राष्टट्रद्रोह और व्यवस्था परिवर्तन

  • 2012-10-12 14:55:49.0
  • उगता भारत ब्यूरो

राकेश कुमार आर्य
जब नक्सलवादी हिंसा 6 मार्च 2010 को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हमारे 76 जवानों को शहीद कर दिया तो उसके पश्चात सारा देश इस हिंसा के विरूद्घ आवाज उठाने लगा कि इन हिंसक और अत्याचारी नक्सली राक्षसों के विरूद्घ देश की सुरक्षा के हित में कठोर कदम उठाये जायें। परंतु हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम ने बड़ा ही निराशा जनक उत्तर दिया कि हम आवेश में कोई कदम नही उठाएंगे। उनके वक्ततव्य का अर्थ स्पष्टï है कि नक्सली चाहे और भी हिंसा कर लें, पर हम उसके प्रतिवाद के लिए कठोर होने वाले नही हैं।
इस प्रकार के क्षमा भाव को हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व ने भारतीय राष्ट्र के लिए एक समस्या बनकार प्रस्तुत किया है। हर कदम पर इनके इसी प्रकार के वक्तव्य आते हैं और हम वह नही कर पाते जो कर लेना चाहिए। महाभारत में धृष्टद्युम्न ने कृष्ण जी से कहा है :-
क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोअति क्षमाम।
क्षमावंत हिं पापात्मा, जितोअयमिति मन्यते।।
अर्थात संसार में क्षमा को अच्छा माना जाता है, पर पापी व्यक्ति कभी क्षमा के योग्य नही होता, क्यों कि पापों में ही लगे हुए मन वाला व्यक्ति क्षमा करने वाले को अपने द्वारा जीता हुआ मान लेता है।
महाभारत ही एक अन्य स्थान पर घोषणा करती है कि हे प्रिय अधिक क्षमाशील व्यक्ति को चपरासी पुत्र नौकर तथा सामान्य जन भी बुरा भला कहते रहते हैं। जब शासक आतंकी लोगों के सामने झुक जाता है, या उनके प्रति अपने वास्तविक धर्म कठोरता का पालन करने से हिचकता है या भागता है तो उस समय देश में अराजकता उत्पन्न होने लगती है। राष्ट्रीय भावना का विलोप होने लगता है, और जनता एक दूसरे के प्रति हिंसक हो उठती है। कौटिल्य ने कहा है-ऐसी परिस्थिति में दुर्बल प्रजाएं लोभ करने लगती हैं और लोभ के कारण वे अपने शासक से विरक्त हो जाती हैं। विरक्त होने पर या तो शत्रु से जा मिलती है, या अपने स्वामी को स्वयं ही मार डालती हैं। नक्सलवादी और माओवादी आतंकियों के लिए देश के भीतर ही रहने वाले कम्युनिस्ट लोगों ने खाद पानी उपलब्ध कराने का कार्य किया है। इन कम्युनिस्टों को ये लोग आतंकी नही दीखते। देश की संस्कृति, धर्म, इतिहास और परंपराओं के कट्टर विरोधी कम्युनिस्टों को इस देश की निजता और अस्मिता से कोई लेना देना नही है। इनका इतिहास इस बात का साक्षी है कि ये देश में व्यवस्था परिवर्तन के लिए किया जाने वाला कृत्य ही दिखाई देता है। इन्होंने नक्सलवाद या माओवाद को देश की गरीब जनता की आवाज के साथ जोड़ा है। इनका मानना है कि गरीब को जब रोटी नही मिलेगी तो वह हथियार उठाएगा ही और इस प्रकार की हिंसा भी वह करेगा। पिछले तीन दशक से अधिक समय से कम्युनिस्ट पश्चिमी बंगाल में शासन कर रहे हैं, परंतु ये इस एक प्रांत से भी गरीबी दूर नही कर पाये। तीन दशक का समय इनके लिए इस बात के लिए पर्याप्त था कि वे अपनी आदर्श शासन व्यवस्था को इस प्रांत में स्थापित करते और सारे देश के लिए पश्चिमी बंगाल को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते। इन्हें इसके लिए कोई अलग संविधान नही बनना था क्योंकि हमारे देश का संविधान ऐसी व्यवस्था करता है कि उसी व्यवस्था के अंतर्गत ये लोग पश्चिमी बंगाल का कायाकल्प कर सकते थे। जैसे हमारे संविधान की प्रस्तावना ही स्पष्टï करती है कि राज्य का प्रमुख उद्देश्य देश के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय उपलब्ध कराना है। सारे संविधान में लाख दोष हों, परंतु कम्युनिस्टों को अपनी विचाराधारा को लागू करने के लिए संविधान की प्रस्तावना का यह अंश ही पर्याप्त थाा।
यदि पश्चिमी बंगाल में कम्युनिस्ट असफल रहे हैँ तो वह देश में कोई नयी व्यवस्था देकर देश की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर पाएंगे, इसमें संदेह है।
कम्युनिस्टों का यह तर्क नितांत भ्रामक है कि निर्धनता के कारण लोग राष्ट्रद्रोह जैसी उपरोक्त घटनाओं को कर रहे हैं। इनको स्मरण रखना चाहिए कि निर्धन वर्ग कभी भी राष्ट्रद्रोही नही होता। वह विदेशी शक्तियों के द्वारा संकेत पाकर कभी देश के साथ घात नही करता। कुछ लोग व्यवस्था परिवर्तन के माध्यम से अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए निर्धनों को अपना मोहरा बनाते हैं और उन्हें रोटी का लालच देकर बरगलाते हैं। उस समय भी निर्धन वर्ग राष्ट्रद्रोह के लिए ऐसे लोगों का साथी नही बनता है। वह मात्र व्यवस्था परिवर्तन के लिए ही उनके साथ खड़ा होता है। कम्युनिस्ट जो खेल खेल रहे हें वह राष्ट्रद्रोह का है। हम यह जानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था हमारे देश की समस्याओं का समाधान करने के स्थान पर स्वयं ही एक समस्या बनकर रह गयी है। लेकिन लोकतंत्र स्वयं में एक समस्या नही है यह तो समस्या का एक समाधान है। इसे समस्या तो राजनीतिक लोगों ने बनाया है। इसलिए वर्तमान व्यवस्था जितनी बोझिल दीख रही है उसके लिए हमारे नेता अधिक उत्तरदायी हैं। सारी व्यवस्था में सडांध आ रही है। यदि कम्युनिस्ट इस राजनीतिक परिवेश को समाप्त कर सकें, और राजनीति के आकाश में छाये राजनीतिक प्रदूषण को समाप्त कर सकें, तो यह उनका देश पर महान उपकार होगा। आज हमें व्यवस्था में इसी सीमा तक के परिवर्तन की आवश्यकता है। हमारे देश के कर्णधार जिस प्रकार देश के भीतर छिपे आतंकियों के समक्ष घुटने टेक रहे हैं, उससे ऐसा लग रहा है कि जैसे हमारी सरकार ही दोषी है और यह सारा राष्ट्र भी दोषी है। आतंकियों के द्वारा किये जा रहे राष्ट्रद्रोह को भी यहां बहुत हल्के से लिया जा रहा है। हे बुद्घिमान कर्मशील विघ्नकारकों के विध्वंसक सब साधनों से संपन्न राजन आप अपने संपूर्ण साधनों से हमारे द्वारा प्राप्त ऐश्वर्य बनाये रखने तथा नये ऐश्वर्य को प्राप्त कराने में समर्थ हैं। आप दिन के मध्य में किये जाने वाले ऐश्वर्य साधन सभी क्रिया कलापों को कीजिये।
इस वेद मंत्र से स्पष्ट है कि प्रजा विघ्न कारकों का विध्वंसक राजा को मानती है। उनके सामने हथियार फेंक कर अनुनय विनय करने का की नहीं मानती। यह निर्विवचाद सत्य है कि देश की अधिकांश जनता सदा ही राष्ट्र की मुख्यधारा में चलने वाली हुआ करती है। उसके ऐश्वर्य को बनाये रखने के लिए राजा की आवश्यकता होती है। परंतु आज के शासकों ने अपने ऐश्वर्य की रक्षा के लिए प्रजा का प्रयोग करना सीख लिया है। अब देश की जनता के लिए शासक नही है अपितु देश के शासकों के लिए देश की जनता के लिए शासक नहीं अपितु देश के शासकों के लिए देश की जनता है। यह निराशाजनक स्थिति ही आज की राजनीतिक व्यवस्था को दुर्गंधित बनताी है। परंतु इसके उपरांत भी देश का अधिकांश निर्धन वर्ग शांत है। वह देश की मुख्यधारा में चलते रहकर ही देश की समस्याओं का समाधान चाहता है इसे आप यूं भी कह सकते हैं कि वह अपनी निर्धनता से इस सीमा तक टूटा हुआ है कि वह किसी प्रकार का राजनीतिक आंदोलन नही चला सकता हां कुछ लोग उसका अनुचित लाभा अवश्य उठा सकते हैं कोई भी आंदोलन कभी भी निर्धन और अशिक्षित लोगों के द्वारा नरन्ही लड़ा जा सकता। उन्हें नेतृत्व देने वाला सदा ही कोई शिक्षित होता है। देश के लाचार और निर्धन वर्ग का यह शिक्षित दुरूपयोग या सदुपयोग करके व्यवस्था परिवर्तन की हुंकार भरता है। इसे ही लोग क्रांति कहा करते हैं। हम ऐसी क्रांति के समर्थक हैं जो देश की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था को देश के लिए एक समस्या न इतिहास, धर्म और संस्कृति, की रक्षा कराने में समर्थ हो तथा देश को पुन: विश्व गुरू के गौरवमयी प्रतिष्ठित पद पर आरूढ करा सके। यदि हमारे कम्युनिष्ट इस दिशा में कोई सकारात्मक कार्य करें तो उसका स्वागत है। वर्तमान में हमारे कम्युनिस्टों को यह बात समझ्रनी चाहिए कि आतंकी को क्षमा करना एक समस्या है और उसके प्रति कठोर रहना एक समाधान है।
निर्धनता कभी भी राष्ट्रद्रोह नही सिखाती, हां शासन व्यवस्था के विरूत्र्द्घ जब कुछ लोग आवाज लगाते हैं तो निर्धन वर्ग अपनी समस्याओं के निवारण को दृष्टिगत रखते हुए ऐसे व्यक्तियों के साथ अवश्य आ जुड़ता है। यह उसका राष्ट्र धर्म भी है और कत्र्तव्य भी। परंतु यह बात किसी ऐसे आंदोलन का नेतृत्व करने वाले व्यक्त्यिों का व्यक्ति समूह पर निर्भर करती है कि वह ऐसे आंदोलन में जुड रहे निर्धन वर्ग के सहयोग का सदुपयोग करते हैं या दुरूपयोग। समस्या यह नही है कि देश का सामान्य जन अपने ऐश्वर्य की रक्षा के लिए लोकतंत्र के माध्यम से शासकों का चयन करता है, अपितु समस्या यह है कि ये शासक अपने ऐश्वर्य की रक्षा के लिए जनता का प्रयोग कर रहे हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है भारत के स्व को प्रतिष्ठित करना। यह स्व विभिन्न स्तरों पर दीखना चाहिए यथा स्वराष्ट्र, स्वदेश, स्वधर्म, स्वसंस्कृति, स्वभाषा, स्वराजनीति ही देश की समस्याओं का एकमात्र समाधान है।