दर्शन मतलब स्वयं दृश्य हो जाना

  • 2015-07-31 13:30:26.0
  • सद्गुरु जग्गी वासुदेव

सद्गुरु जग्गी वासुदेव

यदि आप किसी चीज को देखते हैं और उसकी छाप संपूर्णता में चाहते हैं और यदि आप खुद को कम कर लेते हैं तो आप महसूस करेंगे कि जो कुछ आप देख रहे हैं, वह धीरे-धीरे बढऩा शुरू हो जाता है और फिर वह जीवंत हो जाता है।

दर्शन शब्द का मतलब है, निहारना या देखना। जब आप कहते हैं कि मैं दर्शन कर रहा हूं तो आप ये बता रहे हैं कि आप कुछ देख रहे हैं। भारत में जब हम मंदिर में जाते हैं, तो हम वहां प्रार्थना के लिए नहीं जाते हैं।

बड़ी संख्या में लोग मंदिर में प्रतिमा देखने के लिए आते हैं। मतलब दर्शन करने के लिए आते हैं। कोई प्रार्थना नहीं, कोई पूजा नहीं, कुछ भी नहीं बस सिर्फ दर्शन, प्रतिमा के दर्शन। ये जीवन की प्रक्रिया को बहुत गहरे से समझने के बाद आता है।

तो इसका मतलब क्या है? मैं देखना चाहता हूं हो सकता है इसे सुनकर ऐसा लगे जैसे खरीदी कर रहे हैं? लेकिन ऐसा नहीं है, यादातर लोग यही नहीं समझते हैं यदि मैं कहता हूं कि मैं देख रहा हूं या मैं निहार रहा हूं कि तुम कौन हो तो ये दूसरे के होने का वह अनुभव है, वह छवि है जो मेरे भीतर घटित होती है।

यदि आप अपने आप में भरे हुए हैं तो कुछ भी भीतर नहीं जा पाएगा। कोई भी छवि आपकी आंखों से बाहर चली जाएगी। लेकिन यदि आप खुद में यादा नहीं है तो फिर छाप की संभावना बनती है, यदि आप अपने में यादा नहीं हो तो ये आपमें विकसित होता है।

यदि आप कुछ समझना चाहते हैं, आपको वह होना पड़ता है, इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। यदि आप प्यार को समझना चाहते हैं या यदि आप सच को समझना चाहते हैं तो आपको प्यार होना पड़ेगा... आपको सच होना पड़ेगा। बस यही एक रास्ता है।

ये तभी होगा, जब आप वो हो पाएंगे, तभी आप उसका अनुभव भी कर पाएंगें, नहीं तो आपके पास सिर्फ उसकी परिभाषा ही होगी। ये वो चीज नहीं है जो आप कर सकते हैं, ये वो चीज है जो आपको बना सकती है। ये कोई युक्ति नहीं है कि आप किसी भी तरह से कुछ पा लें, नहीं आपको वह होना ही होगा। यदि आप कुछ निहारते हैं तो आप उसका हिस्सा हो जाते हैं।

जब उस कुछ को आप अपना आप होने के लिए दे देते हैं तभी यह सवाल उठता है कि आप अपने आप को शून्य में कब बदल पाएंगें। इसलिए जब आप जानना चाहते हैं, तो आपको वो होना पड़ेगा। जब आप वह हो जाते हैं, तब जो आप हैं वह चला जाता है, तब ही आप उससे यादा हो पाते हैं, जो आप कभी थे।

ये जुड़ता नहीं है। ये पूरा-का-पूरा बदलाव है। इसे स्वीकारना ही होगा, नहीं तो आप इसे छू भी नहीं पाएंगे। आप यहां बैठे हैं और संवाद का आनंद ले रहे हैं, या फिर उपस्थिति का आनंद ले रहे हैं, दोनों ही आनंद है, अलग-अलग तरह के आनंद।

किसी चीज को देखना आनंद हो सकता है, किसी से बात करना या किसी को छूना या किसी के साथ अंतरंग होना...यहां तक कि जानने से खुद का मनोरंजन करना भी आनंद है - लेकिन जाने बिना, हुए नहीं हो सकता है।

तो यदि आप दर्शन करते हैं, आपको अपने भीतर बहुत कुछ जब करना होता है। यदि आप इतने ध्यानस्थ हैं कि आप वहां है ही नहीं, आप एक खाली घर से हैं-यदि आप खाली घर की तरह है तो फिर आपका दर्शन करना सार्थक है।

यदि आप खाली घर की तरह नहीं है, आप एक भरे हुए घर की तरह है, आप भरे हुए हैं अपने आप से, तो ये अछा होगा कि आप कम से कम प्रेम और करूणा से भरे हुए दर्शन करें क्योंकि ऐसा होगा तभी आप जो देखेंगे उसकी छवि आपके भीतर गहरी होगी।

ये करूणा है, ये करूणा आपके भीतर इसलिए नहीं है कि आप किसी को प्यार करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि इसलिए है कि आप स्वयं प्रेम हो गए हैं।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव ( 1 )

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