‘सद्गुण विकृति’ का परमपरागत भूत

  • 2016-03-01 03:30:57.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारत ने अपने उच्च मानवीय गुणों के कारण विश्व में सम्मान प्राप्त किया है। इसकी संस्कृति सहयोग, सदभाव, सहृदयता, सम्मैत्री आदि उन गुणों को मानव हृदय में उकेरने वाली संस्कृति रही है जो मानव जाति के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। इन्हीं गुणों से भारत की संस्कृति में ‘सहिष्णुता’ समाहित हुई। इस ‘सहिष्णुता’ के कारण भारत ने हर किसी को अपने साथ चलने के लिए प्रेरित किया। बस, इसकी एक शर्त रही कि बाहर से आने वाले किसी भी विदेशी को भारत को अपनाना पड़ेगा। भारत को अपनी ‘पुण्यभूमि और पितृभूमि’ स्वीकार करो और आराम से रहो।
जिन लोगों ने भारत की संस्कृति को उजाडऩे का संकल्प लेकर इस देश को मिटाने का प्रयास किया, उनसे भारत ने पहले दिन से ही संघर्ष करना आरंभ कर दिया था। परंतु फिर भी हमें ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जब हमने शत्रु के ‘भेडिय़ा स्वरूप’ को पहचानने में चूक की और उसने हमें अवसर आते ही भारी क्षति पहुंचाई। इसे वीर सावरकर ने हमारी ‘सदगुण विकृति’ के रूप में चिन्ह्ति किया है। ‘गोरी’ को हमारे चौहान से सोलह बार पराजय का मुंह देखना पड़ा। था पर देखिए चौहान को कि उसे हर बार छोड़ता रहा। इसके विपरीत जैसे ही चौहान का पक्ष दुर्बल हुआ तो ‘गोरी’ ने उसे एक बार में ही समाप्त कर दिया।
‘सद्गुण विकृति’ का परमपरागत भूत

हमें विचार करना चाहिए कि क्या हम आज भी किसी प्रकार की ‘सदगुण विकृति’ का शिकार तो नही हो रहे हैं? ‘गोरी’ एक विचार का परिणाम था और वह विचार आज भी कभी संसद पर हमले के रूप में तो कभी जेएनयू में भारत विरोधी नारों के रूप में हमारे सामने अतीत की कब्र से निकलकर एक भूत के रूप में प्रकट हो रहा है। कितने दु:ख की बात है कि कुछ लोग (जिनमें पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम भी सम्मिलित हैं) हमारे बीच से ही उठकर ‘गोरी’ का स्वागत कर रहे हैं। उन्हें तनिक भी विचार नही आ रहा कि यह ‘गोरी’ का भूत जब-जब हमारे सिर पर चढ़ा है, तब-तब ही हमने देश के टुकड़े कराये हैं? ‘गोरी’ का समर्थन करने वाले लोग कहे जा रहे हैं कि-‘नारे ही तो लगे हैं-और नारों से कुछ नही होता है?’ अब उन्हें कौन समझाए कि-‘वह भी तो नारे ही थे जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम के काल में लगा करते थे और उन नारों ने ही देश को आजाद होने की प्रेरणा दी थी। नारे ही तो थे-जो 1946 ई. में बंगाल में (अगस्त माह में) ‘सीधी कार्यवाही दिवस’ पर लगे थे और जिन्होंने बंगाल की धरती को खून से लाल कर दिया था, नारे ही तो थे-जो पाकिस्तान के लिए लगने आरंभ हुए थे, और एक दिन पाकिस्तान लेकर रहे थे, ये नारे ही तो थे-जो पाकिस्तान को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी भारत पर युद्घ करने के लिए उकसाते रहे हैं और ये नारे ही तो रहे हैं-जिन्होंने डराकर कश्मीर से वहां के हिंदू समुदाय को भगा दिया है।’ इसलिए नारों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उपेक्षित करना ‘गोरी’ को बार-बार जीवित छोडऩे की ‘पृथ्वीराज चौहान’ की परंपरा को आगे बढ़ाकर उसी ‘सदगुण विकृति’ का परिचय दिया जा रहा है जिसने इस देश के कई टुकड़े करा दिये हैं।
‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा देकर हमें चेताया गया है कि यदि हमने अपनी परंपरागत ‘सदगुण विकृति’ को नही छोड़ा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता से खिलवाड़ करने वालों को अपना परम शत्रु नही माना तो कभी भी कुछ भी होना संभव है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश का विपक्ष नही समझ पा रहा है कि हमारा वास्तविक राष्ट्रधर्म क्या है? किसी मित्र ने व्हाट्सएप पर बहुत सुंदर बात लिख भेजी है-जिसे मैं अपने पाठकों के समझ यथावत प्रस्तुत कर रहा हूं :-‘जब पकड़ा जाता है (कन्हैया) तो कहते हैं कि पकड़ क्यों लिया? जब पकड़ में नही आता है तो (उमर खालिद) तो कहते हैं अब तक क्यों नही पकड़ा गया। जब देशद्रोह के नारे लगते हैं तो कहते हैं कि ये निर्दोष है, जब पुलिस पकड़ती है तो बोलते हैं कि कोर्ट ले जाओ। जब कोर्ट फैसला देती है तो बोलते हैं कोर्ट ने मासूम को फांसी दे दी (अफजल गुरू, याकूब) जब एनकाउंटर होता है तो बोलते हैं हमारी बेटी (इशरतजहां) थी। स्कूल जाती थी, निर्दोष थी। जब पता चल जाता है कि आतंकवादी थी, तो कहते हैं कि कोर्ट क्यूं नही गये। एनकाउंटर क्यों किया? फिर जब कोर्ट जाते हैं, तो माफी का हंगामा करते हैं, रात को 12 बजे (याकूब मेमन के प्रकरण में) कोर्ट खुलवाते हैं, उसे (याकूब को) मासूम बताया जाता है, उसकी शव यात्रा में लाखों लोग खड़े हो जाते हैं, कोर्ट को और सरकार को गाली देते हैं। (सारे सेकुलर उन गालियों पर मौन हो जाते हैं। ऐसी मुद्रा बनाते हैं कि जैसे गालियां न बरसाकर उन पर फूल बरसा रहे हैं।)
अंतत: ये कैसा सेकुलरिज्म है? कोई बोलता है भारत तेरे टुकड़े होंगे-तब कहते हैं कि बच्चा है, उसने नही बोला। जब प्रमाण के रूप में बोलते हुए की वीडियो दिखायी जाती है तो कहते हैं कि (देश में) बोलने की आजादी है। इसलिए बोल दिया तो क्या हो गया? जब उग्रवादी बन जाते हैं तो कहते हैं कि सरकार ने समय पर ध्यान क्यों नही दिया या सरकार सो रही थी?’
ऐसी स्थिति में उग्रवाद और उग्रवादी मानसिकता को भोजन पानी मिला करता है। लगता है कि हमने अपने इतिहास से कुछ नही सीखा है। इतिहास का वही ‘जयचंदी भूत’ हमारा पीछा कर रहा है। ‘सुभाष’ के लिए आज भी ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की जा रही हैं कि वह अपना बोरिया बिस्तर उठाये और देश छोडक़र चला जाए। सरकार को काम करने नही दिया जा रहा है और जनता को भ्रमित किया जा रहा है। चोर को चोरी करने दी जा रही है और जान बूझकर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की जा रही हैं कि चोरी करके चोर को भागने का (चिदंबरम के शब्दों में संदेह का लाभ लेने का) अवसर भी मिल जाए। सच ही तो कहा गया है-हमारे इन राजनीतिज्ञों के लिए -
देश जाए चूल्हे में राष्ट्र जाए भाड़ में,
खेलते शिकार सभी कुर्सियों की आड़ में।
राहुल गांधी और उनकी टीम को सत्ता प्राप्ति की शीघ्रता हो रही है, वह समय की प्रतीक्षा करना नही चाहते। उन्हें नही पता कि-
‘जो उड़ते हैं अहम के आसमानों में,
जमीन पर आने में वक्त नही लगता।
हर तरह का वक्त आता है जिंदगी में
वक्त के गुजरने में वक्त नही लगता।’
हमने कश्मीर में अपनी सहिष्णुता को 70 वर्ष तक परीक्षित किया है-परिणाम क्या निकला है? उनका हृदय परिवर्तन नही हुआ-हम सदगुण-विकृति से छले गये और घायल पड़े हैं। हमने देश तोडऩे वालों के इरादों को जितना ही उपेक्षित किया और अपनी सहिष्णुता को जितना ही इस देश का धर्म मानकर उसका निर्वाह किया, उतने ही देशघाती संगठन बनते चले गये। आज स्थिति ये है कि एक ओर से देश तोडऩे की आवाज यदि आती है तो उसके समर्थन में अप्रत्याशित रूप से कई हाथ उठते दिखते हैं। सुरक्षाबलों के हाथ बांधकर यदि उन्हें आतंकियों के सामने मेमने के रूप में डालोगे तो उनकी आत्मा से निकली बददुआएं तुम्हें चैन से भला कैसे रहने देंगी। इसलिए बलिदानियों का सम्मान और राष्ट्रघातकों का विनाश करो, यही धर्म है।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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