समाज की प्राचीन और सर्वमान्य रीति विवाह

  • 2016-04-25 10:30:14.0
  • अशोक “प्रवृद्ध”

समाज की प्राचीन और सर्वमान्य रीति विवाह

मानव की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उन्नति के लिए जन्म से मृत्युपर्यन्त भिन्न-भिन्न समय पर अलग-अलग संस्कारों की व्यवस्था प्राचीन ऋषि-मुनियों ने की है। मानव-जीवन की उन्नति में विशिष्ट महत्व रखने वाली सोलह संस्कारों मे से एक तेरहवाँ और अतिमहत्वपूर्ण संस्कार विवाह है। विवाह एक धार्मिक संस्कार है, जो धर्म की रक्षा करता है और धर्म उसकी रक्षा करता है। शास्त्रों में भी कहा गया है- स्त्री और पुरुष मिलकर एक पूर्ण शरीर बनाते हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। आदिदेव शंकर का अद्र्धनारीश्वर रूप भी इसी का द्योत्तक है। पुरुष तथा स्त्री के अपेक्षाकृत स्थायी और समाज स्वीकृत प्रेम को विवाह कहते हैं। विवाह में दो बातें सम्मिलित हैं। एक तो दो परिवारों का सम्बन्ध- मुख्यतया एक लडक़ी का अपने माता-पिता का घर छोडक़र श्वसुर अथवा पति के घर में जाना और दूसरा पति-पत्नी का यौन-सम्बन्ध विवाहित जीवन को सुखी और आनन्दमय बनाने के लिए प्रथम बात, अर्थात लडक़ी का पति के घर में आना और रहना, अधिक महत्वपूर्ण है। पति-पत्नी में मुख्य बात तो दोनों का मिलकर गृहस्थ धर्म का पालन करना है।गृहस्थ धर्म में यौन-सम्बन्ध के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है। गृहस्थ धर्म यज्ञस्वरूप है। इस आश्रम के आश्रय ही ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम चलते हैं। इतना बड़ा उत्तरदायित्व पति-पत्नी दोनों मिलकर ही निभा सकते हैं। इस आश्रम में साथ रहने के क्रम में सन्तानोंत्पत्ति तो होगी ही। जहां स्त्री-पुरुष इक_े रहेंगे,विवाहित हों अथवा अविवाहित, सम्बन्ध बन सकता है और सन्तानोंत्पत्ति भी हो सकती है, परन्तु संतान का पालन -पोषण,शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध गृहस्थी का धर्म होता है। स्वामी दयानन्द सरस्वती के शब्दों में विवाह उसको कहते हैं जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत, विद्या, बल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण, कर्म, स्वभावों में तुल्य परस्पर प्रीतियुक्त होक सन्तानोंत्पत्ति और अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के लिए स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध होता है। वेद-पुराण, इतिहास और लोक परम्पराओं के अध्ययन से ऐसा भाष होता है की कदाचित् यह संस्था मानव समाज की सबसे पुरानी और सर्वमान्य रीतियों में से एक है।

विवाह शब्द का अर्थ है-खास सम्बन्ध। वैदिक साहित्यों में विवाह शब्द अत्यंत प्राचीन है। ऋग्वेद में वर्तमान अर्थों में विवाह शब्द नहीं मिलता । फिर भी ऋग्वेद मण्डल 2, सूक्त 17, मन्त्र 7, ऋग्वेद 2/29/, ऋग्वेद 10/7, ऋग्वेद मण्डल 1 सूक्त 46, मन्त्र 2-10 से विवाह शब्द का पत्ता चलता है। परम्परागत अर्थों में हिन्दू समाज की दृष्टि से विवाह का अर्थ है- स्त्री-पुरुष का जीवन भर अथवा जन्मान्तर के लिए एक दुसरे से अनुबन्धित होना। हिन्दू स्त्री एक बार विवाहित होकर जीवन-पर्यंत विच्छेदित नहीं हो सकती। यही नहीं पति के मृत्यु हो जाने पर भी वह उसी की विधवा रहती है। पति मृत हो अथवा जीवित, स्त्री वाग्दता हो या विवाहिता, हर हालत में उसे मन, वचन, कर्म से पति के प्रति सर्वथा अनुबंधित, अनुप्राणित एवं आत्मार्पित होनी पड़ती है। विवाह के पश्चात् पति का स्त्री पर पूर्ण अधिकार है, परन्तु पुरुष पत्नी की भान्ति स्त्री के प्रति अनुबंधित नहीं। हिन्दू धर्मानुबन्धन में पति एक या अनेक इसी भान्ति अनुबन्धित पत्नियाँ रखते हुए भी सर्वथा स्वतंत्र रूप से वैध अथवा अवैध अनगिनत पत्नियाँ बिना पत्नी के स्वीकृति के रख सकता है। यहाँ तक की पुरुष दासियों, वेश्याओं, रखैलियों एवं व्यभिचारिणी स्त्रियों से भी स्वच्छंद सहवास कर एकता है तथा इससे दूषित भी नहीं होता है।

यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रंथों से विवाह के विकास का आभाष मिलता है। इसके साथ ही यह भी पत्ता चलता है की विवाह तथा वर्ण का विकास साथ ही साथ एक ही आधार पर हुआ है, फिर भी वृहदारण्यक उपनिषद् 30 तथा ऐतरेय ब्राह्मण 3-33 से ज्ञात होता है कि स्त्रियाँ परदे में नहीं रहती थीं, पैत्रिक सम्पति में हिस्सा पाती थीं, सम्पति की अधिकारिणी होती थीं तथा धार्मिक कार्यों में सम्मिलित होती थीं द्य अथर्ववेद में कहा गया यह मन्त्र विवाह की परिपाटी स्थापित करता है द्य अथर्ववेद 14-15 में अंकित है कि सौभाग्य के लिए तेरा हाथ पकड़ता हूँ, मुझ पति के साथ रह,प्रतिष्ठित और नम्र पुरुषों ने मुझे तुझे दिया है....अथर्ववेद के अगले मन्त्रों में अथर्ववेद 1/14/3 तथा अथर्ववेद 14/1/43-44 में कन्यादान के पूर्व प्रकट रूप का विकास हुआ है। विद्वानों का विचार है कि आर्यों में चार वर्णों का विभाजन तो पूर्व में ही हो चुका था,लेकिन आर्यों के पूरे भारतवर्ष में फैलने के पश्चात् जब अनुलोम विवाह, जहाँ कि ऊंचे वर्ग के पुरूष, नीचे वर्ग की स्त्रियों से विवाह कर सकते हैं,परन्तु स्त्रियाँ अपने ही वर्ण अथवा उच्च वर्ग में व्याही जाती हैं तथा प्रतिलोम विवाहों, जिसमें स्त्री की जाति पति की वर्ण अथवा जाति से ऊंचा होता है, ठीक अनुलोम विवाह के विपरीत, से उत्पन्न वर्ण-संकरों तथा अनार्य जातियों की स्त्रियों से आर्यों का संसर्ग होने के कारण उनसे उत्पन्न सन्तान की शाखाएं फ़ैल गई थीं तथा इस बात की अब जरुरत महसूस होने लगी थी कि विवाहों और इन विवाहों से उत्पन्न सन्तान की जातियों का नए सिरे से संगठन किया जाए। विवाहों के संगठन के सम्बन्ध में वशिष्ठ, आपस्तम्ब, गौतम आदि आचार्य कुछ मामलों में सहमत और कुछ मामलों में असहमत हैं। वशिष्ठ केवल छ: विवाहों-ब्राह्म विवाह, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर और गान्धर्व विवाह को स्वीकार करते हैं द्य आपस्तम्ब भी इन्हीं छ: को मानते हैं, परन्तु पिछले दो राक्षस और पैशाच विवाह को दूसरे अन्य नामों से स्वीकार करते हैं। गौतम तथा बोधायन विवाह की आठ रीतियों को मानते हैं। ये दोनों सूत्रकार वशिष्ठ से प्राचीन माने जाते हैं। इन्होने प्राजापत्य तथा पैशाच विवाह को अधिक माना है रुऐसा भाष होता है कि इस काल में भिन्न-भिन्न प्रदेशों में विवाह की अलग-अलग रीतियाँ प्रचलित थीं तथा विवाहित स्त्रियाँ अन्त:पुर में रहती थीं तथा पति की आज्ञानुवत्र्तिनी हुआ करती थीं।
विवाह के प्रकार

पुरातन शास्त्रों में विवाह के आठ प्रकार कहे गए हैं । मनुस्मृति में कहा है-
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्ष: प्राजापत्यस्तथाऽसुर: ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधम: ।
- मनुस्मृति 3/21

ब्राह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच ये विवाह के आठ प्रकार होते हैंद्य मनुस्मृति में ही इन विवाहों की व्यवस्था है । वर-कन्या दोनों यथावत ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्वान, धार्मिक एवं सुशील हों उनका परस्पर प्रसन्नता से विवाह होना अर्थात अच्छे-अच्छे शील-स्वभाव, गुणवान वर को घर बुलाकर उसका पूजन कर कन्यादान करना और वस्त्राभूषण प्रदान करना ‘ब्राह्म विवाह’ कहलाता है। विस्तृत यज्ञकर्म करने में ऋत्विक कर्म करते हुए जामाता को अलंकारयुक्त कन्या को देना ‘दैव विवाह’ कहलता है । वर से कुछ ले के (बैल तथा गायें धर्मार्थ लेकर) उसे विधिवत कन्या प्रदान करना ‘आर्ष विवाह’, दोनों का विवाह धर्म की वृद्धि के अर्थ होना ’प्राजापत्य विवाह’ ,कन्या के पिता एवं अभिभावकों को यथाशक्ति कुछ धन देकर विवाह हेतु राजी करना ‘आसुर’, वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना और मन में परस्पर एक दूसरे को पति-पत्नी मान लेना ‘गान्धर्व विवाह’, लड़ाई करके बलात्कार अर्थात छीन-झपट अथवा कपट से कन्या का ग्रहण करना ‘राक्षस विवाह’ तथा सोती या अचेत अथवा पागल कन्या, नशा पीकर उन्मुक्त हुई कन्या को एकान्त पाकर दूषित अथवा सम्भोग कर देना,यह समस्त विवाहों में महानीच, दुष्ट अति दुष्ट ‘पैशाच विवाह’ कहलाता हैद्य मनुस्मृति में यह भी लिखा है कि ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य इन चार विवाहों में पाणिग्रहण किये गये (हुए) स्त्री-पुरूष से जो संतान उत्पन्न होते हैं, वे वेदादि विद्या से तेजस्वी आप्त पुरुषों के सम्मत अत्युत्तम होते हैं।
-अशोक प्रवृद्ध