते ही वामपंथी संगठनों ने आसमान सिर पर उठा लिया है।

नेताजी सुभाष को ‘तोजो का कुत्ता’ कहने वाले ये वामपंथी वही हैं जो इस देश के विषय में लिखते आये हैं कि यहां राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद नाम की कोई भावना कभी नही रही, यह तो भला हो अंग्रेजों का कि उन्होंने इस देश में राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न कर दी। इस एक मान्यता से ही पता चल जाता है कि वामपंथी संगठन देश की स्वतंत्रता के कितने समर्थक रहे होंगे? जो लोग विदेशियों के उपकारों के सामने बलैयां खा खाकर नतमस्तक होने के आदी हों उनसे अपने स्वयं के विषय में गौरव भावना से भरे होने की अपेक्षा नही की जा सकती।

रामजन्मभूमि का जहां तक प्रश्न है तो इसे भारत के लोगों ने बाबर के आक्रमण से पूर्व से ही अपने लिए राष्ट्रीय मुद्दा माना है। 6 दिसंबर 1992 तक इस भूमि को मुक्त कराने के लिए 70 से अधिक युद्घ किये गये हैं। ईसा से लगभग 150 वर्ष पूर्व विदेशी यवन राजा मिनेण्डर ने अयोध्या पर पहला आक्रमण किया था। उसका विचार था कि भारत में जब तक यह रामजन्मभूमि और उस पर निर्मित गुरूकुलीय मंदिर स्थापित है तब तक भारत को जीतना असंभव है। तब मिहिर कुल ने अपनी बड़ी सेना के माध्यम से इस मंदिर को गिरा दिया था।

तब हिंदू समाज ने अर्थात संपूर्ण देश के हिंदू राजाओं ने देश की प्रजा के लिए समादरणीय और पूजनीय चरित्र के प्रतीक राम के प्रति  एक साथ मिलकर राजा मिनेण्डर (मिलिन्द या मिहिरकुल) के उक्त कृत्य का विरोध किया और शुभवंशीय शासक द्युमत्सेन ने उस राजा पर प्रबल प्रहार कर उसकी राजधानी कौशांबी पर अपना अधिकार कर लिया। मिहिरकुल को अपने किये का दण्ड मिल गया था। इस प्रकार मात्र साढ़े तीन माह के पश्चात ही भूमिसात किया गया मंदिर पुन: खड़ा कर दिया गया।

हिंदू राजाओं और प्रजा ने मिलकर तब राजशक्ति के सहयोग से पुन: एक भव्य मंदिर का निर्माण किया था। यह एक उदाहरण है जो यह बताता है कि राममंदिर का विषय इस देश के लोगों के लिए कब से राष्ट्रीय मुद्दा रहा है? परंतु इस प्रकार के भारतीय पराक्रम को भारत से बाहर करने के लिए इन वामपंथियों ने ही सबसे बड़ा अपघात देश के साथ किया और इन विश्वासघाती कलमकारों ने भारत से राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के सारे चिह्नों और प्रतीकों को चुन-चुनकर निकाल बाहर करने का प्रयास किया। कांग्रेस ने इनके इस ‘राष्ट्रघाती अभियान’ को हवा दी और देश के विद्यालयों में इनके द्वारा लिखे गये इतिहास को परोसने का कार्य किया।
ram janmabhoomi
अब तनिक उन लोगों के प्रयासों को देखा जाए जो इस देश के राष्ट्रीय प्रतीकों के लिए पहले दिन से लडऩे मरने के लिए उतारू हो गये थे और सदियों तक लड़ते रहे हैं। जिस समय विदेशी मजहब के लोग यहां से पराजित होकर भाग रहे थे या भगाये जा रहे थे, उस समय राम जन्मभूमि का आंदोलन शुद्घत: राष्ट्रीय आंदोलन ही था। देर सवेर उस विदेशी धर्म के मानने वाले लोगों की संख्या में वृद्घि हुई तो उसका अभिप्राय यह नही हो जाता है कि आप अपने राष्ट्रीय आंदोलन को ही भूल जाएं या राष्ट्रीय आंदोलन की लंबी श्रंखला में शहीद हुए लोगों को ही भूल जाएं। यह तो शुद्घ तुष्टिकरण है और आत्मविस्मृति की स्थिति है जिसे किसी भी जीवंत राष्ट्र के लिए उचित नही माना जा सकता।

अब एन.एस.आई. और अन्य ऐसे छात्र संगठन जो वामपंथी या कांग्रेसी मानसिकता के हैं, कह रहे हैं कि डी.यू. की पहचान एक गैर साम्प्रदायिक विश्वविद्यालय की रही है। हमने माना कि डीयू एक धर्मनिरपेक्ष विश्वविद्यालय है-पर वह राष्ट्रीय तो है, राष्ट्रवादी तो है। राम साम्प्रदायिक नही हैं, राम की विचारधारा साम्प्रदायिक नही है, राम के आदर्श साम्प्रदायिक नही हैं और राम का चरित्र साम्प्रदायिक नही है। साम्प्रदायिक वह होता है जो एक संप्रदाय विशेष की बातें करता है, राम के चरित्र से साम्प्रदायिकता की गंध नही आती, हर स्थान पर उनके द्वारा मानवतावाद को ही बढ़ावा दिया गया है। स्वतंत्र भारत में ‘रामराज्य’ स्थापित करने की बात गांधीजी इसीलिए किया करते थे कि ‘रामराज्य’ से बढक़र पंथनिरपेक्ष और मानवतावादी शासन व्यवस्था और कोई नही हो सकती। इसी शासन व्यवस्था में समान नागरिक संहिता के दर्शन होते हैं। सभी नागरिकों के लिए एक सा कानून राम के शासन की विशेषता थी। ऐसा राम इन वामपंथियों के लिए साम्प्रदायिक हो गया और एक देश में ही दो कानून की वकालत करने की इनकी मानसिकता गैर साम्प्रदायिक है, जो एक वर्ग का तुष्टिकरण करती है तो एक के अधिकारों का हनन करती है। वास्तव में ऐसी सोच ही तो साम्प्रदायिक होती है। उस पर भी तुर्रा यह कि राम जन्मभूमि के विषय पर होने वाली संगोष्ठी का इसलिए विरोध किया जाएगा कि इससे डीयू की गैर साम्प्रदायिक छवि को क्षति पहुंचेगी।

यदि यह आयोजन किसी अन्य देश में हो रहा होता तो इस पर सारे देश की नजरें होती। क्योंकि इकबाल के शब्दों में श्रीराम ‘इमामे हिन्द’ हैं, और अपने ‘इमाम’ के गुणगान में सबका एक साथ खड़ा हो जाना ही राष्ट्रवाद है। पर दुर्भाग्य है इस देश का कि राम इकबाल की दृष्टि में तो ‘इमामे हिन्द’ हो सकते हैं पर इन वामपंथियों की दृष्टि में नही।

डीयू में छात्र जिस कार्य को कर रहे हैं, उसे उन्हें करना ही चाहिए। राम के जीवनादर्श लोगों की दृष्टि में आने चाहिए और देश में एक संप्रदाय निरपेक्ष शासन के लिए अर्थात रामराज्य के लिए बहस होनी ही चाहिए। रामजन्मभूमि रामराज्य का खण्डहर है, उसका जीर्णोद्घार करना मानो देश में गांधी के सपनों को साकार करना होगा।

हमें यह ध्यान रखना होगा कि रामजन्म भूमि का वाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं इसलिए अपनी चर्चा को वहां तक तथ्यात्मक रूप से रखने की आवश्यकता है, जहां तक माननीय न्यायालय की गरिमा को ठेस न पहुंचे और उसे एक सही निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता मिले। हमारे यहां शास्त्रार्थ (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्व में सबसे प्राचीन साक्ष्य) परंपरा इसीलिए थी कि सत्य का मण्डन और असत्य का खण्डन किया जा सके। हमारे यहां न्यायालयों की व्यवस्था तो थी पर उन्हें शास्त्रार्थों के निर्णय किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता किया करते थे। आज उस परंपरा को हम टूटन-फूटन के साथ विकृत रूप में न्यायालयों में अधिवक्ताओं की बहस में देखते हैं। अधिवक्ताओं को ‘विद्वान साथी’ कहने की परंपरा भारत के शास्त्रार्थ युग की याद दिलाती है, जब हमारे शास्त्रार्थ महारथी एक दूसरे को सम्मानवश विद्वान साथी कहकर संबोधित किया करते थे, आज अधिवक्ताओं के ‘वाक चातुर्य’ में शुद्घ चालाकी दिखने लगती है तो पता चलता है कि आज की यह परंपरा तो हमारी शास्त्रार्थ परंपरा की पैरों की धोवन भी नही है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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