राम वन गमन मार्ग का होगा उद्घार

  • 2016-01-19 02:00:36.0
  • राकेश कुमार आर्य

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कैबिनेट में स्थान प्राप्त किये नितिन गडकरी उस व्यक्ति का नाम है जो अपनी कार्यक्षमता और क्रियाशीलता के लिए राजनीति में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है। उनकी योजनाओं में और कार्यशैली में देश के दूर भविष्य को लेकर एक स्पष्ट चिंतन झलकता है। इसलिए वह भारत के एक राजनेता के रूप में भी अपना स्थान देश के जनमानस में बना चुके हैं।

अब केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री श्री गडकरी ने राम वनगमन-मार्ग योजना के लिए डेढ़ अरब से अधिक धनराशि देने की घोषणा की है। इस मार्ग के माध्यम से अयोध्या से चित्रकूट को जोड़ा जाएगा। एक अरब  70 करोड़ रूपये से तैयार होने वाले इस मार्ग के पूर्ण होने पर देश के लोगों को अपनी अतीत की विरासत से जोडऩे में सहायता मिलेगी, देश की सांस्कृतिक पहचान को नये आयाम मिलेंगे। श्री गडकरी ने पूर्व में ही अयोध्या से चित्रकूट के मार्ग की दशा को सुधारने की घोषणा की थी।

कोई भी देश अपने अतीत की गौरवमयी सांस्कृतिक झलक को वर्तमान के साथ जोडक़र भविष्य के लिए जितना ही अधिक सचेत और जागरूक होता है वह उतना ही अधिक अपने इतिहास का सदुपयोग अपने भविष्य को सुधारने के लिए करने में सक्षम हो पाता है। मर्यादा पुरूषोत्तम राम भारत के लिए ही नही, अपितु विश्व के लिए भी समादरणीय हैं, क्योंकि उनका मर्यादित आचरण कालातीत है, हर काल में अनुकरणीय है। उनके जीवन की झांकी को देश की जितनी पीढिय़ां पढ़ पाएंगी उतनी ही देर तक देश का कल्याण होता रहेगा। इसलिए उन जैसे महान व्यक्तित्व के प्रति सरकारों का दायित्व बनता है कि उनकी स्मृतियों को ताजा बनाये रखने के लिए ऐसी योजनाओं पर कार्य किया जाता रहना चाहिए।
Ram Gaman Marg


‘रामायण’ शब्द का अर्थ है राम का वन गमन और वहां से पुन: आ जाना (अयण)। कहने का अभिप्राय है कि ‘रामायण’ राम के वन गमन से ही आरंभ होती है और जब अयोध्या लौट आये तो वहां समाप्त हो जाती है। इसलिए ‘रामायण’ में राम वनगमन से पूर्व का और फिर लौटकर आने के बाद का कोई उल्लेख नही है।
इसलिए केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी के लिए उचित होगा कि वह पूरी रामायण को ही राम वनगमन मार्ग के माध्यम से धरती पर प्रकट कर दें। इसके लिए चित्रकूट से आगे के उन स्थलों को भी इस मार्ग से जोड़ा जाए जहां-जहां राम लक्ष्मण और सीताजी अपने वनवास काल में ठहरे थे या जहां उनके द्वारा कोई विशेष कार्य किया गया था। अयोध्या से लेकर रामेश्वरम् तक का यह मार्ग
आस्था मार्ग’ या ‘रामायण मार्ग’  का  ‘राम गौरव पथ’ जैसे किसी नाम से पुकारा जाए। इसके लिए एक महत्वाकांक्षी सडक़ योजना को कार्यात्मक स्वरूप दिया जाए। मार्ग में पडऩे वाले उन सभी स्थलों को विशेष रूप से एक पर्यटक स्थल के रूप में विकसित किया जाए जिन से रामचंद्रजी के वनवास काल की कोई विशेष घटना जुड़ी हो। इससे हमारे युवकों को और आने वाली पीढिय़ों को राम, ‘रामायण’ और ‘रामायण कालीन’ भारत को समझने में सुविधा होगी।

अच्छा हो कि रामायण कालीन स्थलों के वही पुराने नामों को भी इस मार्ग में उल्लेखित किया जाए जो अब केवल इतिहास की पुस्तकों तक रह गये हैं या जिन्हें केवल रामकथाओं में ही सुना सुनाया जाता है।

श्री गडकरी जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे उस समय भी उन्होंने अपनी कार्यशैली से एक अलग पहचान बनायी थी। उनके कार्यकाल में पार्टी को नई ऊर्जा और नवस्फूर्ति मिली थी। उन्हें एक बार पार्टी की ओर से एक महत्वपूर्ण प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने का भी विचार बड़ी गंभीरता से चला था। पर यह अच्छा ही रहा कि उन्हें मोदी ने अपने नवरत्नों में स्थान दिया। अब यह केन्द्र में भूतल परिवहन मंत्री के रूप में जिस प्रकार कार्य कर रहे हैं, उससे उनके भीतर
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
को जीवन्त स्वरूप देने की एक अच्छी योजना के पीछे से झांकते गडकरी के दर्शन हमें होते हैं।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भाजपा अपने चुनावी नारों में सम्मिलित करती रही है। पर यह कभी स्पष्ट नही कर पायी कि
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
से उसका अभिप्राय क्या है? कदाचित पार्टी की इसी शिथिलता को श्री गडकरी अपने मंत्रालय के माध्यम से स्पष्ट कर देना चाहते हैं।

हमारे देश में पर्यटन के विकास की अपार संभावनाएं हैं। ऐसे अनेकों गौरव स्थल हैं, जिन्हें यदि सही स्वरूप दिया जाए तो देश में पर्यटन उद्योग से अच्छी विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है। इसके लिए श्री गडकरी को महाभारत से जुड़े स्थलों की ओर भी देखना होगा। यदि उन स्थलों की खोज की जाए जिनसे पाण्डवों के संस्मरण जुड़े हैं और उनको भी एक मार्ग से जोड़ दिया जाए तो लोगों को महाभारत कालीन अपने इतिहास को समझने में भी सहायता मिलेगी।

विदेशों से बहुत से पर्यटक भारत केवल इसलिए आते हैं कि वे इस सनातन देश को प्रभु राम का देश मानते हैं, इसे वह गौतम, कणाद, कपिल, महात्मा बुद्घ, महावीर स्वामी, भीष्म पितामह, युधिष्ठिर, महाराणा प्रताप, शिवाजी, ऋषि दयानंद और स्वामी विवेकानंद का देश मानते हैं। बहुत से लोग हैं जो महाराणा की मेवाड़ की मिट्टी को ही माथे से लगाने के लिए इस देश में आते हैं तो कई ऐसे भी हैं जो इसे शिवाजी का देश मानकर या सुभाष अथवा दयानंद का देश मानकर इसकी ओर खिंचे चले आते हैं। अब से पूर्व हमारी सरकारों ने भारत में
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
को बढ़ावा देने की किसी योजना पर ठोस पहल नही की। पर अब श्री गडकरी इस दिशा में सक्रिय हैं, तो उनके इस कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए।
इस देश को महाराणा प्रताप के उन सभी स्थलों को एक पर्यटक स्थल से भी आगे बढक़र एक
तीर्थ स्थल’ के रूप में विकसित होते देखने की दशकों से प्रतीक्षा है, जहां रहकर ‘मां भारती’ के  के उस लाल ने अपना स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा था, और जो कांग्रेसी शासनकाल में नेहरू, मौलाना आजाद के ‘अकबर प्रेम’ के कारण सर्वथा उपेक्षित कर दिये गये। वह दिन सचमुच इस देश के लिए सौभाग्य का प्रतीक होगा जिस दिन गडकरी अरावली पर्वत पर पहुंचकर ‘
महाराणा’ के उस ‘आनंद भवन’ को राष्ट्र को समर्पित करेंगे, जो कभी इस देश के राष्ट्रीय आंदोलन की आशा का एक मात्र केन्द्र बन गया था पर आज सर्वथा उपेक्षित पड़ा है।

श्री गडकरी जी से निवेदन है कि वह इस बात की गंभीरता से पड़ताल करायें कि प्रभु राम के वंशज के रूप में महाराणा प्रताप या शिवाजी आज तक भी अज्ञातवास में क्यों पड़े हैं? राम को वन से लौटाकर श्री गडकरी को चाहिए कि वह महाराणा प्रताप और शिवाजी का ‘अज्ञातवास’ भी समाप्त करायें। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उनकी मुहिम तब तक पूर्ण नही होगी जब तक मां भारती के ये तप:पूत अज्ञातवास की कारागार में बंदी रहेंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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