राजभवन चुप हुआ बिकने लगी जमीर

  • 2016-05-22 12:30:04.0
  • देवेंद्र सिंह आर्य

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उत्तर प्रदेश के विभाजन (नवंबर 2000) से पूर्व उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश के कुल विधायकों की संख्या 425 थी, परंतु उत्तराखण्ड के अलग हो जाने पर इस नये प्रांत के 22 विधायकों को हटाकर उत्तर प्रदेश विधानसभा सदस्यों की संख्या 403 रह गयी, जबकि नये राज्य उत्तराखण्ड की नई विधानसभा में सदस्यों की संख्या 23 की तीन गुणी अर्थात 70 कर दी गयी।

इस प्रकार जनता के लिए 47 नये राजा (विधायक) और तैयार किये गये। स्वतंत्रता से पूर्व देश की 563 रियासतों के कुल 563 राजा थे, पर आजकल लगभग 3000 विधायक और लगभग 800 सांसदों को मिलाकर यह आंकड़ा 3800 हो जाता है जबकि कई राज्यों की विधानपरिषदों के सदस्यों की संख्या इन से अलग है। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि नये राज्य बनते ही इन राजाओं की संख्या और बढ़ जाती है, और यही वह राजनीतिक कारण या उद्देश्य है जो हमारे राजनीतिज्ञों को प्रदेशों के विभाजन करा कराकर नये राज्य गठित करने के लिए प्रेरित करता है। उत्तराखण्ड में 47 नये ‘राजा’ बने और इसलिए बनाये गये कि प्रदेश का संतुलित विकास होगा। पर जिन्हें हमने ‘राजा’ बनाया वे वहां जाकर गधे-घोड़े बनकर बिकने के लिए खड़े हो गये। हमने यह भी नही सोचा कि राज्य तो एक बना जबकि ‘राजा’ 70 बन गये। अब ये ‘राजा’ लोकतंत्र को ही नीलाम करने लगे हैं और कहने लगे हैं कि कोई हमारा ‘इतना मूल्य’ हमें दे दो और हमसे जो चाहे सो करा लो। अपनी बेहयाई और निर्लज्जता की वीडियो बनवाने लगे। मानो जनता को बताने लगे कि तुम चाहे हमें जो कुछ मानो पर हमारी वास्तविकता यही है-जिसे हम दिखाने लगे हैं। पिछले दो माह से पूरा प्रदेश रूका पडा है और सारा देश नीलाम हुए ‘राजाओं’ की नीलामी का खेल देख रहा है। लोकतंत्र अपने आप ही ‘शोकतंत्र’ बनकर रह गया है। प्रदेश रामभरोसे पर है और राजनीति अपने निकृष्टतम बिंदु पर आकर अपना नाच दिखा रही है। जो कुछ भी हुआ है उसमें कौन जीता, कौन हारा-का प्रश्न नही है। प्रश्न है कि-लोकतंत्र का ‘चीरहरण’ किसने किया? क्यों किया? कैसे किया? और क्यों होने दिया गया? क्या किसी भी ‘भीष्म’ ने या ‘द्रोणाचार्य’ ने यह दृश्य नही देखा था? निश्चित रूप से हरीश रावत भी कही दोषी रहे हैं और वे हाथ भी ‘दुशासन’ के ही हाथ रहे हैं जो दूर से इस ‘चीरहरण’ के खेल को खिलवाने में सहायता कर रहे थे।

राजनीति के खेल में हो गये सारे मौन,
नीची गर्दन कर गये ‘भीष्म’ और ‘द्रोण’।।
राजभवन चुप हुआ बिकने लगी जमीर,

प्रदूषित सब हो गया पर्वत, नीर, समीर।।

हमें तो नही लगता कि प्रदेश की जनता ने अपने बलिदान लोकतंत्र के इस ‘चीरहरण’ के लिए दिये थे। विकास के स्थान पर विनाश के इस खेल को देखकर तो यही सिद्घ होता है कि प्रदेश की नई राजधानी बनाने में प्रदेश सरकार के सारे विभागों के नये भवन और कार्यालय बनाने में नये ‘राजाओं’ के राजभवन बनाने में उनके वेतन-भत्ते देने में तथा एक नई सरकार को चलाने के लिए प्रदेश की जनता का अब तक का अरबों-खरबों रूपया सब व्यर्थ ही तो गया। ‘जयचंद’ जमीर बेच रहा है लोकतंत्र का सौदा कर रहा है, और फिर भी लोकतंत्र की जयकार कर रही है। केवल इसलिए कि लोग इस लोकतंत्र के सच को समझकर ‘जयचंदों’ की फांसी की मांग ना करने लग जाएं। उन्हें यह पता ना चल जाए कि जिसे तुम लोकतंत्र मान रहे हो और अपने विकास का प्रमाण मान रहे हो-वास्तव में वही तो तुम्हारे खून चूसने का तंत्र है। क्या आवश्यकता है ऐसे तंत्र की? आज यह प्रश्न हमारी लेखनी नही कर रही है-अपितु पूरी व्यवस्था से लोकतंत्र की आत्मा कर रही है, और यह उसका प्रश्न भी नही है-अपितु यह उसकी चीख है। जिसे लोकतंत्र के रक्षकों को सुनना ही चाहिए। उत्तराखण्ड की परिस्थितियां बता रही हैं कि छोटे राज्य भी जनता का रक्त चूसने के तंत्र को ही विकसित करते हैं। अब आइए देश की राजधानी दिल्ली की ओर चलें। यह वही इंद्रप्रस्थ है-जहां कभी राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया था। उस धर्मराज का ‘पुराना किला’ आज भी उस कहानी को दोहराता है जिसमें दुर्योधन को मतिभ्रम होकर सूखे के स्थान पर गीला और गीले के स्थान पर सूखा दिखायी देता था। इस इंद्रप्रस्थ में आज भी ऐसे कई ‘दुर्योधन’ हैं जो सूखे को गीला और गीले को सूखा बताते हैं। चीखते हैं-चिल्लाते हैं कि मैं फिसल गया, मैं मर गया, मुझे बचाओ। ‘राजा’ होकर धरने पर बैठ जाते हैं, कहते हैं कि धरने से तब उठूंगा जब दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दोगे। हमारा प्रश्न है कि दिल्ली में सरकार की आवश्यकता क्या है? किसने चाही दिल्ली में सरकार और क्यों चाही? यह प्रश्न भी बड़ा मार्मिक है।

दिल्ली के कुल 70 विधायक हैं। ये सत्तर के सत्तर दिल्ली की जनता के लिए सफेद हाथी हैं। इनका कोई प्रयोग नही, कोई औचित्य नही। जहां पहले से ही महानगरपालिका का पूरा तंत्र कार्य कर रहा हो और लोग अपने कार्य उनसे करा पाने में सक्षम हों वहां विधायकों की एक नई फौज खड़ी कर देना कहां की समझदारी है? अभी पिछले दिनों हम दिल्ली के अलीगंज, पेलंजी, खैरपुर आदि की विधानसभा क्षेत्र में अपने एक संबंधी के यहां विवाह समारोह में सम्मिलित हुए तो लोग अपने स्थानीय विधायक के विषय में चर्चा कर रहे थे कि वे अत्यंत भ्रष्ट हैं। कोई भी व्यक्ति अपने घर में भी यदि कोई निर्माण कार्य करता है तो उसे विधायक जी का ‘चढ़ावा’ अवश्य निकालना पड़ता है। लोग आक्रोषित थे कि विधायक जी के रहते अपने घर में भी निर्माण कार्य कराना उनके लिए कठिन हो गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और अब दिल्ली को भ्रष्टाचार की बाढ़ में ही डुबाकर मार रहे हैं। वह जनलोकपाल चाहते थे। हमने तब भी लिखा था कि ‘जनलोकपाल’ के रूप में ही हमारे जनप्रतिनिधियों को संविधान ने नियुक्त किया था। केजरीवाल एक जनलोकपाल चाहते हैं जबकि हमारे संविधान ने तो हजारों जनलोकपाल सरकारी तंत्र की गुण्डागर्दी को रोकने के लिए जनप्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार जनता को व्यस्क मताधिकार के रूप में दिया। इसीलिए किसी भी जनप्रतिनिधि की शैक्षणिक योग्यता भी निर्धारित नही की गयी। बस यह अपेक्षा निश्चित की गयी कि वह जनसेवी हो और जनता का विश्वास उसे प्राप्त हो। पर यह क्या हुआ कि हर एक जनप्रतिनिधि जनलोकपाल न रहकर ‘धन लोकपाल’ हो गया और सरकारी तंत्र की गुण्डागर्दी का स्वयं मुखिया बनकर बैठ गया। अब कहता है कि यदि कोई नया निर्माण करते हो या अपने मकान को पुन: तोड़ फोडक़र बनाते हो तो पहले मेरी भेंट पूजा चढ़ाओ तब काम करो। यह कौन सा लोकतंत्र है और कौन सा न्यायपूर्ण शासन है? दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास इसका कोई उत्तर नही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने चक्रवर्ती सम्राट की सी भूमिका निभाते हुए अपने अधीनस्थ सभी राजाओं का वेतन अप्रत्याशित रूप से बढ़ाकर 50 हजार से दो लाख दस हजार के लगभग कर दिया। इसका अभिप्राय हुआ कि दिल्ली के लोगों का लगभग डेढ़ करोड़ रूपया तो ‘राजाओं’ के वेतन के लिए ही प्रतिमाह चला जाता है। इसके अतिरिक्त ‘राजाओं’ की गाडिय़ों का काफिला, उनका निजी स्टाफ और उनके प्रतिदिन के भोजनादि के खर्चों को इसमें और जोड़ा जाए तो पता चलता है कि जितना विधायक जी का वेतन है उसके दो से चार गुणा अधिक खर्चा उनके इन शाही खर्चों  पर आ जाता है। बात यहीं तक नही रूकती अभी तो दिल्ली सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों का भी पूरा एक काफिला है और फिर जितने ‘राजा’ हैं उनके लिए सुरक्षा तंत्र भी बड़े स्तर पर विकसित किया गया है। केजरीवाल सुरक्षा नही चाहते पर लोगों से जो वायदे किये थे उन्हें पूरा न करने के कारण लोगों ने जब जूते-चप्पल मारने आरंभ किये तो मान्यवर सुरक्षा लेने पर सहमत हो गये। आम आदमी से खास आदमी हो गये हैं केजरीवाल जी। उन्हें इस बात की चिंता है कि देश का प्रधानमंत्री कितना पढ़ा लिखा है-उसकी डिग्री फर्जी है पर उन्हें इस बात की चिंता नही है कि दिल्ली की जनता का करोड़ों-अरबों रूपया दिल्ली के राजाओं के ऊपर व्यर्थ में ही व्यय हो रहा है इसे कैसे रोका जाए? वह अब भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। उन्हें नही पता कि जो दिल्ली ‘अपूर्ण राज्य’ रहकर लोगों के कलेजा में कील ‘ठोक’ तंत्र से चल रही है वह पूर्ण राज्य बनकर क्या करेगी? क्या कोई और भी ऐसे अत्याचार हैं जो दिल्ली के लोगों पर होने शेष रह गये हैं।

पाठकवृन्द! छोटे राज्यों के रक्त चूस यंत्र-ठोकतंत्र से बचकर जनजागरण करो और लोगों को बताओ कि इन नेताओं को इनका राजधर्म स्मरण कराये,अन्यथा हम मिट जाएंगे।

देवेंद्र सिंह आर्य ( 262 )

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