सम-विषम की विषमता

  • 2016-01-08 07:00:32.0
  • राकेश कुमार आर्य

हमने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की राजधानी दिल्ली में परिवहन व्यवस्था चुस्त दुरूस्त करने तथा राजधानी में प्रदूषण घटाने के लिए जारी की गयी सम-विषम योजना को उसी समय एक तुगलकी फरमानकहा था, जिस समय इस योजना को लागू कराने की घोषणा की गयी थी। ऐसा नही है कि हम राजधानी में परिवहन की दुव्र्यवस्था तथा प्रदूषण की बिगड़ती स्थिति से परिचित नही हैं, और दिल्ली सरकार की किसी ऐसी योजना के विरोधी हैं,
जिससे इन दोनों प्रकार की स्थितियों पर नियंत्रण पाया जा सके। हमारा मानना है कि इस दिशा में तो हमें सोचना ही पड़ेगा। पर दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने वर्तमान में जिस प्रकार से निर्णय लिया है उसमें केजरीवाल की परिपक्वता का अभाव स्पष्ट
झलकता है।सम-विषम sam visham

अब दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा है कि राजधानी में सार्वजनिक परिवहन की पर्याप्त व्यवस्था होने के दृष्टिगत सम विषम योजना से होने वाली परेशानियों के दृष्टिगत क्या इस योजना पर एक सप्ताह में रोक लगाना संभव है
?

दिल्ली सरकार की इस योजना को लागू करने में सबसे बड़ी गलती ही यह रही कि उसने यह योजना बिना सोचे समझे और बिना होमवर्ककिये आनन-फानन में लागू करा दी। जबकि दिल्ली में कितनी ही गाडिय़ां बाहर से नित्यप्रति प्रवेश करती हैं, और उनमें से अधिकांश की ये समस्या होती है कि उन्हें दिल्ली से निकलना ही है, अथवा जिन्हें दिल्ली में अनिवार्यत: घुसना ही है। पड़ोसी
  राज्यों से आने वाली दूध, फल व सब्जी की गाडिय़ों को दिल्ली में नित्य घुसना ही है अन्यथा दिल्ली वाले परेशानी के लिए तैयार रहें। व्यापार के लिए बड़ी गाडिय़ां बहुत सा सामान लेकर दिल्ली से या तो बाहर निकलती हैं या बाहर से दिल्ली में आती हैं, उनके लिए भी कोई समाधान इस योजना में नही किया गया है। व्यवस्था दी गयी है कि सम-विषम की यह योजना प्रात: 8 बजे से रात्रि 8 बजे तक ही लागू रहेगी, उसके पश्चात ये सारे कार्य हो सकते हैं। यह भी व्यावहारिक नही है। दिल्ली से दिल्ली के लिए तो इसे व्यावहारिक माना जा सकता है
, परंतु बाहरी राज्यों के लिए नही।

अब तनिक सोचें कि कोई व्यक्ति दिल्ली की किसी दूर बस्ती में प्रात: 9 बजे अचानक हृदयाघात से पीडि़त होता है, उसे उसी समय मेडिकल सुविधा की आवश्यकता है। ऐसे रोगी के लिए यद्यपि सम-विषम की व्यवस्था से छूट दी गयी है, परंतु उसे पुलिस तो स्थान-स्थान पर रोकेगी ही, इसका क्या उपाय है
? पड़ोसी राज्यों के ट्रांसपोर्ट वाले लोग या अपनी गाडिय़ों से माल भाड़ा कमाकर आजीविका चलाने वाले लोग अब महीने में पंद्रह दिन के लिए बेरोजगार कर दिये गये हैं। उनकी समस्या है कि रात्रि में मालभाड़ा मिलना नही और दिन में मि. केजरीवाल का तुगलकी फरमानआड़े आ गया है।

जहां तक प्रदूषण में कमी की बात है तो इस सम-विषम योजना से इस में भी कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नही आया है। लोगों ने अपने कार्यों के लिए बाहर निकलना ही है इसलिए अब वह शाम को निकलेंगे
, और शाम को प्रदूषण देखा गया है कि वह दीपावली के दिन छूटने वाले पटाखों की रात को भी मात दे गया। अक्सर लोग अपने ऑफिस से घर लौटते समय कुछ आवश्यक सामानों की खरीददारी कर लिया करते हैं। पर अब गाड़ी न होने के कारण उन्हें महीने में पंद्रह दिन यह कार्य देर रात में करना होगा। इससे देर रात तक बाजार में खरीददारी की गहमागहमी रहेगी। जिससे दिल्ली निशाचरबनेगी। आतंकी घटनाओं को करने का अवसर आतंकियों को ना मिले इसलिए अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था भी दिल्ली में करनी होगी। इस सबके लिए जितनी सुरक्षा व्यवस्था अब है उसे बढ़ाना पड़ेगा। इससे प्रशासनिक समस्याएं और भी अधिक बढ़ेंगी।


अब आते हैं इस तर्क पर कि सम-विषम योजना को लागू कराने में दिल्ली की जनता ने सहयोग दिया है। अत: इस योजना कोसफल माना जाए। हमारा मानना है कि यह तर्क नही कुतर्क है, जो बिना सोचे समझे दिया जा रहा है। जो सहयोग इस योजना को लागू करने में दिल्ली की जनता ने दिया है
, वह सहयोग दिया नही गया है, वह तो दण्डका डर दिखाकर सरकार ने लिया है। लिये गये सहयोग को तालियों के शोर में बदलकर दिल्ली की जनता का मूर्ख बनाने की आवश्यकता नही है।

वस्तुत: सम-विषम योजना स्वयं में एक विषमता है। इसे अभी लागू करने की आवश्यकता नही है। अच्छा हो कि दिल्ली सरकार पहले अपनी परिवहन व्यवस्था को चुस्त दुरूस्त करे। जिन लाखों लोगों को नित्यप्रति अपने रोजगार के लिए या कार्यालयों के लिए घर से निकलना पड़ता है
, उनके लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि वह अपने रोजगार तक या अपने कार्यालय तक समय से पहुंच जायें। अभी इस व्यवस्था को दिल्ली सरकार देने में पूर्णत: असफल रही है। इसके अतिरिक्त गुडग़ांव से चलकर गाजियाबाद जाने वाले व्यक्ति के लिए भी ऐसी व्यवस्था हो किजिससे वह आराम से आ जा सके। दिल्ली में हरियाणा व उत्तर प्रदेश से या राजस्थान से जो लोग नौकरी के लिए आ रहे हैं
, या अपने किसी अन्य आवश्यक कार्य के लिए आ रहे हैं, उनको भी इस व्यवस्था ने परेशानी में डाल दिया है। इन प्रदेशों से बहुत से लोग तो अपने घर से किसी मरीज को देखने या उसे किसी अस्पताल में भर्ती कराने के लिए आते हैं। उनकी समस्या का भी कोई ध्यान नही रखा गया है। ऐसी परिस्थितियों में सम-विषम योजना पूर्णत: अनुपयुक्त सिद्घ हो चुकी है। इस पर न्यायालय ने गंभीरता से संज्ञान लिया है तो यह अच्छी बात है। अब दिल्ली सरकार को इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।


दिल्ली के लोगों को भी चाहिए कि वह दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को कम करने में सरकार का सहयोग करें। यह ठीक है कि गाडिय़ों से निकलने वाले धुएं से उतना प्रदूषण दिल्ली में नही हो रहा है, जितना औद्योगिक इकाइयों से हो रहा है। ऐसी स्थिति में दिल्ली की जनता को प्रदूषण कम करने के लिए ही नही सोचना चाहिए अपितु इस बात पर भी सोचना चाहिए कि दिल्ली में लगने वालों जामों से व्यक्ति को मानसिक तनाव की किस सीमा से गुजरना पड़ता है
? लोगों को पंद्रह मिनट का सफर भी कभी-2 एक घंटे में तय करना पड़ता है। इसके लिए यदि राजधानी वासी अपना कुछ कार्य साइकिलों से या दुपहिया वाहनों से करना आरंभ कर दें तो समस्या से कुछ मुक्ति मिल सकती है। राजधानी में ऐसी कितनी ही गाडिय़ां होती हैं, जिनमें केवल एक व्यक्ति सफर कर रहा होता है, और उसे जाना भी दो या तीन किलोमीटर ही होता है। यदि ये लोग स्वेच्छा से अपने कार्य के लिए साईकिल का प्रयोग करना सीख लें
, तो अच्छा रहेगा। केजरीवाल अपनी योजना पर विचार करें और दिल्ली वासी अपनी आदतों पर विचार करें तो दिल्ली में आयी सम-विषमकी विषमता से छुटकारा मिल सकता है। समस्या के स्थायी समाधान के लिए अभी दोनों पक्ष गंभीरता से होमवर्ककरें।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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