बिहार के परिणाम

  • 2015-11-12 02:41:16.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

बिहार में चुनाव परिणाम एनडीए के खिलाफ रहे हैं। सारे चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया है कि बिहार की जनता ने भाजपा के ‘मोदी विजन’ को लात मारकर लालू-नीतीश के ‘प्रोवीजन’ को अपने लिए अपनाना उचित माना है। जेडीयू दो तिहाई बहुमत से अपने साथियों के साथ सत्ता में लौटी है और नीतीश कुमार अब हैट्रिक बनाकर बिहार में अगले पांच वर्ष फिर शासन करने के लिए जनता ने अपनी पसंद बना लिये हैं।

वैसे चुनाव परिणामों पर और बिहार की जनता के मूड पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। यदि मोदी की भाजपा की पराजय पर चिंतन करें तो यहां महागठबंधन ने उसी पैटर्न पर काम करने का प्रयास किया, जिस पर चलकर सारे भाजपा विरोध को एक साथ इकट्ठा करके दिल्ली में केजरीवाल को सत्ता में लाया गया था। यहां पर बिसाहड़ा कांड को इस प्रकार उछाला गया कि जैसे अल्पसंख्यक भारत में मोदी के रहते असुरक्षित हैं। भाजपा बिसाहड़ा काण्ड पर चुप रही और उसने कुछ भी न बोलना उचित समझा, इसका अर्थ भाजपा के मतदाताओं में यह लगाया गया कि भाजपा भी कांग्रेस की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण करती है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बिसाहड़ा काण्ड पर बोले तो सही, पर बहुत देर से बोले। उन्होंने बिसाहड़ा काण्ड को प्रदेश सरकार के मत्थे मंढऩे में भी देरी की, जबकिबिसाहड़ा में जो कुुछ हुआ उसके लिए स्थानीय प्रशासन और प्रांतीय सरकार की जिम्मेदारी अधिक थी। जितनी देर में मोदी बोले उतनी देर में मैदान उनके हाथ से छूट चुका था। इतनी देर में लोगों ने मतों का धु्रवीकरण कर डाला जहां मुस्लिम मत भाजपा से इसलिए छिटका कि उसके रहते मुस्लिम भारत में असुरक्षित हैं वहीं हिंदू मतदाता भी भाजपा से कुछ दूर हो गया।


महंगाई, किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य न मिलना, देश में बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार में कोई उल्लेखनीय कमी का न आना, विपक्ष द्वारा सघन जनसंपर्क अभियान चलाकर प्रदेश में लगभग पौने पांच सौ रैलियां कर डालना और उसके जवाब में भाजपा की ओर से मोदी की तीस और अमित शाह की 85 जनसंपर्क रैलियों का आयोजन होना इत्यादि बातों के चलते भाजपा आम आदमी तक अपनी पहुंच नही बना पायी।

जहां तक बिहार के मतदाता की बात है तो वहां पर अभी भी अशिक्षा, जातिवाद, और प्रांतवाद का बोलबाला है। आम मतदाता को इन्हीं चीजों से लडऩा है और इन्हीं चीजों के इर्द गिर्द रहना है, मोदी ने कितनी विदेश यात्राएं कीं और वहां उन्हें क्या उपलब्धि मिली? इससे आम मतदाता को कोई लेना-देना नही है। जबकि भाजपा केवल मोदी के चेहरे को लेकर मैदान में उतरी और मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा चुनाव परिणाम आने तक भी नही की। इसका अभिप्राय था कि जनता नीतीश के सामने भाजपा का कौन व्यक्ति सीएम होगा इस बात को लेकर अंतिम क्षणों तक असमंजस में रही। लालू प्रसाद यादव अपनी परंपरागत राजनीति में सफल रहे और आरएसएस प्रमुख द्वारा आरक्षण पर की गयी टिप्पणी को लेकर ही उन्होंने जनता के बीच में इतना शोर मचा दिया कि उसकी नजर में जीरो हुए लालू रातों-रात ‘हीरो’ बन गये।

जहां तक नीतीश का प्रश्न है तो बिहार की जनता ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से नकारकर भी महागठबंधन के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया है, यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। जबकि कांग्रेस के पास इस समय कुछ पाने का अवसर था, लेकिन उसने  कुछ खोना उचित समझा, इस पार्टी का दिमागी दिवालियापन ही कहा जाएगा कि यह अपनी हार पर भी जीत का जश्न मना रही है। कुछ भी हो बिहार की जनता ने राजग को झटका देकर उसकी दीवाली के पटाखे शांत कर दिये हैं और लालू, नीतीश को फिर एक द्वीप (लालटेन) जलाने का अवसर दे दिया है। देखते हैं लालटेन विकास के नाम पर बिहार को कितना प्रकाश दे पाएगी?