मतदान की प्रक्रिया तब और अब

  • 2015-10-29 03:00:12.0
  • राकेश कुमार आर्य

बिहार में तीसरे चरण के मतदान लगभग 54 प्रतिशत लोगों ने भाग लेकर अपनी अच्छी उपस्थिति दर्ज की है। जब बात चुनावों की आती है तो 66 वर्ष पुराने भारतीय गणतंत्र के सफर पर थोड़ा पीछे जाकर देखने से मालूम होता है कि मतदान की प्रक्रिया और ढंग ने भी कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। देश का पहला आम चुनाव 1952 में हुआ था। तब हर उम्मीदवार के लिए एक अलग मतपेटी होती थी, जिस पर केवल उसी उम्मीदवार अथवा उसकी पार्टी का चुनाव चिह्न अंकित होता था। तब चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों की संख्या यदि किसी क्षेत्र में सात होती थी तो हर मतदान केन्द्र पर सात मत पेटियां ही भेजी जाती थीं, तब मतदान करने की प्रक्रिया यह थी कि प्रत्येक मतदाता को मतपत्र दे दिया जाता था, जिसे वह उस पेटी में डाल देता था जिस पर उसके पसंदीदा उम्मीदवार का चुनाव-चिह्न अंकित होता था। यह प्रक्रिया पूर्णत: गुप्त मतदान की प्रक्रिया थी, तब मतपेटियां भी परदे के पीछे रखी जाती थीं।


प्रथम और दूसरे आम चुनाव के समय हर मतपत्र पर इसकी क्रम संख्या छपी होती थी और इस पर पीठासिंह अधिकारी अपने हस्ताक्षर अनिवार्यत: करता था। यह पद्घति बहुत ही दोषपूर्ण अनुभव की गयी, पहला दोष तो यही था कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए बहुत सारी मतपेटियां भेजनी पड़ती थीं। दूसरे मतपत्र पर चुनाव चिह्न अंकित न होने के कारण और उसी पर मतदाता की राय स्पष्ट न होने के कारण मतपेटी का ताला खोलकर उस मतपेटी के सभी या कुछ मतपत्रों को दूसरी मतपेटी में डाल दिया जाता था।

जब तीसरा आम चुनाव 1962 में हुआ तो उस समय मतदान की प्रक्रियाएं कुछ भिन्नता लाने का प्रयास किया गया। तब मतपत्र पर सभी उम्मीदवारों के नाम और निशान अंकित किये गये। मतदाता उनमें से एक नाम या निशान के आगे मुहर लगा देते थे, मुहर लगे मतपत्र को मतपेटी में डाल दिया जाता था। इस प्रकार हर मतदान केन्द्र पर तीसरे आम चुनाव से केवल एक मतपेटी रखने का प्रचलन प्रारंभ हुआ। जब यह एक मतपेटी भर जाती थी तब दूसरी मतपेटी का प्रयोग किया जाता था।

मतदान की प्रक्रिया में 1962 से आया परिवर्तन नवंबर 1998 तक चलता रहा। नवंबर 1998 में संपन्न हुए कुछ विधानसभा चुनावों में सोलह विधानसभा क्षेत्रों में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन  का प्रथम बार प्रयोग किया गया। इसके पश्चात इसको राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया गया जिससे अब पूरे देश में हर चुनाव में इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का ही प्रयोग किया जाता है, जिसे संक्षेप में ई.वी.एम. वोटिंग सिस्टम कहा जाता है।

इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में उम्मीदवारों के नाम और उनके चुनाव चिह्नों के साथ ही नीले रंग के बटन होते हैं, एक वोट डालने में लगभग पंद्रह सैकंड लगते हैं। जब मतदाता बटन दबाते हैं तब एक रोशनी होती है और बीप की आवाज सुनाई देती है। यह एक ऐसी सुरक्षित मशीन है जिसे खराब सिद्घ करने के लिए या तो इसे तोडऩा पड़ेगा या फिर जलाना पड़ेगा। कहने का अभिप्राय है कि इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन के द्वारा डाले गये मतों को सबसे सुरक्षित माना जाता है, और प्रत्येक प्रत्याशी इस बात के प्रति आश्वस्त रहता है कि उसे जो भी मत मिले होंगे वह सभी ठीक ढंग से गिने गये हैं, उनमें किसी प्रकार के घपले की या घटत-बढ़त की कोई संभावना नही है।

इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन को सबसे सुरक्षित उपकरण माना जाता है इसके प्रयोग से जहां चुनावी प्रक्रिया सरल हुई है वहीं चुनावी परिणामों की घोषणा में भी तेजी आ गयी है। इसके अतिरिक्त मशीनों के उपयोग से मतदान केन्द्रों पर कब्जा या मतपेटियों को लूटने जैसी घटनाओं से भी बचा जा सकता है।

2004 के आम चुनावों के लिए पहली बार सारे देश में इन मशीनों के इस्तेमाल से लगभग एक लाख पचास हजार पेड़ों को बचाया जा सका, जो मतपत्रों को छापने के लिए करीब आठ हजार टन कागज बनाने के लिए काटे जाते।

इसके सबके उपरांत भी चुनावी प्रक्रिया में अभी भी सुधारों की गुंजाइश है। अभी चुनावों के लिए प्रत्याशी की योग्यता, उसका राजनीतिक अनुभव उसका व्यक्तिगत चरित्र आदि कुछ ऐसी चीजें हैं जिनको नापने की आवश्यकता नही समझी जाती है। जिससे धनबली और ‘गन’ बली लोग विधायिका में प्रवेश कर जाते हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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