परिश्रमी, तपस्वी परमात्म निष्ठ राष्ट्र के स्वप्न दृष्टा श्री मोदी

  • 2016-06-01 03:41:27.0
  • राकेश कुमार आर्य

राष्ट्र के स्वप्न दृष्टा श्री मोदी

‘‘जिंदगी यह कहके दी रोजे अजल उसने मुझे।
यह हकीकत गम की लें और राहतों के ख्वाब देख।।’’

इस जीवन का सत्यपूर्ण और तथ्यपूर्ण सार यही है कि इसमें गम की हकीकत लेकर राहतों के ख्वाब देखने होते हैं और यही राहतों के ख्वाब ही होते हैं जो हमारे जीवन में आशा का संचार किये रखते हैं। जिस जीवन से ‘आशा’ लुप्त हो जाती है उससे विश्वास का करण्ट अपने आप समाप्त हो जाता है। परिणाम चारों ओर गहन अंधकार छा जाता है।

जो ईश्वर भक्त होते हैं उनके जीवन में उत्साह और आशा का सदा संचार प्रवाहित रहता है। वह नितांत अकेले रहकर भी स्वयं को अकेला अनुभव नही करते। उन्हें अपने भीतर प्रज्ज्वलित हो रही ज्योति सदा ज्योतित और आलोकित रखती है। ऐतरेय ब्राह्मण 7/15 में बहुत सुंदर बात की गयी है :-

नाना श्रान्ताय श्रीरस्ति, पापो नृषद्वरोजन:।
इंद्र इच्चरत: सखा चरेवैति चरेवैति।।

‘‘जो पूरी शक्ति से परिश्रम नही करते, उन्हें लक्ष्मी नही मिलती। आलसी मनुष्य पापी होता है। भगवान श्रम करने वालों का मित्र बनता है। इसलिए श्रम करो, श्रम करो।’’

भावार्थ है कि परिश्रमी और उद्यमी व्यक्तियों को ही संसार में विजय मिला करती है।

हमारे देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का जीवन एक परिश्रमी, पुरूषार्थी और उद्यमशील राजनेता का रहा है। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा जहां से प्रारंभ की वहां माता-पिता की ममता और वात्सल्य तो था पर उसके अतिरिक्त तो शून्य ही था। वह ‘शून्य’ भी ऐसा था कि भारत की राजनीति का शिखर पुरूष बनने का सपना वहां से खड़े होकर देखना आकाश के तारे तोडक़र लाने के समान असंभव था। श्री मोदी आज ‘मोदी’ केवल इसलिए हैं कि उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया है। उन्होंने संकल्प लिया कि मुझे चलना है और चल दिये। चल दिये तो फिर रूके नही। घर वालों ने पैरों में जंजीर डाल दी-विवाह कर दिया। पर यहां तो जंजीरों को तोडक़र आगे बढऩे की परंपरा युगों पुरानी है। कृष्ण ने तो जन्म लेते ही जंजीरें तोड़ दी थीं। बुद्घ ने विवाह को और गृहस्थी को जंजीर माना तो विवेक (बोध) होते ही उसे तोड़ दिया। कितने ही बीतराग संन्यासी और योगियों ने यहां गृहस्थ की जंजीरें तोड़ी हैं और आगे बढ़े हैं।

महापुरूषों के मार्ग का अनुसरण करने वाले लोग स्वयं ही महानता के उपासक हो जाते हैं। श्री नरेन्द्र मोदी ने महानता की साधना करनी आरंभ की, परिवार को छोड़ा अपने आपको छोड़ा और गहन साधना में चले गये। उस साधना से जो मोदी निकला अब तपकर सोने से कुंदन बन चुका था। नरेन्द्र मोदी जी के व्यक्तित्व का यह गुण हर किसी को प्रभावित करता है। वह जानते हैं कि श्रम से ही मधु प्राप्त होता है। सूर्य की गरिमा अर्थात उसकी तेजस्विता उसके निरंतर गति करते रहने में है। श्री मोदी ने अपने ऋषियों की विचारशक्ति को अपने लिए पंूजी  माना और उस पंूजी को अपनी संपत्ति समझकर उसी के बल पर आगे बढऩा आरंभ किया। अब उनके पास साधना शक्ति के साथ-साथ विचारशक्ति भी आ जुड़ी है।

प्रधानमंत्री की साधनाशक्ति उनके धैर्य में झलकती है जबकि विचारशक्ति उनकी भाषण शैली में झलकती है। धारा प्रवाह निरंतर बोलना और सटीक बोलना यह केवल श्री मोदी के ही वश की बात है। उनकी इस विशेषता से ईष्र्या करने वाले उनके राजनीतिक विरोधी उन पर बड़बोलेपन के या अनर्गल बोलने का आरोप लगाते हैं। पर यह श्री मोदी की विचारशक्ति ही है जो उन्हें लालकिले से भी धाराप्रवाह घंटे डेढ़ घंटे बुलवाती है और विदेशों में भी बड़ी से बड़ी सभा में या सम्मेलनों में बुलवाती है। जब उनके भाषण के बीच में विदेशों में भारतमाता की जय के नारे लगते हैं, तो देश के भीतर बैठे हर भारतवासी का सीना गर्व से फूल उठता है। ये वे क्षण होते हैं जो श्री मोदी को ‘जननायक’ के श्रेष्ठ गुणों से सुभूषित एवं महान व्यक्तित्व सिद्घ करा देते हैं।

श्री नरेन्द्र मोदी की मान्यता है कि जो कार्य जिन उपायों से बन सकता है उनका हमें अवलंबन करना चाहिए। राजनीति के महान विद्वान आचार्य चाणक्य ‘कौटिलीय अर्थशास्त्र’ में लिखा है :-

‘‘नक्षत्रमपि पृच्छन्तं बालमर्थोअति वत्र्तते।
अर्थो हयर्थस्य नक्षत्रं किं करिष्यन्ति तारका:।।

अर्थात काम के समय नक्षत्र और मुहूत्र्त छंटवाने वाले बालक होते हैं। ऐसे अबोधों को सफलता नही मिला करती। जो काम जिन उपायों से बन सकता है उनका अवलंबन करना चाहिए। उस काम में ये आकाश के तारे क्या बनाएंगे तथा क्या बिगाड़ेंगे?




साधना शक्ति, विचारशक्ति से युक्त श्री मोदी के पास उद्यमशक्ति भी है, उसी के कारण वह मुहूत्र्तों के चक्कर में न पडक़र केवल कार्य पर ध्यान देते हैं। संसार के लोग सामान्यतया इनमें से किसी एक या दो के होने पर ही रास्ता भटक जाते हैं। उन्हें संसार का कोई न कोई विकार आ घेरता है और काम, क्रोध, मद, मोह लोभादि में से किसी एक के वशीभूत होकर वे पतित हो जाते हैं। पर श्री मोदी पतित नही हुए, क्योंकि उनकी विचारशक्ति में अहिंसा का समावेश है। अपने विरोधियों पर कटाक्ष करना उनका स्वभाव है, पर उन पर कोई ऐसा आरोप नही लगा है कि उन्होंने अपने किसी राजनीतिक विरोधी को सदा-सदा के लिए रास्ते से हटाने के लिए उसे मरवा दिया हो। गोधरा काण्ड में फंसे श्री मोदी को लपेटने के उनके विरोधियों ने हरसंभव प्रयास किये, पर श्री मोदी ने अपने धुर विरोधी को भी जीवित रखने में ही भलाई समझी। वास्तविक अहिंसा की साधना इसे ही कहते हैं और इसी साधना ने श्री नरेन्द्र मोदी को अन्य गुणों के साथ-साथ राजशक्ति के गुण से भी अभिषिक्त कर दिया है। राजशक्ति को पाकर भी वह पूर्ण मनोयोग से राष्ट्र सेवा कर रहे हैं-यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।

इतनी सारी शक्तियों को लेकर मैदान में युद्घ कर रहे महानायक मोदी को परास्त करने के लिए उनके विरोधी अपने-अपने वैर भुलाकर उन्हें एक साथ मिलकर चित्त करने की युक्तियां खोज रहे हैं। ऐसे विरोधियों को हमने पहले बिहार में नीतीश बाबू के शपथग्रहण के साथ पटना में एकत्र होते देखा था तो अब लगभग वे ही चेहरे पश्चिमी बंगाल में ममता बनर्जी के शपथग्रहण के समय एकत्र होते दिखाई दिये हैं। ये सारे के सारे चेहरे जानते हैं कि तुम्हारे दिन अब लद चुके हैं अर्थात ‘खिचड़ी सरकारों’ का समय अब समाप्त हो गया है-पर यदि ये फिर भी एकत्र हो रहे हैं तो उसका एक ही कारण है कि ये गठबंधन कराके अगली लोकसभा में अपनी सीट बचे? केवल इतना प्रबंध कर लेना चाहते हैं। इस स्थिति को कुछ लोग ‘मोदी भय’ कह रहे हैं। हमारा मानना है कि विरोधियों में किसी भी शासक के व्यक्तित्व का इतना भय तो होना भी चाहिए, जिससे कि उनके भीतर संघर्षशीलता बनी रहे और साथ ही ऐसे शासक को चुनौती भी मिलती रहे।

श्री मोदी वैदिक संस्कृति के प्रति समर्पित हैं, यह बात सर्वमान्य है। इसलिए वह देशोत्थान के संदर्भ में वेद की इस आज्ञा को देश का मूलमंत्र बना देना चाहते हैं :-

श्रमेण तपसा ब्रह्मणा वित्तर्ते श्रिता। (अथर्व. 12/5/1)


वेद की आज्ञा है कि सभी देशवासी परिश्रमी हों, कामचोर ना हों, किसी दूसरे के अधिकार का हनन करने वाले ना हों, परिश्रम से तथा धर्मपालन और संयम से संयुक्त हों, परमात्मविश्वास और विज्ञान से भी उन्नत होते हुए पक्षपात रहित न्यायपूर्वक धनादि भोग पदार्थों की प्राप्ति में सदा चलने वाले बने रहो। वेद की इस आज्ञा का पालन करते हुए प्रधानमंत्री श्री मोदी ने देश में श्रम की प्रतिष्ठा पर बल दिया है, भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा के प्रति लोगों का झुकाव बढ़ाकर तथा योग प्राणायाम में उन्हें निष्णात कर वे सभी देशवासियों को तपस्वी बनाना चाहते हैं। तीसरे वह लोगों को आस्तिक (ब्रह्मणा) बनाना चाहते हैं अर्थात ईश्वरवादी, परमात्मनिष्ठ राष्ट्र का निर्माण उनका संकल्प है। ऐसी ऊर्जा और कत्र्तव्यपरायणता से ओत-प्रोत शुभचिंतन युक्त प्रधानमंत्री का मिलना सचमुच देश के लिए सुखद संयोग है।

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राकेश कुमार आर्य ( 1582 )

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