राहुल अपयश रूपी मृत्यु से उबारें कांग्रेस को

  • 2016-04-20 03:30:03.0
  • राकेश कुमार आर्य

अपयश रूपी मृत्यु

निस्संदेह कांग्रेस का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। चाहे जो परिस्थितियां रहीं पर यह भी सत्य है कि कांग्रेस ने इस देश पर स्वतंत्रता के पश्चात बीते पिछले लगभग 7 दशकों में सबसे अधिक शासन किया है। बहुत सी कमियों के उपरांत भी यह संगठन अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन है। भाजपा के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछला चुनाव ‘कांग्रेस विहीन भारत’ के नारे के आधार पर जीता और कभी लोकसभा में लगभग सवा चार सौ सीटों को जीतने वाली कांग्रेस अप्रत्याशित रूप से 44 सीटों पर सिमट गयी।

लोगों को अपेक्षा थी कि कांग्रेस अपनी अप्रत्याशित पराजय से कुछ सीख लेगी और भविष्य के लिए पुनरूत्थानवादी दृष्टिकोण अपनाते हुए कार्य करेगी। वैसे भी लोकतंत्र में किसी भी पार्टी का सदा शासन नही रह सकता, जब कांग्रेस को ही सत्ता से हटना पड़ गया तो भाजपा को भी सत्ता से हटना पड़ेगा। पर देश के लोगों की चिंता यही है कि जिस समय भाजपा को जनता सत्ता से हटाये तो उस समय के लिए कांग्रेस के पास वास्तव में उसका विकल्प हो। लोगों की लोकतंत्र के संदर्भ में यह विशेषता होती है कि वे सदा ही वर्तमान शासक का विकल्प ढूंढ़ते रहते हैं। वर्तमान शासक वर्ग या दल जितनी गलतियां या जनापेक्षाओं के विरूद्घ कार्य करता है उतने ही लोग उस शासक दल से हटकर विपक्षी दल की ओर आकर्षित होते जाते हैं। जनमत को अपनी ओर खींचने के लिए विपक्ष भी हर क्षण घात लगाये प्रतीक्षा करता रहता है। जैसे ही ‘उचित समय’ आता है विपक्षी दल सत्ता पक्ष को चित्त कर सत्ता पर अपना अधिकार करने से नही चूकता। यही कारण है कि लोकतंत्र में शासक दल की आलोचना करना विपक्ष का विशेषाधिकार है और एक ऐसा हथियार भी है, जिसके प्रयोग से वह देश में ‘रक्तविहीन क्रांति’ कर डालता है। भारत में ऐसी रक्तविहीन क्रांति कई बार हो चुकी हैं। 1977 में जेपी आंदोलन ने ऐसी पहली क्रांति का सूत्रपात किया था। उसी क्रांति ने आगे चलकर वीपीसिंह, चंद्रशेखर, गुजराल, एचडी देवगौड़ा, अटलजी जैसे प्रधानमंत्रियों के लिए भी परिस्थितियों का निर्माण किया, पर इन सबसे हटकर ‘संपूर्ण क्रांति’ की घोषणा कर सत्ता पर अधिकार करने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही सफल रहे। ‘संपूर्ण क्रांति’ से हमारा अभिप्राय कांग्रेस विहीन भारत के प्रधानमंत्री मोदी के नारे से है।

अब यह कांग्रेस पर निर्भर है कि उसे भारत को ‘कांग्रेस विहीन’ बनाना है या कांग्रेस को देश की एक वास्तविक आवश्यकता के रूप में स्थापित करना है। अभी तक कांग्रेस के नेतृत्व ने जो संकेत पिछले दो वर्ष में दिये हैं उनसे तो यही लगता है कि कांग्रेस आत्मघाती राजनीति से ग्रस्त है। उसका नेतृत्व असमंजस और ‘किंकत्र्तव्यविमूढ़’ की स्थिति में फंसा धंसा पड़ा है। जिसे किसी भी स्थिति में उचित नही कहा जा सकता। ऐसी स्थिति भाजपा के लिए अनुकूल हो सकती है। निस्संदेह भाजपा ऐसी ही परिस्थितियों को कांग्रेस में बने रहने देना चाहेगी भी जिससे देश का यह सबसे पुराना राजनीतिक दल उपहास और बचकानेपन का शिकार बना रहे। लोकतंत्र में जहां विपक्ष सत्तापक्ष की गलतियों का लाभ उठाने के लिए प्रयासरत रहता है वहीं सत्तापक्ष भी विपक्ष की भूलों और नेतृत्व की दुर्बलताओं का लाभ उठाने के लिए सदा तत्पर रहता है। श्रीमती इंदिरा गांधी तो विपक्ष में फूट डाले रखकर ही सत्ता पर अधिकार किये रही थीं, ऐसे आरोप उन पर उन दिनों अक्सर लगा करते थे।

ऐसी परिस्थितियों में यह कांग्रेस पर निर्भर है कि वह अपने आपको देश की एक आवश्यकता के रूप में स्थापित करे। बिहार में सत्ता मिली नीतीश और लालू को, और उस समय उत्सव मना रही थी कांग्रेस। इसी प्रकार दिल्ली पर जब केजरीवाल ने सफलता का परचम लहराया तो कांग्रेस ने उस समय भी इस प्रकार का आचरण करने से परहेज नही किया था कि उसे अपनी सत्ता छिन जाने का इतना दु:ख नही है, जितनी भाजपा का सत्ता से दूर रहने की प्रसन्नता है। हमारा मानना है कि कांग्रेसी नेतृत्व की दुर्बलता का वह बिंदु है जिससे उस पर बचकानेपन के आरोप लगते हैं। निश्चय ही राजनीति मसखरेपन के प्रदर्शन का मंच न होकर राजनीतिक गंभीरता के प्रदर्शन और राष्ट्र निर्माण की साधना स्थली है। इस साधना स्थली पर जो लोग अपना-अपना अभिनय करते हैं उनकी परीक्षा देश के 125 करोड़ लोग लेते हैं। मंच पर कौन ठुमके लगा रहा है और कौन ‘इदम् राष्ट्राय इदन्नमम्’ कह-कहकर बार-बार आहुति लगा रहा है-सब पर जनता बड़ी गंभीरता से दृृष्टि लगाये बैठी रहती है। यह ठीक है कि हल्की भूमिका में रहने वाले लोग अपने मसखरेपन से जनता का समय-समय पर मनोरंजन करते रहते हैं और वे कई बार सफल भी होते दिखायी देते हैं। परंतु वे जनता जनार्दन पर कोई स्थायी प्रभाव नही डाल पाते हैं। राजनारायण से लेकर दिग्विजयसिंह तक लोगों ने ऐसे कई लोगों को राजनीतिक मंच पर देखा है जिनकी बातों को कभी गंभीरता से नही लिया गया। यह अलग बात है कि ये राजनीति में अपना उल्लू सीधा करने में सफल होते रहे, पर यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि इन्होंने उल्लू ही सीधे किये हैं-शेरों को सीधे नही कर पाये और यही इनकी राजनीति की असफलता है। देश की जनता उल्लू सीधे कराने वाले शिकारियों को नही चाहती, वह शेरों को सीधा करने वाला शिकारी चाहती है। अत: राहुल गांधी को ‘शेरों को सीधा’ करने की राजनीति करनी पड़ेगी, ‘मेक इन इण्डिया’ के बाघ से वह डरें नही अपितु देश की जनता को बताया कि इस बाघ की चाल में या नजरों में ये कमी है और आप हमें समय देंगे तो हम इस बाघ की चाल को या नजरों को इस प्रकार ठीक कर देंगे। बिहार में लालू नीतीश और दिल्ली में केजरीवाल की जीत पर प्रसन्नता व्यक्त तो भाजपा को अपने आप से शक्तिशाली मानना है कि चलो हम नही आये तो आयी भाजपा भी नही है। राहुल की यह सोच तो देश को उस ओर ले जा रही है जिस ओर भाजपा के सत्ताविहीन होने के क्षणों में राहुल की कांग्रेस को सत्ता का भागीदार या मालिक बनने से रोक देगी। क्योंकि तब नीतीश, केजरीवाल, लालू आदि सत्ता के किंगमेकर या मालिक होंगे और कांग्रेस इनके सामने ठुमके लगा रही होगी। उस ठुमके लगाने वाली कांग्रेस को यह देश देखना नही चाहता। अत: समय रहते कांग्रेस को किंकत्र्तव्यविमूढ़, मसखरेपन और असमंजस की वर्तमान परिस्थितियों से निकालने के लिए राहुल गांधी को विशेष परिश्रम करना चाहिए। उनका मंच किसी अन्य राजनीतिक दल का मंच न होकर अपनी पार्टी का मंच होना चाहिए। ना ही उन्हें कन्हैया जैसे देशविरोधी लोगों के मंच पर जाना चाहिए। उन्हें पूर्णत: टूट-फूट गये कांग्रेसी किले और उसके मंच को ही पुन: संवारना चाहिए। जब तक वह ऐसा नही करेंगे तब तक लोग उन पर हंसते रहेंगे और वह कांग्रेसी विरासत को तार-तार कर यूं ही विनष्ट करने के अपराधी और बनते जाएंगे। उन्हें समझना चाहिए कि कांग्रेस उनके पीछे नही है, अपितु वह कांग्रेस के पीछे हैं। कांग्रेस है तो वे हैं अन्यथा कुछ भी नही। कांग्रेस अपयश रूपी मृत्यु का दंश झेल रही है जिससे उबारने के लिए कांग्रेस को यशस्वी नेतृत्व की आवश्यकता है, जिसे राहुल, कन्हैया के मंच पर जाकर और भी अधिक अपयश का भागी बना रहे हैं। यह स्मरणीय है कि अपयश रूपी मृत्यु ‘देहावसान’ से भी अधिक बुरी होती है। अच्छा हो कि राहुल कांग्रेस को अपयश मृत्यु से उबारें।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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