राहुल! मित्र क्षणम् श्रूयताम्

  • 2016-02-24 03:30:03.0
  • राकेश कुमार आर्य

इसे आज की राजनीति की विडंबना कहें या राहुल का सौभाग्य कहें कि कांग्रेस के सामने आज नेतृत्व का संकट है। जिस कारण कांग्रेस की स्थिति शायर के अनुसार ऐसी हो गयी है :-

‘‘आंधियों से कुछ ऐसे बदहवास हुए लोग
जो दरखत खोखले थे उन्ही से लिपट गये।’’

सचमुच राहुल गांधी के पास राष्ट्र चिंतन नही है। उन्हें स्वयं को ही पता नही है कि वह किधर जा रहे हैं और उनके मार्ग से भटकने का कांग्रेस पर क्या प्रभाव पड़ेगा? वैसे राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि उनके आसपास रहने वाले ऐसे बहुत से कांग्रेसी हैं, जिनके भीतर पार्टी को वर्तमान निराशाजनक काल से बाहर निकालने और देश को सही चिंतन देने के लिए नेतृत्व के गुण हैं। पर वह बोल नही रहे हैं इसका कारण है कि कांग्रेस में बोलने का अर्थ माना जाता है-विद्रोह और एक परिवार की सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस। ये कांग्रेसी भली भांति जानते हैं कि कांग्रेस में सोनिया काल में बोलने का साहस करने वाले नरसिंहाराव, जितेन्द्र प्रसाद, राजेश पायलट, माधवराव सिंधिया और सीताराम केसरी का क्या हाल हुआ है? इसलिए आज के कांग्रेसियों ने मन बना लिया है कि ‘देखो और प्रतीक्षा करो।’ राहुल जानते हैं कि लोग उन्हें ‘पप्पू’ कहते हैं और ये कांग्रेसी इस ‘पप्पू’ को अपनी गलतियों के बोझ तले ही मारने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसलिए राहुल के वाहियात भाषण तैयार किये जा रहे हैं और उनमें सुधार की भी कोई संभावना दिखाई नही दे रही है। कहा जाता है कि कांग्रेस के भीतर की समस्याओं को लेकर तथा अपने सुपुत्र राहुल गांधी के व्यवहार और आचरण को देखकर स्वयं सोनिया गांधी भी प्रसन्न नही हैं। वह भीतर ही भीतर कुंठित हैं कि कैसे उनका साम्राज्य उन्हीं के सुपुत्र के द्वारा विनष्ट किया जा  रहा है। कांग्रेस की वर्तमान स्थिति यदि ऐसी ही बनी रही और मोदी का जादू इसी प्रकार लोगों के सिर चढक़र बोलता रहा तो वह दिन दूर नही कि जब कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रप भी अपने नेतृत्व के विरूद्घ बागी हो उठेंगे।
राहुल


कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या है कि उसने अपनी धर्मनिरपेक्षता को समाज में ‘हिंदू विरोध’ के रूप में स्थापित कर दिया है। 1947 के पश्चात कांग्रेस के नेता नेहरू को जब देश का पहला प्रधानमंत्री बनाया गया था तो उस समय नेहरू की धर्मनिरपेक्षता को संतुलित बनाये रखने के लिए मजबूत विपक्ष था। नेहरू की विशेषता थी कि वह अपने विपक्ष का सम्मान करते थे और उसकी भावनाओं का सम्मान करते थे। इसलिए वह हठीले होकर भी जानते थे कि यदि तेरी ओर से कोई गलती होती है तो सावरकर जैसे लोग और हिन्दू महासभा जैसी पार्टियां उनका किस प्रकार विरोध करेंगी। इसलिए नेहरू संतुलित होकर बोलते थे। उन्होंने 1954 में एक बार कहा था-‘‘जहां तक मेरी बात है, मैं हिन्दुस्तान में हरेक चुनाव हारने के लिए तैयार हूं, परंतु साम्प्रदायिकता अथवा जातिवाद को कोई छूट देने के लिए तैयार नही है।’’ नेहरू के इस वक्तव्य के दो अर्थ हैं एक तो यह कि वह वास्तव में देश में पंथनिरपेक्ष शासन की स्थापना करने के पक्षधर थे और एक यह कि वह ऐसा हिंदूवादी दलों के लिए कह रहे थे। कुछ भी हो इतना तो अवश्य था कि वह बड़ी सावधानी से कुछ बोल रहे थे।

इंदिरा गांधी ने भी न्यूनाधिक नेहरू की नीतियों का ही पालन किया। पर सोनिया गांधी को तो लोगों ने भली प्रकार समझ लिया कि उनकी धर्मनिरपेक्षता के अर्थ क्या हैं? उन्हीं के रहते पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार कहा था कि इस देश के आर्थिक संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है। इससे देश की जनता को स्पष्ट हुआ कि नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ क्या था? आज के राहुल गांधी साम्प्रदायिकता को ही धर्मनिरपेक्षता मानने की विकृत मानसिकता की उपज है। इसलिए उनसे किसी भी स्थिति या परिस्थिति में वास्तविक अर्थों में पंथनिरपेक्ष होने की आशा नही की जा सकती। जबकि इस देश का बहुसंख्यक समाज स्वाभाविक रूप से ही पंथनिरपेक्ष है। उसे राहुल गांधी अपना समर्थन दे दें और देश में किसी भी वर्ग या संप्रदाय पर किसी व्यक्ति वर्ग या संप्रदाय का अत्याचारी शासन पुन: स्थापित ना हो, इसके लिए देश में समान नागरिक संहिता को लागू कराने के लिए राहुल गांधी सामने आयें तो कोई बात बने।

इतिहासकार विपन चंद्र ने लिखा है कि सांप्रदायिकता विशेष सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थिति का एक विकृत उत्पाद है। यह परिस्थिति उसे फलने फूलने में मदद करती है। यह स्वत: सिद्घ है कि उस परिस्थिति विशेष को सुधारा जाना चाहिए। साम्प्रदायिकता उस परिस्थिति विशेष का वास्तविक समाधान नही है और यदि उन समाधानों को मान भी लिया जाए, जिन्हें साम्प्रदायिक शक्तियां सुझाती हैं, तो भी उनसे वे सामाजिक समस्याएं हल नही होंगी, जो असंतोष एवं साम्प्रदायिकता को पैदा करती है।

भारत को समझने के लिए राहुल गांधी को अभी समय लगेगा पर वह ऐसा कोई संकेत भी नही देना चाहते हैं कि उन्हें कुछ सीखने की आवश्यकता है। वह ऐसा दिखा रहे हैं कि वे कुशल ड्राइवर हैं और गाड़ी को सही दिशा में ले चलने के लिए सारे रास्ते से भी परिचित हैं, पर वह हर मोड़ पर दुर्घटना कर डालते हैं। जेएनयू प्रकरण में जिस मोड़ पर उन्होंने ‘दुर्घटना’ को अंजाम दिया है उससे उनके समर्थक भी आहत हुए हैं। उनके पिता के नाना पंडित नेहरू का समकालीन विपक्ष उनकी गलती पर जैसे ही उन्हें टोकता था वह उसका सम्मान करते थे और हम देखते थे कि राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार और विपक्ष एक साथ होते थे। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक और अपेक्षित भी है पर आज राहुल की कांग्रेस राष्ट्रीय मुद्दों पर राष्ट्रद्रोही लोगों के साथ खड़ी है। हम मानते हैं कि राहुल जी! आपकी कांग्रेस राष्ट्रद्रोही नही है उसकी एक शानदार विरासत है, पर उसकी शानदार विरासत के आप शानदार वारिस नही हैं। इस पर देश का हर बुद्घिजीवी आहत है।

यह संभव नही है कि मोदी कांग्रेस विहीन भारत बनाने में सफल हो जाएं, पर राहुल गांधी यदि अपनी नीतियों पर चलते रहे तो भारत कांग्रेस विहीन हो सकता है। यह स्थिति किसी एक शासक दल को तानाशाह बना सकती है। इसलिए कांग्रेस जैसी  पाार्टी का बने रहना आवश्यक है। अत: कांग्रेसियों को चाहिए कि वह देशहित में राहुल गांधी को सही भूमिका के लिए तैयार करे। वैसे हमें लगता है कि राहुल गांधी की भूमिका के लिए समय उनकी देहली पर दस्तक देकर (जिस समय मनमोहनसिंह ने उनके लिए पीएम पद छोडऩे की इच्छा व्यक्त की थी) आगे चला गया है। पर यदि फिर भी कांग्रेसी उनमें अपना नेता खोज रहे हैं तो वे उन्हें समझायें कि मित्र! क्षणम् श्रूयताम्=मित्र थोड़ा एक पल के लिए हमारी बात भी सुनो-
‘‘कोई सूरज के साथ रहकर भी भूला नही अदब।
लोग जुगनू का साथ पाकर मगरूर हो गये।’’

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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