प्रकृति और भारत की संस्कृति

  • 2015-12-08 01:30:24.0
  • राकेश कुमार आर्य

earthमहाराजा मनु की वंशावली में एक बड़ा ही प्रतापी शासक हुआ जिसका नाम था-पृथ। यह पृथ बहुत ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला राजा था। जिसने भूमि की नाप तौल करायी और इसे कृषि योग्य बनाने में भी विशेष योगदान दिया।

उसी राजा ‘पृथ’ के इस वैज्ञानिक कृत्य की स्मृति में धरती का एक नाम ‘पृथ्वी’ भी पड़ा। यह पृथ्वी ही हमारे सौरमंडल में एक ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन विद्यमान है, ऐसी हमारे वर्तमान वैज्ञानिकों की धारणा है। बुद्घ और वीनस के पश्चात सौर परिवार में तीसरा स्थान पृथ्वी का है।

पृथ्वी सूर्य का लगभग 365.26 दिनों में एक परिक्रमा चक्र पूर्ण करती है। पृथ्वी और सूर्य के मध्य की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है। अपने परिक्रमा पथ पर घूमते हुए पृथ्वी की सूर्य से अधिकतम दूरी 15.2 करोड़ किलोमीटर तथा निकटतम दूरी 14.7 करोड़ किलोमीटर होती है। एक घंटा में 67000 किलोमीटर पृथ्वी का क्षेत्र सूर्य के सामने से गुजर जाता है, अर्थात इतनी गति से पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा अण्डाकार रूप में पूर्ण करती है।

पृथ्वी पर जलीय क्षेत्र 71 प्रतिशत है। इसका अभिप्राय है कि 29 प्रतिशत क्षेत्र ही पृथ्वी का ऐसा है जिस पर थलीय जीवों का अर्थात मनुष्य-पशु-पक्षी आदि का जीवन संभव है। उसे भी विधाता ने कुछ इस प्रकार बनाया है कि पृथ्वी पर पहाड़ी क्षेत्र और वन क्षेत्र का भी उचित समन्वय स्थापित किया है, जिससे कि पृथ्वी पर जीवन संभव रह सके, इन क्षेत्रों को निकाल देने से पृथ्वी का जलविहीन क्षेत्र और भी कम रह जाता है। इस प्रकार धरती का जीवनयोग्य जो यह शेष भाग बचता है उस पर भी मानव के लिए कितनी ही प्रकार की आपदाएं आती रहती हैं, जो मनुष्य जीवन को कष्ट देती हैं।

भारत की ऋषि प्रणीत संस्कृति में जीवन और जगत के इस तथ्य को समझा गया कि विशाल पृथ्वी के विशाल विज्ञान के गहरे रहस्यों को खोल-समझकर देखने से यही उचित है कि प्रकृति के साथ मनुष्य मित्रता स्थापित करे। यह उसका अनुगामी बने और उसके सान्निध्य एवं मित्रता में अपना जीवन यापन आरंभ करे। यदि इसने किसी भी प्रकार से प्रकृति के विरूद्घ चलने का प्रयास किया या उससे प्रतियोगिता आरंभ कर दी तो यह उससे जीत नही पाएगा।

पश्चिमी जगत के वैज्ञानिकों ने जब अपने अनुसंधान और आविष्कार आरंभ किये तो उन्होंने प्रकृति से प्रतियोगिता आरंभ कर दी। वे प्रकृति के जितने रहस्यों को समझते गये उतने ही अहंकार और दम्भ से फूलते चले गये। उन्हें लगा कि प्रकृति के रहस्यों के हर दुर्ग को वह जीतने की शक्ति और सामथ्र्य रखते हैं। इससे प्रकृति मनुष्य से रूष्ट होती जा रही है। मनुष्य यह नही समझ पा रहा है, कि उसके साथ प्रकृति अपना प्रेम प्रदर्शन क्यों नही कर रही है? अहंकारी व्यक्ति की यह दुर्बलता भी होती है कि वह ‘सच’ को समझकर भी समझने का प्रयास नही करता है। वह सोचता है कि मैं शक्तिशाली हूं, इसलिए प्रकृति को मेरे सामने झुकना चाहिए। उसका यह शक्तिशाली होने का भ्रम ही उसे यह नही समझने देता है कि शक्तिशाली ‘मैं’ नही ‘वह’ (प्रकृति) है। इसलिए प्रकृति के इस नियम को सत्य मानते हुए तू स्वयं उसके सामने झुक कि सबल के सामने निर्बल को ही झुकना पड़ता है। मनुष्य को समय रहते प्रकृति से अपना मित्रभाव प्रकट करने वाला पुराना संबंध यथाशीघ्र स्थापित कर लेना चाहिए।

प्रकृति अपने क्रोध का प्रदर्शन समय-समय पर मनुष्य के प्रति करती रहती है। उसके क्रोध प्रदर्शन के अनेक ढंग हैं। उनमें से एक है-बाढ़ों का आना। बाढ़ अक्सर अधिक वर्षा के कारण आती हैं। अधिक वर्षा के होने के कई कारण हो सकते हैं। कई बार भूकंप के आने के पश्चात तो कई बार ज्वालामुखी के फटने आदि के कारण भी अधिक वर्षा होती है। पृथ्वी का कुल क्षेत्रफल लगभग 509.700000 वर्ग किलोमीटर है। जिसमें 148,400,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र स्थलीय है और 361,300,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जल से घिरा है। पानी की अधिक मात्रा होने के कारण ही हमारी पृथ्वी हमें अंतरिक्ष से  नीली दिखाई देती है। जिस कारण हमारे वैज्ञानिक पृथ्वी को ‘नीला गृह’ भी कहते हैं। हमें आकाश भी नीला इसीलिए दिखाई देता है कि पृथ्वी पर जलीय भाग अधिक होने के कारण सूर्य की किरणें जब जल पर पड़ती हैं तो वह प्रतिबिम्ब बनाकर आकाश को भी नीला कर देती हैं, ऐसा आभास हमें होता है।

अब भारत के प्रांत तमिलनाडु में भयंकर बाढ़ आयी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने बाढग़्रस्त क्षेत्रों का हवाई दौरा किया है और तमिलनाडु को इस प्राकृतिक आपदा से निपटने में सहायता करने के लिए 1000 करोड़ रूपये की आर्थिक सहायता प्रदान की है। पूरे देश की संवेदनाएं अपने आप ही तमिलनाडु के साथ जुड़ गयी हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी तमिलनाडु को 5 करोड़ रूपये की आर्थिक सहायता प्रदान की है, अन्य राज्य भी अपने-अपने स्तर पर इस प्रांत को सहायता दे रहे हैं। यही इस देश की संस्कृति है कि जब किसी पर कष्ट या आपत्ति आती है तो हम उत्तर या दक्षिण-पूरब या पश्चिम का भेद भुलाकर स्वयं उसके साथ लग जाते हैं। कष्ट में स्वयं सहायता देते हैं और हर्ष में (प्रसाद में) दूसरे से कहते हैं कि ‘प्रसाद बांट दो।’ कहने का अभिप्राय है कि हम किसी के विषाद और प्रसाद पर अपना बराबर का अधिकार मानते हैं। ऐसी संस्कृति विश्व में अन्यत्र कहीं नही मिल सकती। इसीलिए मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था-

यही पशु प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे।

मनुष्य है वही कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

किसी अन्य कवि ने भी बड़ा सुंदर कहा है :-

‘‘आप कमाये आप ही खाये यह मनुष्य की प्रकृति है।

आप कमाए नही औरों का खाये यह मनुष्य की विकृति है,

आप कमाए औरों को खिलाए यह भारत की संस्कृति है।’’

हम प्रवृत्ति और विकृति के जंजाल में फंसने वाले नही हैं। हम तो प्रकृति से संस्कृति निर्माण की ओर बढऩे वाले और उसका एक इतिहास बनाने वाले भारतीय हैं। सारा भारत आज अपने तमिल बंधुओं और बहनों के साथ खड़ा होकर यही संदेश दे रहा है। यही हमारा लोकतंत्र है यही हमारी पंथनिरपेक्षता है, और यही हमारी सहिष्णुता है। हमारे ये गुण युग-युगों से हमारा मार्गदर्शन करते आए हैं और ईश्वर से प्रार्थना है कि जब तक धरती-सूरज और चाँद सितारे रहें तब तक भारत के इन मानवीय गुणों से यह नीला ग्रह प्रकाशित होता रहे, प्रेरित होता रहे और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे। ईश्वर से प्रार्थना है कि तमिलनाडु के लोगों को जिस आपदा का सामना करना पड़ रहा है उससे वह शीघ्र मुक्त हों, और जिनको किसी प्रकार से जानमाल की क्षति हुई है, उनके साथ आहत मनों पर भी यथाशीघ्र राहत का मरहम  लगे।