राष्ट्रीयता और महर्षि दयानन्द -भाग-3

  • 2015-12-04 03:06:37.0
  • राकेश कुमार आर्य

maharshi dayanand saraswatiलोकशक्ति और राष्ट्रभक्ति का यह अद्भुत समन्वय है। यह ऐसा सामंजस्य है कि जिसे आप अलग-अलग नही कर सकते। महर्षि दयानन्द जिस राष्ट्रवासी को ‘आर्य’ कहते हैं, उसके चिन्तन को वह राष्ट्रवादी बनाकर उसे आगे बढ़ाना चाहते हैं। आर्य जागरण का अर्थ यहाँ आप लोकशक्ति के जागरण के रूप में प्रतिष्ठित कर सकते हैं। यह लोकशक्ति का जागरण अन्ततोगत्वा राष्ट्र शक्ति के जागरण में प्रतिष्ठित होगा। उसे महर्षि एक ‘समाज’ कहते हैं।

यदि ‘हम भारत के लोग’ शब्दों को आप थोड़ी देर के लिए यूँ मान लें  ‘हम आर्यावत्र्त के आर्यजन’ तो इसका अर्थ होगा कि हम एक जागृत और सुदृढ़ राष्ट्र आर्यावत्र्त के सभी जागृत और राष्ट्रचिन्तक जन हैं, जो परस्पर ऐसी बन्धुता (जो राष्ट्र निर्माण के लिए एक अदृश्य विशाल भावना किन्हीं राष्ट्रवासियों के भीतर समाहित होती है, अथवा राष्ट्रवासियों के मध्य जिसका होना अनिवार्य माना जाता है) से संबद्घ है, कि जो राष्ट्र की एकता और अखण्डता को और भी सुनिश्चित करेगी। यदि हम इस शब्द समूह की ऐसी व्याख्या करते हैं तो ज्ञात होता है कि हमारे संविधान निर्माताओं पर आर्य-समाजी चिन्तन का कितना प्रभाव था? महर्षि दयानन्द ने जो सोचा था कि राजा के अधीन सभा, सभा के अधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के अधीन हो।

उनका यह चिंतन भी इस प्रस्तावना से स्पष्ट हो जाता है। यहाँ अन्तिम शक्ति प्रजा में समाहित है। क्योंकि संविधान की निर्माता जनता है। लेकिन जब विधायिका अपना विधान बनाकर इस प्रजा पर लागू करेगी तो उस समय स्पष्ट हो जायेगा कि प्रजा सभा के अधीन है। इस सभा के सामूहिक निर्णय को चूँकि प्रधानमंत्री (राजा) लागू करायेगा तो उसकी स्थिति भी स्पष्ट हो जाती है कि वह भी सभा के ही आधीन है। महर्षि का चिन्तन कितना स्पष्ट हो रहा है कि जनता स्वयं अपनी, अपने राजा की और अपनी सभा की स्थिति को इस प्रस्तावना में ही स्पष्ट कर रही है।

‘हम भारत के लोग’ शब्द स्पष्ट करते हैं कि भारत का संविधान ब्रिटिश संसद की देन नहीं हैं। यह स्वतन्त्र और सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के निवासियों की देन है। महर्षि स्वतन्त्र और सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के ही तो स्वप्नदृष्टा थे। उनके राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का यही वह आदर्श स्वरूप था जिसे वह किसी भी राष्ट्र की उन्नति और प्रगति के लिए आवश्यक मानते थे। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस शब्द समूह के विषय में कहा है कि ये शब्द भारत के लोगों की सर्वोच्च प्रभुता की घोषणा करते हैं और इस बात की ओर संकेत करते हैं,  कि संविधान का आधार उन लोगों का प्राधिकार है।

हमने पूर्वोल्लेख किया है कि ‘महर्षि दयानन्द की राष्ट्रीयता एक विश्व’ की अवधारणा को विकसित कर ‘कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम’ के सपने को साकार करना चाहती थी। यह राष्ट्रीयता किसी भी दृष्टिकोण से इस अन्तर्राष्ट्रवादी राष्ट्रीयता को विकसित करने में बाधक नही है। महर्षि का यह सार्वभौम मानवतावाद संविधान के अनुच्छेद 51 में स्पष्ट झलकता है। अनुच्छेद 51 कहता है-‘‘अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्घि, राज्य-

(क) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्घि का, (ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाये रखने का, (ग) संगठित लोगों के एक दूसरे के व्यवहारों से अन्तर्राष्ट्रीय विधि तथा संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और (घ) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के  माध्यस्थम् द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।’’

महर्षि दयानन्द की सार्वभौम मानवतावाद की झलक देते इस अनुच्छेद पर पंडित नेहरू ने कहा था-‘‘हमारा अन्य राष्ट्रों के साथ मिलकर एक यही सामान्य उद्देश्य सम्भव हो सकता हैं कि हम मिलकर विश्व के लिए एक संरचना तैयार करें। चाहे उसे एक विश्व कहें या कुछ और (वसुधैव कुटुम्बकम)।’’

वास्तविक बन्धुता कब स्थापित होगी?

जब तक एक मत अर्थात् हम सब राष्ट्रवासी एक सी मति वाले और विचार वाले न हो जायें, तब तक हमारी गति की दिशा सही नही होगी। एक जैसी मति ही सही गति का निर्धारण करती है। इसीलिए महर्षि दयानन्द का विचार था कि जब तक एक मत, एक हानि-लाभ, एक सुख दु:ख परस्पर न मानें तब तक उन्नति होना असम्भव है। इसका अभिप्राय है कि जिस प्रकार एक भाई को चोट लगे और आह दूसरे की निकले, एक की संवेदनाऐं दूसरे के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाये कि उन्हें अलग करना ही कठिन हो जाये तो वास्तविक बन्धुता वही कहलाती है। नागरिकों की ऐसी गहन संवदेनशीलता राष्ट्रीयता का एक परमावश्यक तत्व है। महर्षि आर्यों के इस परिवारगत संस्कार को राष्ट्रगत संस्कार में परिवर्तित कर पुष्पित और पल्लवित होता देखना चाहते थे। इसलिए महर्षि का सपना था कि देश में जो विभिन्न मूलवंश, जाति और सम्प्रदायों का बखेड़ा खड़ा कर दिया गया है, यह बन्धुता के मार्ग में एक बहुत बड़ी बाधा है।

हमारे संविधान से भी पूर्व 1948 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंगीकृत ‘मानव अधिकार’ की घोषणा के अनुच्छेद 1 में यह कहा गया हैं:-

‘‘सभी मनुष्य जन्म से ही गरिमा और अधिकारों की दृष्टि से स्वतन्त्र और समान हैं। उन्हें बुद्घि और अन्तश्चेतना प्रदान की गयी है। उन्हें परस्पर भ्रातृत्व की भावना से रहना चाहिए।’’

इसी आशय को लेकर हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत के नागरिकों के मध्यबन्धुता स्थापित करने की बात को प्राथमिकता दी। महर्षि दयानन्द ने राष्ट्रीयता के सम्बन्ध में अपने विचारों को वेद की भाषा में स्पष्ट करते हुए कहा कि यह भारत भूमि हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं। यह माता और पुत्र का सम्बन्ध जब मातृभूमि और राष्ट्रवासियों के मध्य स्थापित हो जाता है तो उस समय देश में अपने आप ही बन्धुता का भाव विकसित होने लगता है। स्वतन्त्रता संघर्ष के काल में भारत माता की जय का नारा हमारे लिए बड़ा ही लोकप्रिय बन गया था। एक व्यक्ति जब इस उद्घोष को बोलता था तो दूसरे सभी स्वयं को मां का आज्ञाकारी पुत्रा समझकर इस उद्घोष का वीरोचित शैली में उत्तर दिया करते थे। वह समय बड़ा ही रोमांचकारी होता था। कारण स्पष्ट था कि उस समय हमारी संवेदनाऐं एकाकार हो जाती थीं। महर्षि संवेदनाओं के इसी स्वरूप को देश के नागरिकों का स्वाभाविक गुण बना देना चाहते थे।

क्या कश्मीर हमारी खण्डित राष्ट्रीयता का प्रतीक है?

देश के किसी भी भाग में बसना और वहाँ अपना व्यापार या कारोबार स्थापित करना देशवासियों का मौलिक अधिकर है। पर यह बात कश्मीर पर लागू नही होती। धारा 370 इस राज्य को एक अलग प्रास्थिति प्रदान करती है। वास्तव में यह अनुच्छेद विघटनकारी है। परिणामस्वरूप राष्ट्र में खण्डित राष्ट्रीयता का वातावरण हम देखते हैं। यह धारा हमारे भूगोल और इतिहास के तो विरूद्घ है ही साथ ही हमारे राष्ट्रवाद की डगर में सबसे बड़ी बाधा भी है। हमें सार्वभौम मानवतावाद के माध्यम से (नेहरू का अन्तर्राष्ट्रवाद नही) देशों की कृत्रिम सीमाओं को धीरे-धीरे मिलाकर ‘एक राष्ट्र’ की स्थापना की ओर बढऩा था, पर हम उधर न बढक़र रास्ता भटक गये। हमने देश में ही विभाजन की दीवार खड़ी कर ली। यह दीवार स्वयं संविधान की मूल भावना के भी प्रतिकूल है।