प्रथम पुरूष की प्रेरणा

  • 2015-11-18 03:30:51.0
  • राकेश कुमार आर्य

भारतवर्ष का यह सौभाग्य है कि इस समय देश के राष्ट्रपति के रूप में उसे प्रणव मुखर्जी जैसा अनुभवी और मंजा-मंजाया राजनेता मिला है। उनके रहते राष्ट्रपति भवन की गरिमा और पवित्रता पर कोई आंच नही आयी है। उन्होंने घर के प्रेरक मुखिया की भूमिका निभायी है। मूलरूप में कांग्रेसी पृष्ठभूमि के रहे श्री मुखर्जी  अपनी निष्पक्षता को स्पष्ट करने में और प्रमाणित करने में सफल रहे हैं। उन्होंने नरेन्द्र मोदी को देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई और उनके साथ उत्कृष्ट समायोजन स्थापित कर देश को सही दिशा देने का कार्य किया है।

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने साहित्य सम्मान लौटा रहे देश के बुद्घिजीवियों की ‘राजनीति प्रेरित दुर्भावना’ को अस्वीकार करते हुए कहा है कि सम्मान संजोने और आदर करने के योग्य होते हैं। मतभेदों को चर्चा और बहस से स्पष्ट करना चाहिए।

राष्ट्रपति की यह टिप्पणी निश्चय ही साहित्य सम्मान लौटा रहे देश के उन कथित बुद्घिजीवियों को सही मार्ग दर्शन कराएगा जो अपनी विचारधारा से विपरीत विचारधारा की मोदी सरकार की कथित असहिष्णुता का विरोध करते-करते स्वयं ही मोदी सरकार के विरूद्घ असहिष्णु हो उठे और साहित्य के संसार का भी राजनीतिकरण कर बैठे। वह भूल गये कि हित से जो सहित होता है, वही साहित्य कहलाता है और साहित्य इसीलिए समस्त मानवता को मार्ग दिखाता है। यहां सम्मान लौटाकर संवादशून्यता स्थापित नही की जाती है, अपितु यहां तो संवादशून्यता को तोड़ा जाता है और कलम निरंतर दुव्र्यव्यवस्था के विरूद्घ संघर्ष करती रहती है, साथ ही पथभ्रष्ट हुई राजनीति को मार्गदर्शन भी कराती है।

साहित्य के संसार में विरोध कलम करती है। बिकी हुई मानसिकता यदि सम्मानित हो जाती है, तो वह कलम का सम्मान सुरक्षित नही रख पाती, क्योंकि कलम स्वाभिमान का प्रतीक है, और यदि कोई सत्ता कलम के स्वाभिमान को खरीद लेती है तो वह कलम कभी भी जनता जनार्दन की कलम नही हो सकती। वह दरबारी  कलम हो सकती है, जो दरबारों की परिक्रमा करते-करते ऊंचाई तक पहुंच जाती है।

‘नेशनल प्रेस डे’ पर आयोजित कार्यक्र म में राष्ट्रपति महोदय ने प्रेस को उसकी जिम्मेदारियों और चुनौतियों का अनुभव कराया। उन्होंने कहा कि प्रतिष्ठित सम्मान मेधा, मेहनत और सार्वजनिक आदर का प्रतीक होता है....इसे संजोना चाहिए। इस प्रकरण में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वीणावादक पदमश्री व ग्रेमी अवार्ड विजेता पं. विश्वमोहन भट्ट का यह कहना भी तर्कसंगत है कि असहिष्णुता के विरोध में केवल सम्मान लौटाना ही उचित नही है, जो लोग ऐसा कर रहे हैं वे ब्याज सहित सम्मान के साथ मिली धनराशि क्यों नही लौटाते?

देश के समक्ष चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं, जिन लोगों ने समाज में किसी भी प्रकार से लोगों के लिए ऐसी परिस्थितियां निर्मित की हैं, या निर्मित कराने में सहयोग दिया है कि जिससे किसी समुदाय के लोगों का जीना कठिन हो गया हो, वे सभी लोग राष्ट्र के शत्रु हैं और ऐसे शत्रुओं के विनाश के लिए साहित्यकारों को आवाज उठानी चाहिए। देश के ऐसे शत्रु देश के चाहे जिस भाग में रहते हों, और चाहे जिस जाति या संप्रदाय के हों उनके प्रति साहित्यकारों को मैदान में उतरना ही होगा। यदि कलम ने इस कत्र्तव्य का निर्वाह करने में किसी प्रकार के प्रमाद का प्रदर्शन किया तो देश की परिस्थितियां और भी अधिक भयावह हो सकती हैं। साहित्यकारों को आवाज लगानी ही होगी कि इस देश में किसी भी स्थिति में किसी समाज या सम्प्रदाय का निजी कानून नही चलेगा, और यदि चलेगा तो फिर वह सब प्रकार के अपराधों में मान्य होगा। ऐसे अपराधी को तब वैसी ही सजा दी जाएगी जैसी उनका ‘पर्सनल लॉ’ बताता है। जैसे यदि अरब में किसी अपराध के करने पर किसी व्यक्ति को पत्थर मार-मारकर समाप्त करने की दण्ड व्यवस्था है तो ऐसे अपराध के लिए भारत में भी पर्सनल लॉ की मांग करने वालों के साथ ऐसा ही ‘न्याय’ किया जाना चाहिए।  पर्सनल लॉ को आप अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए प्रयोग नही कर सकते, उसे अपनाना है तो समग्रता के साथ अपनाना ही उचित होगा।

साहित्यकारों को चाहिए कि देश में न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए समान नागरिक संहिता को लागू करायें, कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही कानून इस देश में मान्यता प्राप्त करे, कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप तक सभी लोगों को समान रूप से जीने का अधिकार हो, कोई किसी के धार्मिक विषयों में हस्तक्षेप करने का सामथ्र्य न रखे और किसी को किसी का शोषण करने का अधिकार न हो। बलात् धर्मांतरण की गतिविधियों पर पूर्णत: रोक लगे और देश की स्वाधीनता की लड़ाई में देश में राष्ट्रभक्ति का गीत संगीत छेडऩे वाले ‘वंदेमातरम्’ को गाने में किसी को कोई आपत्ति न हो। जो लोग ‘वंदेमातरम्’ का विरोध करें उन्हें यह साहित्यकार बतायें कि ‘वंदेमातरम्’ में तो प्रिय बंधुओ! आप अपनी मातृभूमि की वंदना कर रहे हो पर ‘जन गण मन...’ में तो एक अधिनायक की वंदना कर रहे हो। मातृभूमि की वंदना ‘अधिनायक’ की वंदना से हर स्थिति में उच्च स्थान रखती है।

हमारे साहित्यकारों को धर्मनिरपेक्षता की अंधी गलियों में भटकती राजनीति को तुष्टिकरण के खेल में लगे होने से बचाना चाहिए, और उसे बताना चाहिए कि तेरा धर्म पंथनिरपेक्ष हो जाना है, अर्थात तुझ पर किसी पंथ की मान्यताओं का प्रभाव नही पडऩा चाहिए। तू पंथनिरपेक्ष रहे और सर्वपंथसमभाव का प्रदर्शन कर। यदि  तूने किसी एक पंथ के प्रति विनम्रता का या तुष्टिकरण का प्रदर्शन किया तो अनर्थ हो जाएगा, जिससे देश के सामाजिक परिवेश में लोगों में एक दूसरे के प्रति घ्रणा का भाव उत्पन्न होगा। देश के राष्ट्रपति देश को कुछ ऐसी प्रेरणा दे रहे हैं, उनका एक अनुभवी जीवन है, उस प्रेरणामयी जीवन के प्रेरणादायक सूत्रों को हमें अपनाना चाहिए और पूर्ण निष्ठा के साथ राष्ट्रनिर्माण के अपने दायित्व में लग जाना चाहिए।