समय की महिमा अपार

  • 2016-06-15 03:30:54.0
  • राकेश कुमार आर्य

time

समय के सागर में कितनी ही विचारधारायें उठीं, उनके ज्वार भाटे आये। कुछ ने समय को प्रभावित भी किया, किंतु देर-सबेर सभी समय-सागर की विकराल तरंगों और लहरों में वह पानी के बुलबुले की भांति विलीन हो गयीं। कुछ के नाम शेष हैं तो कुछ ऐसी लगती हैं कि मानो थी ही नहीं। सीजर-सिकंदर की परंपरा के विश्व विजेता बनने के सपने संजोने वाले भी गये और धर्मांतरण से मर्मांतरण कर विश्व को अपने नियंत्रण में लेने के सपने संजोने वाले गजनी, गौरी, बाबर और उनके वंशज भी चले गये।

गूंजते थे जिनके डंके से जमीं और आसमां।
चुप पड़े हैं कब्र में, हूं न हां कुछ भी नही।।
जिनके महलों में कभी हजारों रंग के फानूस थे।
झाड़ उनकी कब्र पे हैं इसके सिवा कुछ भी नही।।

इसी हश्र को देखकर भी लोगों ने इतिहास से कोई सीख नही ंली। आज भी लोक के नायक नही बन पाये हैं।

जनता को आज भी सपने दिखाये जा रहे हैं कि इस चुनाव के पश्चात आपका कल्याण हो जाएगा, अगली बार फिर पुन: यही सपना कुछ बदल कर ताजा करके दिखाने का राग छेड़ा जाता है। जनता को मूर्ख बनाकर मौज ले रहे हैं हमारे जननायक। जनता चुप है और बड़ी ही स्तब्धता के साथ अपनी  जेब कटवा रही है।

राज्य की उत्पत्ति

राज्य की उत्पत्ति और राजा की आवश्यकता की अनुभूति जनसाधारण को क्यों हुई? उत्तर था कि लोककल्याण के लिए ‘परित्राणाय साधूनाम्’ और ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ की लोकमंगलकारी राजनीति को अपना आदर्श बनाकर राज्य की उत्पत्ति और राजा की आवश्यकता की अनुभूति हुई थी।

प्रति प्रश्न है कि क्या राज्य इसमें सफल हुआ? उत्तर नकारात्मक मिला, मानव के हृदय में दुर्योधन की वृत्ति का विकास होता गया और विचारधाराओं का आविष्कार होने पर भी उन्हें दुर्योधन द्वारा निजी हित में हड़पा गया व राजनीतिक विचारधाराओं की पार्टियों को किसी व्यक्ति ने हड़पा। जैसे भारत में लोकतंत्र को कांग्रेस ने हड़पा और कांग्रेस को नेहरू खानदान ने हड़प लिया। जनहित का मुलम्मा निजी हित पर इस प्रकार चढ़ाया गया कि स्वहित ही जनहित दिखलाई देने लगे। जनसाधारण को सत्ता और सत्ता के गलियारों तक से दूर रखने का ऐसा प्रबंध किया गया कि उस बेचारे के सारे आत्मविकास के रास्ते ही अवरूद्घ हो गये।

लोक कल्याण के नाम पर

लोक कल्याण का मुख्य पुर्जा कहां गिरा? राजव्यवस्था का  ‘राजरथ’ अपने ‘राजपथ’ पर आज इतना आगे निकल आया है कि अब उस पुर्जे को ढूंढऩा तक असंभव हो गया है। आज लोक कल्याण का अर्थ बड़ा सीमित हो गया है। लोक कल्याण की नीतियां बनाई जा रही हैं। घोटालेबाजों के विरूद्घ केस दर्ज हो रहे हैं। किंतु बड़ी बेशर्मी से फिर भी गद्दी पर ज्यों के त्यों बैठे हुए बड़ी ढीठता से कहे जा रहे हैं कि-जब तक हमें कोर्ट से सजा नही मिल जाएगी तब तक हमारे द्वारा गद्दी छोडऩे का प्रश्न ही उत्पन्न नही होता।

इन व्यभिचारियों का यह व्यवहार भारत की अस्मिता से है, निजता से है, उसकी पावन और अनुपम संस्कृति से है। आज ‘गुण्डे’ राष्ट्र के अस्मिता से खिलवाड़ कर रहे हैं। लोक कल्याण के नाम पर आज राष्ट्र के गले को घोटा जा रहा है। आज बड़े गहरे षडय़ंत्र के साथ राष्ट्र के उन क्रांतिकारियों को राष्ट्र की राजनीति  से दूर कहीं कबाड़खाने में फेंक दिया गया है जिन्होंने इस राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित और न्यौछावर कर दिया था।’’

दागदार चेहरे रातों-रात भारत के स्वामी बन गये। जिनके चरित्र में भारतीयता का कोई पुट नही था। जिन्हें भारतीयता में कोई विश्वास नही था। जिन्हें भारत को इंडिया बनाना था-वही भारत को उजाडक़र इंडिया बसाने वाले भारत के ठेकेदार बन गये। आजादी के बाद के इस षडयंत्र से ही आज के भारत में छाये ‘‘राजनीतिक भ्रष्टाचार व भयानक षडय़ंत्रों’’ की नींव पड़ी।

लोक कल्याण क्या है?

जनसामान्य के वे सामान्य हित जो व्यक्ति की गरिमा, राष्ट्र की एकता, स्वतंत्रता, समानता के अधिकार और विकास के समान अवसर, उपलब्ध कराने हेतु अत्यावश्यक हैं, शासन के लिए उन सब पर बिना किसी पक्षपात और भेदभाव के कार्य करना लोककल्याण में आता है।




हिन्दू शरणार्थी

अब हम देखें कि जम्मू कश्मीर से हिंदुओं की अधिकतम जनसंख्या पलायन करके दिल्ली, नोएडा और जम्मू में शरणार्थियों के रूप में पड़ी हुई है। अपने ही देश में शरणार्थी होना शर्म की बात है। एक तर्क दिया जाता है कि सामान्य स्थिति होने के उपरांत उन्हें देर-सवेर अपने घर भेज दिया जाएगा। इस तर्क पर थोड़ा विचार करें। पिछले 10-20 वर्ष से जो लोग शरणार्थी हैं उन्हें एक पीढ़ी का समय अपने घर बार छोड़े हुए हो गया है। उधर एक पीढ़ी का समय उनकी संपत्ति जमीन जायदाद पर कब्जा किये हुए लोगों को हो गया है, इस कब्जे को लेने-देने में कौन लोग इन विस्थापितों के सहायक होंगे? यह एक विचारणीय प्रश्न है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जम्मू कश्मीर में अभी भी भोर होती हुई दिखाई नही दे रही है, तो ये सामान्य हालात होने की समय सीमा क्या है? यह भी स्पष्ट नही है।

ये लोग अर्थात हमारे शासक ‘सामान्य हालात’ की प्रतीक्षा में हैं और जो लोग जम्मू कश्मीर की घाटी को हिंदू विहीन कर राष्ट्र की एकता व अखण्डता से खिलवाड़ कर रहे हैं वे उचित समय की प्रतीक्षा में हैं। इस ‘सामान्य स्थिति’ की प्रतीक्षा के खेल में व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता पिस रही है। तब यह कैसा लोक कल्याणकारी शासन हुआ कि जिसमें व्यक्ति की गरिमा को दिन प्रतिदिन चोट पहुंच रही है? इसी प्रकार समानता के अधिकार की दुर्गति की गयी है। इसके लिए मन बहलाव और जनता को लुभाने के लिए आरक्षण का सुनहरा सपना दिखाया गया है। दलील है कि आरक्षण से उन लोगों को आगे लाने का प्रयास किया जाएगा जो किन्हीं भी कारणों से समाज में विकास की गति में पीछे रह गये हैं।

व्यवहार में विकास के सभी क्षेत्रों पर आज भी उन्हीं लोगों ने अपना अधिकार कर लिया है-जिनका अधिकार हो जाना चाहिए था। उसमें वही लोग सम्मिलित हैं जो किसी भी कारण से समाज में (धनबल अथवा भुजबल में) आगे निकले हुए थे। उदाहरण के लिए आर्थिक क्षेत्र में जो उद्योगपति लोग आगे थे उन्होंने आर्थिक विकास की सभी संभावनाओं को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया है। यही लोग भारतीय प्रशासनिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में अपने बच्चों को अच्छे अंक दिलाने में सफल हो रहे हैं, नौकरियों पर उनके पहरेदार अपने बैठे हुए हैं। एक आई.ए.एस. अधिकारी की हरसंभव यही चेष्टा रहती है कि वह किसी भी आई.ए.एस. पद के रिक्त होते ही उस पद पर अपने बेटे या किसी संबंधी की नियुक्ति करा दे।

राजनीतिज्ञ अपने बाद के लिए अपना उत्तराधिकारी अपने बेटे को ही मानता है, यही राजतंत्रीय लोकतंत्र है। जनसाधारण को समानता के अधिकार कहां हैं? समानता के अधिकार का तो ऊपर से ऊपर ही दोहन और हरण कर लिया गया है। जिन लोगों को आर्थिक समृद्घि के आधार पर जिन सेवाओं की ओर मुंह तक उठाना नही चाहिए था वही लोग अपनी समृद्घि और पहुंच का अनुचित प्रयोग करते हैं और अपने बेटे बेटियों को उच्च पदों पर पहुंचा देते हैं और गरीब बेचारा देखता और ताकता रह जाता है।

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राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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