पहचानी जाएं भारत में कुपोषण की कडिय़ां

  • 2016-07-14 11:30:50.0
  • पीयूष द्विवेदी

1223644681152

आज के बच्चे ही कल युवा होंगे और राष्ट्र की प्रगति व संरक्षण का दायित्व उनके कंधों पर होगा। ऐसे में आवश्यक है कि वे शारीरिक-मानसिक स्तर पर स्वस्थ व मजबूत हों। बच्चों को शारीरिक-मानसिक स्तर पर स्वस्थ व मजबूत रखने के लिए बुनियादी जरूरत यह है कि गर्भ में पल रहे शिशु से लेकर तकरीबन तीन-चार वर्ष तक उनके पोषण व चिकित्सा का समुचित ध्यान रखा जाए। इस समय अगर उनके खान-पान आदि के प्रति जरा भी लापरवाही हुई तो वे कुपोषण की चपेट में चले जाते हैं। सच तो यह है कि कुपोषण की समस्या आज इतना विकराल रूप ले चुकी है कि विश्व बैंक ने इसकी तुलना ‘ब्लैक डेथ’ नामक उस महामारी से की है जिसने अठारहवीं सदी में यूरोप की एक बड़ी जनसंख्या को नष्ट कर दिया था।

इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों भारत के दौरे पर आए विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद तमाम बातों के बीच यह महत्त्वपूर्ण बात भी कही कि वे प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से कुपोषण के खात्मे को लेकर जताई गई प्रतिबद्धता की पूर्ति के लिए भारत को पूरा सहयोग दिलाने को तैयार हैं। जाहिर है, भारत में कुपोषण की स्थिति को लेकर विश्व बैंक की अपनी चिंताएं हैं, जिनका इजहार वह पहले भी कई बार कर चुका है। और भारत को इस संबंध में सहयोग भी मिलता रहा है। बावजूद इसके, आज भी भारत में कुपोषण के निवारण के लिएचल रहे कार्यक्रमों की वर्तमान स्थिति बहुत अच्छी नहीं कहीं जा सकती। बल्कि गौर करें तो बच्चों के स्वास्थ्य व पोषण के मामले में यहां स्थिति बेहद खराब नजर आती है।




संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल पांच वर्ष से कम उम्र के लगभग इक्कीस लाख बच्चे समुचित पोषण व स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने के कारण काल के गाल में चले जाते हैं। इस साल की शुरुआत में आई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट (जिसमें देश के पंद्रह राज्यों को शामिल किया गया था) के मुताबिक पंद्रह में से सात राज्यों में पांच वर्ष से कम उम्र के आधे से अधिक बच्चे किसी न किसी प्रकार के कुपोषण से ग्रस्त हैं। रिपोर्ट के अनुसार, जिन पंद्रह राज्यों में सर्वेक्षण किया गया था उनमें से सात राज्यों में पांच वर्ष से कम उम्र के आधे बच्चे कद मेंछोटे हैं, यानी उनकी कम वृद्धि हुई है। इनमें बिहार सबसे आगे है (48.3 प्रतिशत), इसके बाद मध्यप्रदेश और मेघालय हैं (चालीस प्रतिशत से अधिक); जबकि कम वृद्धि वाले बच्चे जिन राज्यों में तीस प्रतिशत से अधिक हैं उनमें हरियाणा (34 प्रतिशत), उत्तराखंड (33.5 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (32.5 प्रतिशत) शामिल हैं।

सर्वे में बाल कुपोषण पर तीन प्रकार के आंकड़े दिए गए हैं- छोटा कद, कमजोरी और वजन की कमी (उम्र के अनुसार कम वजन)। सर्वे के मुताबिक, हरियाणा में कमजोर बच्चों की संख्या 2005 में 19.1 प्रतिशत थी, जो बढ़ कर 2015-16 में 19.5 प्रतिशत हो गई है। इसके अलावा एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की तीसरी सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद स्वास्थ्य और पोषण के मामले में भारत की हालत नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों से भी बदतर है। गौरतलब है कि ये देश भारत से कई तरह सहायता प्राप्त करने वाले देशों में शामिल हैं। ऐसे में अगर भारत में बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी स्थिति इन देशों से भी बदतर है तो यह भारत के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति कही जाएगी।

यह कहना गलत नहीं होगा कि आज जहां एक तरफ भारत विश्व-पटल पर अपनी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के दम पर अपनी पहचान कायम करके गर्वित हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी भावी पहचान यानी उसके बच्चों का एक बड़ा हिस्सा कुपोषण की चपेट में जीने को विवश है। हालांकि भारत में बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए कई सरकारी कार्यक्रम काफी समय से चलाए जा रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख है एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम, जो दशकों से चल रहा है और जिसे कुपोषण मिटाने का दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम कहा जाता है। इसके अलावा, जच्चा-बच्चा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘जननी-शिशु सुरक्षा’, ‘आशा’ आदि कई योजनाएं व कार्यक्रम बनाए गए हैं।

वर्तमान सरकार द्वारा भी इस दिशा में ‘आशा’ आदि के माध्यम से कुपोषित बच्चों के लिए ग्रामीण स्तर पर मिनी अस्पताल खोलने तथा कुपोषण को लेकर लोगों को जागरूक करने जैसे तमाम कदम उठाए जा रहे हैं। पर इसे व्यवस्था का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि सरकार की अन्य योजनाओं की ही तरह ये योजनाएं व कार्यक्रम भी अधिकाधिक रूप से कागजी खानापूर्ति तक सिमट कर रह गए हैं। यथार्थ के धरातल पर इन योजनाओं का कोई ठोस क्रियान्वयन होता नहीं दिखता। इन कार्यक्रमों के कारगर न हो पाने का प्रमुख कारण केंद्र व राज्य सरकारों के बीच सही तालमेल का न होना है और इस तालमेल की कमी का खमियाजा देश के नन्हे मासूमों को भुगतना पड़ रहा है।

बच्चों में कुपोषण की व्याप्ति दो तरह की है। एक, जन्म के साथ, और एक, जन्म के कुछ समय बाद। इन दोनों ही स्थितियों में जच्चा-बच्चा को समुचित पोषण न दिया जाना ही कुपोषण का मुख्य कारण होता है। शिशु अवस्था में कुपोषण से ग्रस्त होने की स्थिति में बच्चा बड़े होने पर भी सुपोषित बच्चों की अपेक्षा शारीरिक-मानसिक स्तर पर काफी हीन रह जाता है। जैसे, उम्र के लिहाज से कद छोटा होना, शरीर पतला या सूजा हो जाना, याददाश्त कमजोर हो जाना और कोई भी काम करते हुए बहुत ही जल्दी थक जाना आदि कुपोषण के तमाम लक्षण हैं। इनके अलावा, कुपोषणग्रस्त बच्चे पर घेंघा, एनीमिया, मैरेमस आदि बीमारियों का खतरा भी हमेशा बना रहता है। तिस पर कुपोषण को लेकर सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि जो बच्चा जन्म से पांच वर्ष के भीतर इसकी चपेट में आ गया, उसके लिए आगे इससे मुक्त होना काफी मुश्किल हो जाता है। स्पष्ट है कि एक बार कुपोषण से ग्रस्त होने की स्थिति में व्यक्ति का जीवन बेहद कठिन हो जाता है, उससे उबरना उसके लिए आसान नहीं होता। कह सकते हैं कि कुपोषण एक धीमे जहर की तरह है, जो देश की भावी पीढ़ी को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है।

इसमें संदेह नहीं कि कुपोषण के पीछे सबसे प्रमुख वजह पोषक आहार की कमी होती है। लेकिन इसके अलावा और भी कुछ बातें हैं जिन्हें कुपोषण के लिए जिम्मेदार कहा जा सकता है। इनमें समाज के एक बड़े हिस्से में जागरूकता की बेहद कमी और साफ-सफाई का अभाव प्रमुख है। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत कम लोग पोषण के मामले में सजग होते हैं। ज्यादातर लोग इस बात के प्रति लापरवाह नजर आते हैं कि उचित पोषण के लिए क्या और कितना खाना चाहिए। उनकी नजर में पोषण का सिर्फ एक अर्थ होता है कि जो भी मिले, खूब खाओ। वे समझते हैं कि खूब खाने से व्यक्ति तंदुरुस्त रहता है और प्राय: यही चीज वे अपने बच्चों पर भी लागू करते हैं। परिणामस्वरूप वे स्वयं तो कुपोषित और अस्वस्थ रहते ही हैं, अपनी आने वाली पीढिय़ों को भी कुपोषण पारंपरिक धरोहर के रूप में दे देते हैं। कुपोषण का एक नया आयाम जंक फूड के रूप में उभरा है। विडंबना यह है कि जंक फूड का ज्यादा चलन उस तबके में है जो शहरों में रहता है और शिक्षित भी है। खाने का मतलब सिर्फ यह नहीं होता कि किसी तरह पेट भर जाए, यह भी होता है कि जो खाया जाए वह सेहत के लिए मुफीद हो। पर शहरी शिक्षित तबके तक में यह चेतना विकसित नहीं हो पाई है। इसके अलावा साफ-सफाई की कमी भी कुपोषण के लिए एक अहम कारण है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में तकरीबन पच्चीस हजार ऐसी बस्तियां हैं जहां साफ-सफाई का स्तर औसत से भी नीचे है। हालत यह है कि इन बस्तियों में रहने वाले लोगों के घरों के आसपास कहीं कचरे का ढेर लगा होता है तो कहीं बगल से ही नाली बह रही होती है।
-पीयूष द्विवेदी

पीयूष द्विवेदी ( 13 )

???? ????? ????? ?????? ?? ??????? ???? ?? ?????? ???? ??????? ??? ?????? ?? ????? ???? ?? ??? ????????, ????????? ?? ????????? ??? ?? ??? ???????? ???? ????? ?? ???? ???? ???? ????? ?? ?? ??? ?????????? ???? ????, ?????????? ???? ??? ????? ?? ?? ????? ?? ??? ?? ?????????? ????? ????