लोकतंत्र के इन राजाओं के ‘प्रिवीपर्स’

  • 2016-05-12 04:00:59.0
  • राकेश कुमार आर्य

democracy

इतिहास अतीत की घटनाओं का उल्लेख तो करता है पर वह कभी स्वयं अतीत नही बनता। इतिहास स्वयं में एक प्रवाहमान सरिता है जो निरंतर कल-कल करती हमारे साथ पल-पल बहती है। इतिहास के इस सत्य सनातन स्वरूप में और विज्ञान के नियमों में बहुत ही सामीप्य है। जो लोग इतिहास के इस सत्य को जान लेते हैं-उनके लिए इतिहास नित्य का वह दर्पण बन जाता है जिसे देखकर व्यक्ति अपना चेहरा संवारता है।

अब राजाओं के ‘प्रिवीपर्स’ की कहानी को ही लें, इसे श्रीमती इंदिरा गांधी अपने प्रधानमंत्री काल में बंद कर गयीं। जब उन्होंने इसे बंद किया था तब उन्होंने ‘गरीबी हटाओ’ का लोक आकर्षक नारा दिया था। लोगों को लगा था कि वास्तव में ही यह बड़ा कार्य है और इसे पूर्ण होते ही देश से गरीबी हट जाएगी। पर ऐसा हुआ नही। वैसे श्रीमती गांधी ने उस समय भारत के सर्वोच्च न्यायालय का विरोध सहकर भी जिस प्रकार इस ‘प्रिवीपर्स’ के अलोकतांत्रिक भार को भारतीय राजकोष से हल्का किया था उसके लिए वे निश्चय ही साधुवाद की पात्र थीं। पर भारत के लोकतंत्र की विशेषता है कि ये त्याज्य वस्तुओं को भी किसी न किसी प्रकार बनाये रखने का अभ्यासी है। इसमें वस्तु का स्वरूप परिवर्तन होता है वस्तु का आत्मतत्व वही बना रहता है-इसे ही लोग नई बोतल में ‘पुरानी शराब’ कहा करते हैं और कुछ इस स्थिति को ‘इतिहास अपने आप को दोहराता’ है-ऐसा कहते हैं। पर यदि इतिहास को निरंतर प्रवाहमान एक सरिता के रूप में देखा जाए तो पता चलता है कि इसमें भी पुरातन किसी न किसी प्रकार नूतन बनकर दिखता रहता है। ‘प्रिवीपर्स’ को हमने मान लिया कि यह मर गया और अब इतिहास के कूड़ेदान की वस्तुमात्र होकर रह गया है। पर यह हमारे नये राजाओं (हमारे सांसदों और विधायकों) के वेतन, भत्ते-पेंशन आदि के रूप में हमारे बीच में आज भी विद्यमान है। वी.पी.सिंह जब देश के प्रधानमंत्री थे तब हमारे लोकतंत्र ने इतनी उदारता का प्रदर्शन किया कि जो कोई विधायक या सांसद एक वर्ष के लिए विधायक या सांसद रह लेगा उसे भी आजीवन पेंशन आदि के वे समस्त लाभ मिलेंगे जो अभी तक अन्य भूतपूर्व सांसदों को या विधायकों को मिलते रहे थे। इस पर हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों ने और राजनीतिक दलों के उन लोगों ने या सदस्यों ने ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’ के नारे लगाये थे जिन्हें भविष्य में अपने सांसद या विधायक बनने की आशा थी। देखा जाए तो एक प्रकार से नये ‘प्रिवीपर्स’ लागू करके देश में लोकतंत्र की हत्या की गयी थी-पर यह देश तो ‘अश्वत्थामा मारा गया’-इतना सुनकर ही ताली बजाने का पिछले 5 हजार वर्षों से अभ्यासी रहा है, इसलिए हम यह नही देखते कि नर मरा या हाथी मरा अर्थात लोकतंत्र मरा या जीवित रहा हमें तो ताली बजाने से मतलब होता है और उसमें हम कभी प्रमाद नही करते। जिन लोगों को पता था कि ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’ के स्थान पर ‘लोकतंत्र मुर्दाबाद’ कहा जाना चाहिए, उनकी आवाज तालियों की गडग़ड़ाहट में वैसे ही दबकर रह गयी थी जैसे युधिष्ठिर की आवाज को महाभारत के युद्घ में अश्वत्थामा के वध के समय दबा दिया गया था।

‘प्रिवीपर्स’ एक ऐसा आकर्षण है जिसके लिए हमारे जनप्रतिनिधि बड़ा भारी संघर्ष उस समय करते हैं जिस समय वह एक पार्टी के कार्यकर्ता होते हैं। उस समय वह चाहते हैं कि जैसे भी हो एक बार सांसद या विधायक बन जाऊं तो जीवन भर के लिए मौज आ जाए। एक सरकारी कर्मचारी 30-40 वर्ष सरकारी नौकरी करता है तो पेंशन पाता है। वह कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो फिर भी सरकारी नौकर रहते हुए सरकारी कार्यों को आगे बढ़ाता है, पर उसे पेंशन तब मिलती है जब वह जीवन से  थक लेता है अर्थात एक थके हुए व्यक्ति से सरकार कहती है कि जाओ-अब पेंशन लो और घर पर रहो। इधर हमारे राजनीतिज्ञ हैं जिनमें से अधिकांश ऐसे हैं जो अपने छात्र जीवन में मारपीट, लड़ाई, झगड़े, हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार, अपहरण, जमीनों पर अवैध कब्जा करने जैसे अलोकतांत्रिक कार्यों में व्यस्त रहे और अपने राजनीतिक ‘कैरियर’ का आरंभ अपनी इसी प्रकार की विशेषताओं के साथ किया। लोकतंत्र के गुणगायक लेखक ऐसे जनप्रतिनिधियों के ऐसे अवगुणों को उनका ‘संघर्ष’ कहकर उनके अनैतिक कार्यों का लोकतंत्रीकरण कर देते हैं, और हम देखते हैं कि ऐसे अलोकतांत्रिक व्यक्ति ही देश के लोकतंत्र के रक्षक बनकर एक दिन कानून बनाने वाले बन जाते हैं। जो कानून तोड़ते थे वही कानून के निर्माता बनकर हमसे फूलों के हार पहनने लगते हैं।

अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में विधानपरिषद के चुनाव हुए जिसमें सपा ने अपने 36 एमएलसी विधानपरिषद में भेजे। समाचार पत्रों में लोगों ने इन विधायकों के विषय में लिखा कि ये सबके सब भूमाफिया किस्म के अथवा आपराधिक प्रवृत्ति के रहे हैं। पर देश का लोकतंत्र इसे अपने लिए ‘अपराध’ नही मानता क्योंकि यह तो नेताओं को अपराध जगत से बाहरकर उनका राजनीतिकरण करने की रिफाइनरी है। ऐसे किस्से हर प्रदेश के हैं। हर प्रदेश में लोकतंत्र वही कुछ कहता है और वही कुछ करता है जो उसकी गर्दन पकड़े हुए अपराधी राजनीतिज्ञ उससे कहलवाता है। इसके उपरांत भी हमारे देश की भोली जनता ‘लोकतंत्र की जय’ बोलती जा रही है क्योंकि वह लोकतंत्र के रहस्यों और भेद भरे चेहरों के भेद भरे राजों को नही जानती।

आप कल्पना करें कि एक पिता के तीन पुत्र हैं, उनमें से एक बहुत ही होनहार प्रतिभावान आगे बढऩे की ललक रखने वाला है, दूसरा प्रथम श्रेणी का वाहियात और अपराधी प्रवृत्ति का है, जबकि तीसरा ना तो प्रतिभावान है और ना ही अपराधी है, पर विनम्र है। तब पता है कि वह पिता उन बच्चों के विषय में क्या सोचता है, या क्या कहता है? वह पहले के लिए कहता है कि बेटे तुम अधिकारी बनकर मेरा नाम करो। जबकि दूसरे से कहता है कि तू कहीं और नही खप सकता, तेरे लिए राजनीति ही उचित रहेगी। इसलिए कहीं से जुगाड़ लगा कि कोई पार्टी तुझे टिकट दे दे और तू सांसद या विधायक बन जाए। जबकि वही पिता अपने तीसरे बेटे से कहेगा कि बेटा तू कोई अपना धंधा कर ले जो पैसा लगेगा उसे मैं दूंगा। इस प्रकार राजनीति के लिए एक पिता इस देश में उस पुत्र को देता है जो सर्वाधिक निकृष्ट है। सर्वाधिक उत्कृष्ट को और मध्यमी उत्कृष्ट को वह अपने लिए रखता है और निकृष्टतम को वह देश के लिए देता है। इस प्रकार निकृष्टतम व्यक्तियों से विश्व की उत्कृष्टतम शासन व्यवस्था अर्थाक लोकतंत्र को चलवाने की अपेक्षा की जाती है। ये निकृष्टतम लोग जब हमारे जनप्रतिनिधि बनकर विधानमंडलों में पहुंचते हैं तो ये लोकतंत्र को अपना चाकर बनाकर सबसे पहले उससे ही उठक बैठक लगवाते हैं। इन्हीं परिस्थितियों में राजनीति एक व्यापार हो गयी है। यह ध्यान रखना चाहिए कि निकृष्टतम व्यक्ति ही भ्रष्टतम होता है। यही कारण है कि इन निकृष्टतमों को भ्रष्टाचार भी भ्रष्टाचार दिखाई नही देता है। जो जनता के लिए भ्रष्टाचार और अत्याचार है उसे ये अपना अधिकार मानकर चट कर जाते हैं।

अब आप देखिए दिल्ली को। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल हैं। ये मान्यवर भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर राजनीति में आये और भ्रष्टाचार मुक्त भारत को मुद्दा बनाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये। इन्होंने अपने शासनकाल में अपने विधायकों का वेतन चार गुणा बढ़ा दिया है। दिल्ली के हर विधायक को ऐसी सुविधायें दे रहे हैं जैसे वह मंत्री हों। क्या आवश्यकता है इन सब बातों की? इतने अधिक वेतन बढ़ा लेना भ्रष्टाचार का संवैधानिकीकरण करना ही तो है। जिसे ये नेता अपना अधिकार मानने लगे हैं। पर इन्हें यह भी पता होना चाहिए-

‘‘मगरूर न हो तलवारों पर मत भूल भरोसे ढालों के
सब पट्टा तोड़ के भागेंगे मुंह देख अजल के भालों के
क्या डब्बे मोती हीरों के क्या ढेर खजाने मालों के
क्या बगुचे ताश मुसज्जर के क्या तख्ते शाल दुशालों के
सब माल पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा।।’’

भारत की राजनीति वैराग्य की इसी भावना से निर्मित की गयी थी और यह वैराग्य की भावना ही हमारे लोकतंत्र का वह गुण है जो उसे सर्वानुमति प्रदान कराकर विश्व की उत्तम राजनीतिक व्यवस्था बनाती है, पता नही हमारे राजनीतिज्ञ इस भावना से क्यों दूर हो गये?