राष्ट्रीयता और ऋषि दयानंद-भाग-1

  • 2015-12-02 01:30:44.0
  • राकेश कुमार आर्य

dayanand_400महर्षि दयानन्द जी महाराज के विषय में पं. देवेन्द्रनाथ जी मुखोपाध्याय ने लिखा है :-‘‘इस संन्यासी के हृदय में यह प्रबल इच्छा और उत्साह था कि सारे भारत वर्ष में एक शास्त्र प्रतिष्ठित हो, एक देवता परमेश्वर पूजित हो, एक जाति संगठित हो, और एक भाषा प्रचलित हो। यही नही कि उनमें केवल सदिच्छा और उत्साह ही था, वरन् वह इस इच्छा और उत्साह को किसी अंश तक इस कार्य में परिणत करने में भी कृतकार्य हुए थे। अत: स्वामी दयानन्द केवल संन्यासी ही नहीं थे,
केवल वेद व्याख्याता ही नही थे, केवल शास्त्रों का मर्मोद्घाटन करने में ही निपुण नही थे, केवल तार्किक ही नही थे, केवल दिग्विजयी पण्डित ही नही थे, वरन् वह भारतीय एकता और जातीयता राष्ट्रीयता के सच्चे प्रतिष्ठाता भी थे।’’

महर्षि दयानन्द सरस्वती राष्ट्रवाद के प्रखर प्रस्तोता थे। यह सर्वमान्य सत्य है कि भारत की स्वतन्त्रता की लड़ाई में जितने लोगों ने भाग लिया उनमें से अधिकांश को महर्षि के स्वराज्य चिन्तन या राष्ट्रवाद ने सर्वाधिक प्रभावित किया। यही कारण है कि महर्षि दयानन्द के द्वारा स्थापित आर्य समाज का हर व्यक्ति ईश्वर भक्त के साथ-साथ राष्ट्रभक्त अवश्य मिलता है। महर्षि राष्ट्रीय एकता के लिए सदैव प्रयासरत रहे। राष्ट्रीय एकता किस प्रकार स्थापित हो? इस विषय पर सत्यार्थ प्रकाश में महर्षि दयानन्द ने लिखा है-‘‘जब तक एक मत, एक हानि-लाभ, एक सुख दु:ख परस्पर न मानें तब तक उन्नति होना बहुत कठिन है। परन्तु केवल खाना-पीना एक होने से सुधार नही हो सकता।’’ सत्यार्थ प्रकाश में ही आपने लिखा है :-

‘‘एक व्यक्ति को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार नही देना चाहिए। किन्तु सभापति जो राजा हो उसके अधीन सभा, सभा के अधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के अधीन और प्रजा राजसभा संसद के अधीन रहे।’’

महर्षि दयानन्द सांसद को उत्पीडि़त, शोषित और उपेक्षित जनता के दु:ख दारिद्रय को दूर करके प्रजा में सुख शान्ति, समृद्घि और विकास के समान अवसर उपलब्ध कराने का उचित माध्यम मानते थे। उन्होंने श्याम जी कृष्ण वर्मा के लिए एक बार लिखा था :-

गत्वा पारलिमेन्ट सज्जनसभां व्याख्यानमाख्यावरम।

दत्वा भारतवर्ष पूर्व नियम प्रेक्षावताँस्तान कुरफ ।

पश्येयुर्यत ईदृशं निजदशादु:खं द्रुतं दु:खिनाम,

म्लेच्छा म्लेच्छतया च भारत जनान संयीअयन्तीति तत्।।

अर्थात् आप वहाँ ब्रिटिश पार्लियामेन्ट नामक सज्जनों की सभा में जाकर और वेदादि शास्त्रानुकूल व्याख्यान देकर उन संसद सदस्यों को प्राचीन भारतीयों के सौजन्यादि गुणों के नियम से परिचित करायें, जिससे वे शीघ्र ही दु:खित भारतीयों के दु:ख दारिद्रय को देखें कि किस प्रकार म्लेच्छ लोग अंग्रेज म्लेच्छपने से भारतीय लोगों को पीडि़त कर रहे हैं। इसी पत्र के 17 वें श्लोक का भाव यह है कि तुम्हें पार्लियामेन्ट में जाकर यह सब कहना चाहिए ताकि भारतीयों पर होने वाले अत्याचार बन्द हो सकें।’’

महर्षि के इस प्रकार के प्रजाहित चिन्तन स्वरूप को देखकर यह कहा जा सकता है कि समकालीन समाज में वह पहले भगवाधारी सन्त थे जो धर्म-चिन्तन के साथ-साथ राष्ट्रचिन्तन भी कर रहा था। वह हर परिस्थिति में राष्ट्रीयता को बलवती करना चाहते थे। क्योंकि वह जानते थे कि राष्ट्रधर्म राजधर्म अर्थात् राजनीति ही सबसे बड़ा धर्म है।

यदि राष्ट्रधर्म इतना पवित्र और शुद्घ हो गया हो कि वह प्रत्येक प्राणि को और राष्ट्रवासी को उसके मौलिक अधिकार देकर उसकी शारीरिक, मानसिक और आत्मिक उन्नति में सहायक बन रहा है तो व्यक्ति की धार्मिक उन्नति तो स्वयं ही हो जायेगी। उनका चिन्तन था कि ‘‘एकै साधे सब सधै।’’

बस यही कारण था कि उन्होंने अंग्रेजों के अनीति और अधर्म आधारित राज्य को भारत से शीघ्र समाप्त कराने के लिए लोगों को ‘स्वराज्य’ का मन्त्र प्रदान किया। क्योंकि अनीति और अधर्म आधारित राज्य कभी भी जनता में धर्म का प्रचार नही होने देता है। पाप का प्राबल्य पुण्य की फ सल का जिस प्रकार विनाश कर देता है उसी प्रकार धर्म का (राजनीति के परिप्रेक्ष्य में लोक कल्याण का) विनाश कर डालता है। महर्षि ने भारतीयों की दुर्दशा को देखा और उसके मूल को समझा। उनकी दृष्टि में तत्कालीन राजा (ब्रिटिश शासक) का अन्यायपरक शासन ही भारत वर्ष की दुर्दशा का एकमेव कारण था। इसलिए उन्होंने आवाज दी कि आर्यावर्त केवल आर्यों के लिए है-अर्थात भारतवर्ष भारतीयों का है। होमरूल आन्दोलन की प्रवत्र्तिका श्रीमती एनी बीसेन्ट ने इस सन्दर्भ में कहा था-‘‘महर्षि दयानन्द पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतवर्ष भारतीयों का है, का उद्घोष किया था।’’

महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा-‘‘जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है, अथवा मत मतान्तर के आग्रह से रहित अपने और पराये का पक्षपात शून्य, प्रजा पर माता-पिता के समान कृपा, न्याय और दया, के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नही है।’’


महर्षि दयानन्द विकृतियों को और विसंगतियों को हर क्षेत्र से मिटाकर मानवतावाद को प्रतिष्ठित कर वस्तुओं के शुद्घ स्वरूप के उपासक थे। उन्होंने आर्यों अर्थात् हिन्दुओं की बहुदेवतावादी अवैदिक मान्यताओं को तो धोया ही, साथ ही राजनीति के विकृत स्वरूप को और अनीति के मलमूत्र से सने देह को भी पवित्र करने का भागीरथ प्रयास किया। इसके लिए उन्होंने पश्चिमी चिन्तन का तथा इंग्लैण्ड के हर्बर्ट स्पेन्सर, जॉन स्टुअर्ट मिल, या रूसो तथा वाल्टेयर के राजनीतिक विचारों को अपने स्वराज्य चिन्तन का आधार नहीं बनाया। कारण कि वह इन विदेशी विद्वानों के चिन्तन से कहीं अधिक उत्कृष्ट चिन्तन वेद का मानते थे और वेदों की ओर लौटना ही उनका उद्घोष था। वेद के चिन्तन में गहन निष्ठा होने के कारण उन्होंने कभी इन राजनीतिक मनीषियों और चिन्तकों के विचारों को पढऩे, समझने और उनकी पुष्टि के लिए अपनी उर्जा का अपव्यय भी नहीं किया।

वेद की मातृभूमि वन्दना स्वराज्य की अर्चना के ऋग्वेदीय सूक्त, मनु, याज्ञवल्क्य, शुक्र, चाणक्य और कामन्दक राजनीतिशास्त्र वेत्ता तथा सामाजिक व्यवस्थाओं के सूत्र संचालकों के विचार महर्षि के लिए प्रेरणा के स्रोत थे। वे उन्ही विचारों, आस्थाओं, मान्यताओं, सिद्घान्तों और नीतियों के प्रतिपादक थे जो वेद सम्मत हों। क्योंकि वेद संसार की एकमात्र ऐसी पुस्तक है जो वास्तव में असाम्प्रदायिक है। यह पुस्तक केवल और केवल मानवमात्र के लिए लिखी गयी है। शेष सभी कथित धार्मिक ग्रन्थ साम्प्रदायिक हैं।

इसलिए स्वाभाविक है कि देश में पन्थनिरपेक्ष शासन की स्थापना केवल वैदिक शिक्षा के माध्यम से ही सम्भव है। महर्षि जानते थे कि पश्चिम के विद्वानों का चिन्तन यदि भारत में एक लोक कल्याणकारी शासन स्थापित नही करा पाया है तो वह मानवमात्र के लिए हितचिन्तक कैसे हो सकता है? इसलिए उन्होंने भारतीयों का ध्यान भारत के गौरवमयी अतीत की ओर करने का प्रयास किया और उन्हें अपने अतीत से उर्जान्वित होने के लिए प्रेरित किया। उनकी मान्यता थी कि निरा भौतिक चिन्तन ही राजनीति का आधार नही हो सकता अपितु अध्यात्मवाद का चिन्तन राजनीति का मार्गदर्शक होना चाहिए। तभी देश में नीतिगत सुव्यवस्था स्थापित हो सकेगी।

देश में 26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित कर दिया गया है, उस पर संसद में एक स्तरीय चर्चा भी हुई है, परंतु किसी ने भी भारत के प्राचीन गौरव और मानवोचित उदात्त भावों से भरी हुई भारतीय संस्कृति की पुनस्र्थापना की बात नही की, जबकि संविधान दिवस पर ऐसी बातें की जानी अपेक्षित थीं।

राकेश कुमार आर्य ( 1586 )

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