राजस्थान के राज्यपाल माननीय कल्याणसिंह के नाम खुला पत्र

  • 2016-02-11 05:30:07.0
  • राकेश कुमार आर्य

परम आदरणीय राज्यपाल महोदय,

राजस्थान जैसे कर्मठ और देशभक्त लोगों के प्रांत के लिए यह अति उत्तम संयोग है कि उन्हें आप जैसा एक संघर्षशील और जननायक राज्यपाल मिला है। यह आपके जननायक होने का ही प्रमाण है कि आप राज्यपाल जैसे संवैधानिक गौरवपूर्ण पद को केवल राजभवन में रहकर ही सुशोभित नही कर रहे हैं, अपितु आपके भीतर का मानव आज भी आपको ‘मानव-कल्याण’ के लिए प्रेरित करता है  और आप अपना एक काफिला सजाकर लोगों की समस्याओं के निदान हेतु राजस्थान के देहात की ओर निकल पड़ते हैं। सचमुच इस प्रांत के निवासी आज भी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं। जिनके लिए ‘राजा’ का जनकल्याण के लिए समर्पित होना नितांत आवश्यक है। हमारे देश के लिए राजनीति के मनीषियों ने युगों पूर्व ‘राजा’ के लिए यह आदर्श स्थापित किया था कि-‘राजा दार्शनिक और दार्शनिक राजा होना चाहिए।’ राजस्थानवासियों का यह सौभाग्य है कि उन्हें आपके रूप में एक संवेदनशील राज्यपाल मिला है।

पिछले दिनों 7 फरवरी से 10 फरवरी तक राजस्थान के बारां जिले के पाटड़ी, भटगांव, देवरीमुंड, कुंभाखेड़ी, सहजनपुर, मानपुरा, बामणखोह, भीलपुरा, बरूबेह, कचनारियां कलां, उमरिया, बोरखेड़ी, बजरंगपुरा, कोहड़ा कागला, रतनपुरिया, हरनावदा, शाहजी जैसे गौभक्त गांवों के सहयोग से ‘उगता भारत ट्रस्ट’ की ओर से गौकथा का आयोजन कराया गया। जिसमें गौरक्षा के माध्यम से गौ को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनाने के लिए ग्रामीण बहन भाईयों को विशेष जानकारियां दी गयीं। इस अवसर पर हमें इस आंचल के लोगों के साथ रहने और उनकी समस्याएं जानने-समझने का
kalyan singh
अवसर मिला। हमारे ट्रस्ट की ओर से गौकथा का आयोजन ग्राम पाटड़ी में स्थित बाबा रामदेव मंदिर पर किया गया। 8 फरवरी की प्रात: ऊपर पहाड़ी पर स्थित एक बणजारा बस्ती के लोगों के विशेष आग्रह पर उनके यहां जाने का सौभाग्य मिला। जहां जाकर उनकी दयनीय स्थिति को देखकर हमारी पूरी टीम ही दुख से कराह उठी। इन लोगों को जिस दयनीय दशा में छोड़ दिया गया है उसके लिए प्रशासनिक तंत्र कम उत्तरदायी नही है। राजस्थान में ऐसी दयनीय दशा में जीवन यापन करने वाले लोगों की कमी नही है सर्वत्र और हर आंचल में ऐसे लोगों की भरमार है। परंतु इस बस्ती के लोगों की दशा को देखकर शेष प्रदेश के गरीबों की स्थिति की और हमारी प्रशासनिक लापरवाही की बानगी तो मिल ही जाती है।

इस बस्ती के लिए आज तक पीने के पानी की व्यवस्था नही की गयी है। जो सरकारी नल का लगाया गया है वह मात्र 300 फु ट पाइप उतारकर लगाया गया है। जबकि यहां पानी 500-600 फीट नीचे मिलता है। स्पष्टï है कि पानी का नलका सरकारी फाईलों की औपचारिकता पूरी करने के लिए लगाया गया है। ऐसी स्थिति हर गांव की मिलेगी। जिससे पता चल जाता है कि अधिकारियों ने पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर भी कितना बड़ा घोटाला कर दिया है। इन लोगों के घर आज भी घासफूस के बने हैं। जिनमें न तो अधिक बारिश झेलने की क्षमता है और ना ही किसी प्रकार के तूफान को झेलने की ही सामथ्र्य है। जब इस बस्ती के मुखिया से हमारा वार्तालाप चला तो उसने कहा कि ‘श्रीमान जी! आप गाय को तो बाद में बचा लेना पहले हमें ही बचा लो।’ इन शब्दों की पीड़ा को समझा जा सकता था।

जहां तक शिक्षा और स्वास्थ्य की बात है तो शिक्षा में चाहे सरकारी आंकड़े कुछ भी कहें पर सच यही है कि राजस्थान का ग्रामीण आंचल शिक्षा से अभी बहुत दूर है। यहां के प्राथमिक विद्यालयों में आज भी बहुत कम बच्चों की उपस्थिति है। बारूबेह में स्थित प्राथमिक पाठशाला में कार्यरत अध्यापक श्री परमानंद और उनके साथी राकेश रेंगर ने हमें बताया कि यहां के लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता के न होने का कारण उनकी अपनी परिस्थितियां हैं। उनका कहना है कि लोग कई-कई माह के लिए रोजगार की खोज में दूर चले जाते हैं, तब वह अपने बच्चों को भी अपने साथ ही ले जाते हैं इसलिए गांव में बच्चों का नाम चाहे विद्यालयों में चलता रहे, पर पढऩे के लिए बच्चे नही आते। वह कहते हैं कि 3-4 माह के प्रवास के पश्चात यहां के लोग सामान्यत: अपने घरों को लौटते हैं, तो बच्चों को स्कूल भेजते हैं, पर 10-5 दिन पश्चात ही फिर ये लोग रोजगार के लिए किसी अन्य दिशा में चल देते हैं। जिससे इनके बच्चों की शिक्षा हो ही नही पाती। इन लोगों में मानसिक रूप में एक भावना बैठी है कि पढ़-लिखकर ही क्या करना है? नौकरी तो मिलनी नही। श्री परमानंद एक समाजसेवी अध्यापक हैं इसलिए वह बच्चों को स्वयं पकडक़र घर से लाते हैं और पढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। पर फिर भी वह कहते हैं कि ये लोग अपने बच्चों को अपनी आर्थिक स्थिति और पिछड़ेपन के चलते शीघ्र ही विद्यालयों से निकाल लेते हैं और उन्हें अपने परंपरागत कार्यों में लगा देते हैं।

आप जैसे जननायक राज्यपाल से विनम्र अनुरोध है कि इस क्षेत्र के संबंधित अधिकारियों को अपनी सरकार की ओर से यह विशेष निर्देश दिलायें कि इन लोगों के लिए जल की तुरंत व्यवस्था की जाए। इन लोगों को अपने पशुओं के उचित रखरखाव और उनके चारे के लिए विशेष प्रशिक्षण दिलाया जाए। ‘उगता भारत ट्रस्ट’ अपने सीमित साधनों के माध्यम से यह कार्य कर रहा है। परंतु इसमें प्रशासनिक अधिकारियों का सहयोग अपेक्षित है। इन लोगों को चारा काटने की मशीनें दुधारू पशुओं का तथा दूध बढ़ाने के गुर सिखाने की आवश्यकता है। छोटे-छोटे बच्चे दो-दो किलोमीटर से पानी सिर पर रखकर लाते हैं-एक ओर हम बस्ते के बोझ को भी घटाना चाहते हैं और दूसरी ओर हम बचपन पर पंद्रह किलो मटके का बोझ डाल रहे हैं।

हमारे पूरे तंत्र के लिए यह स्थिति अत्यंत शर्मनाक है कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी जंगली पशुओं की भांति कन्दराओं में रहने के लिए अभिशप्त हो। हर व्यक्ति को भोजन-वस्त्र और आवास की सुविधा प्रदान करना यदि लोकतंत्र का पवित्र उद्देश्य है तो उस पर इन लोगों का प्रथम अधिकार है। यह अच्छी बात है कि आज देश में उस पार्टी की सरकार है जो देश के आर्थिक संसाधनों पर देश के इन दबे कुचले देशभक्त लोगों का प्रथम अधिकार मानती है। इसलिए इन लोगों को अपने मौलिक अधिकार मिलने चाहिए। एक जैसी शिक्षा नीति पूरे देश में लागू की जानी अपेक्षित है। इन जैसे लोगों के लिए एक जैसी शिक्षा नीति बनाकर यह सुनिश्चित किया जाए कि ये लोग रोजगार की तलाश में चाहे जहां जायें पर इनके बच्चों को शिक्षा से वंचित न किया जाए। जब एक बैंक की शाखा में आज लोग कहीं भी पैसे डालें, वह उसके खाता में चला जाता है, कहीं से एटीएम से पैसे निकाले-यह भी सुविधा उपलब्ध है, तो कोई बच्चा चाहे जहां शिक्षा ले रहा है, पर किसी कारण से उसे अपना स्थान परिवर्तित करना पड़ जाए तो उसका विद्यालय स्वयं ही परिवर्तित हो जाए। अगला विद्यालय उसे उसी स्तर की शिक्षा वही से देना आरंभ कर दे जहां वह पहले से ले रहा था।

इन लोगों के आवास की समस्या पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। सस्ते आवास उपलब्ध कराने के लिए सीमेंट की चादरों का प्रयोग किया जा सकता है। देश के दानशील लोगों, संस्थाओं और संगठनों की इसमें सहायता ली जा सकती है। अच्छा हो कि प्रशासनिक लापरवाही कर रहे अधिकारियों के विरूद्घ कार्यवाही हो और ऐसे जनसेवी अधिकारी नियुक्त किये जाऐं तो जनसेवा को अपने जीवन का व्रत मानते हों, जनप्रतिनिधियों को भी अपनी सरकार के माध्यम से इस बात के लिए प्रेरित करायें कि वह जनसमस्याओं से स्वयं रूबरू हों और उन्हें सुनकर उनके समाधान के लिए जुट जाएं। हमें आपसे विशेष अपेक्षा है कि आप इस आंचल के निवासियों के कल्याण हेतु सरकार और अधिकारियों को विशेष निर्देश देंगे और लोगों की समस्याओं का समाधान देकर उन पर अपना उपकार करेंगे।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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