राष्ट्रीयता और ऋषि दयानंद-भाग-2

  • 2015-12-03 01:30:13.0
  • राकेश कुमार आर्य

maharshi dayanandऋषि दयानंद ऐसे भव्य भारत के निर्माण की योजना लेकर चल रहे थे, जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में शेष विश्व का मार्गदर्शन कर सके और विश्व की विकृतावस्था को उन्नतावस्था में परिवत्र्तित करने में समर्थ एवम् सक्षम हो। उनका राष्ट्रवाद ऐसे ही उन्नत भारत का पोषक था। वह भारत को पुन: विश्व गुरू के रूप में प्रतिष्ठित हुआ देखना चाहते थे। उन्होंने अपने एक व्याख्यान में कहा था-‘‘यह आर्यावत्र्त देश ऐसा है जिसके सदृश भूगोल में दूसरा कोई देश नही है, इसलिए इस भूमि का नाम सुवर्ण भूमि है, क्योंकि यही सुवर्णादि रत्नों को उत्पन्न करती है...जितने भूगोल में देश है, वे सब इसी देश की प्रशंसा करते हैं, और इसी से आशा रखते है। पारसमणि पत्थर सुना जाता है वह बात तो झूठी है, विदेशी छूते ही सुवर्ण अर्थात् धनाढय़ हो जाते हैं।’’

अपने इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखकर महर्षि ने आर्य जागरण जनजागरण का कार्यारम्भ किया। हम यहाँ यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि महर्षि दयानन्द की राष्ट्रीयता किसी अन्य राष्ट्रीयता की प्रतिरोधी या प्रतिगामी नही थी। वह सर्वोन्मुखी थी। ‘विश्व-कल्याण’ उसका अन्तिम ध्येय था। वह हर राष्ट्र की निजता राष्ट्रीयता को सम्मानित रखकर भी एक विश्व की कल्पना कर उसे साकार रूप देना चाहते थे। एक विश्व को वह ‘चक्रवर्ती राजा’ के आधीन पूरा होता हुआ देखना चाहते थे।

इसीलिए वह अपने आर्य जागरण के अभियान को आर्यों को पुन: चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित कर विश्व कल्याण के लिए प्रेरित करना कभी नहीं भूलते थे। ‘कृण्वन्तो-विश्वमाय्र्यम्’ की भावना को वह अपने इसी चिन्तन के आधार पर क्रियान्वित होता देखना चाहते थे। महर्षि अपने उद्देश्य को भारत की तेजस्विता से पूर्ण करना चाहते थे। इसलिए वह कल्पना की ऊंची उड़ान न भरके यथार्थ के ठोस धरातल पर कार्य करने में विश्वास करते थे। उनकी कार्यशैली अनोखी थी? उन्होंने विश्व जागरण से पहले आर्य जागरण का कार्य करना चाहा। आर्य जागरण का अभिप्राय था-संसार की सज्जन शक्ति का संगठनीकरण, अर्थात् विश्व की सज्जन शक्ति को वह एक मंच पर लाकर खड़ा करना चाहते थे। इसके लिए वह आर्य जन को जगा रहे थे। एक व्यक्ति से कह रहे थे कि तू खड़ा हो। खड़ा होकर दूसरे को जगा, दीप से दीप जला। दीयों की एक लड़ी बना, और सारे विश्व का एक समाज बना अर्थात् सारे विश्व को अपने प्रकाश से आलोकित कर डाल।

उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज का यही उद्देश्य था। अपनी इस अद्भुत राष्ट्रीयता का मार्ग वह वेदों से निकलता हुआ देख रहे थे। इसलिए उन्होंने कहा था-‘‘वेद नैतिक पुरूषार्थ के प्रतीक हैं तथा उस ज्योति प्रकाश पुंज के प्रतीक हैं, जिनसे समस्त भारत आलोकित हुआ तथा भावी भारत भी इसी मार्ग में चलकर यश अर्जित करेगा।’’

अनेक विद्वानों ने महर्षि के सार्वभौम मानवतावाद ‘कृण्वन्तो-विश्वमाय्र्यम्’ के उच्चादर्श की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। संसार महर्षि के इस सार्वभौम मानवतावाद को अपनाकर उसका समुचित लाभ नही ले पाया तो इसमें महर्षि का कोई दोष नही है। दोष उन लोगों और उन संस्थाओं का है जिन्होंने विश्व राजनीति को कलह, कटुता, कपट और व्यक्ति की अनन्त कामनाओं की पूत्र्ति की क्रीड़ास्थली बना दिया है और जहाँ केवल एक दूसरे को नीचा दिखाने के कपटपूर्ण कृत्यों के अतिरिक्त और कुछ होता ही नही है। एक विद्वान ने कहा है
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‘‘स्वामी दयानन्द सरस्वती यद्यपि हिन्दू पुनरूत्थानवाद के प्रतीक थे किन्तु उनका दृष्टिकोण सार्वभौम मानवतावाद के प्रति अद्भुत लगन थी।’’


महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज के इस चिन्तन का भारतीय संविधान पर स्पष्ट प्रभाव दीखता है। 1947 के आते-आते भारतवर्ष की राजनीति के मर्मज्ञ आर्य समाजी आन्दोलन और विचारों से भली प्रकार परीचित हो चुके थे। लोगों ने यह भली प्रकार समझ लिया था कि हमारी पराधीनता का प्रमुख कारण हमारी राजनीति की अकर्मण्यता थी। शासकों का अपने राजधर्म से च्युत हो जाना था। आलसी, कामी, प्रमादी और अकर्मण्य शासक विलासी और भोगी हो गये थे। पौराणिक पण्डितों ने शासन में अनुचित हस्तक्षेप कर करके राजाओं के निहित स्वार्थ तो साधे परन्तु उन्हें राजनीति का सही पाठ नही पढ़ाया। ये लम्पट और स्वार्थी पंडित वर्ग राजाओं को ज्योतिष की अवैदिक मान्यताओं में फँ साकर रखता था या ज्योतिष के अनिष्टकारी परिणामों से डराकर रखता था किसी युद्घादि के समय किसी देवता या देवी के चमत्कार से ही विदेशी शासक पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रेरित और बाध्य करता था।

इस प्रकार भारत की राजनीति अकर्मण्यता की जंग से ग्रसित थी। स्वतन्त्र भारत के लिए जब संविधान बनाने हेतु 1946 में चुनाव हुए और संविधान निर्मात्री सभा का निर्माण हुआ तो राजाओं की यह अकर्मण्यता उस समय भी परिलक्षित हुई। किसी भी राजा ने इस संविधान सभा में जाकर राष्ट्र के भावी स्वरूप को बनाने के लिए अपने विचार संविधान सभा के सामने रखना और अपनी सहभागिता इस याज्ञिक कार्य में सुनिश्चित करना उचित नहीं समझा। इस प्रकार इनकी अकर्मण्यता ने इन्हें स्वयं ही अतीत का एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष बना दिया और भारत अपने भविष्य के निर्धारण के लिए स्वयं अपनी पगडंडी खोजने लगा। यह बड़े ही महत्वपूर्ण क्षण थे जब अतीत वत्र्तमान और भविष्य का अद्भुत संगम हो रहा था और वतर्मान स्वेच्छा से अतीत बनकर भविष्य को वत्र्तमान की बागडोर सौंप रहा था।

भारत की इस संविधान सभा ने यद्यपि विदेशी संविधानों का तथा अंग्रेजों के द्वारा स्थापित तत्कालीन अधिनियमों से बहुत कुछ उधार रूप में प्राप्त किया, परन्तु इसके उपरान्त भी ऐसा नही कहा जा सकता कि उन्होंने सारा कुछ उधारा ही लिया। उनके पास अपना भी बहुत कुछ था। उस अपने पर महर्षि दयानन्द और आर्य समाज का प्रभाव स्पष्ट दीख रहा था। राष्ट्रीयता के सन्दर्भ में यदि विचार करें तो इस विषय पर भी महर्षि और आर्य समाज का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। संविधान की प्रस्तावना इसके लिए सर्वप्रथम द्रष्टव्य है। जो कि इस प्रकार है :-

‘‘हम भारत के लोग भारत को एक सम्पूर्णप्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी पन्थ निरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें,
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में--संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’

हमारी इस संवैधानिक प्रस्तावना में राष्ट्रीयता पर विशेष बल दिया गया है। ‘हम भारत के लोग’ शब्दों से ही स्पष्ट है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान को किसी वर्ग विशेष या क्षेत्र विशेष के लिए नही बनाया है, अपितु उसे सारे राष्ट्र की आवाज़ माना है और भारत की वास्तविक शक्ति लोक शक्ति है। यह लोकशक्ति राष्ट्रीयता के रूप में तभी प्रतिष्ठित हो सकती है जब इस देश के निवासियों में ऐसी पारस्परिक बन्धुता हो जो कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने वाली हो।

हमारी वर्तमान राजनीति को संविधान की मूलभावना और उसकी आत्मा की आवाज को समझना होगा।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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