पेशावर के बादशाह खान

  • 2016-01-22 02:54:31.0
  • राकेश कुमार आर्य

आंसुओं का कोई ‘मजहब’ नही होता है, जो लोग आंसुओं को भी ‘हिंदू-मुस्लिम’ के दृष्टिकोण से देखते हैं, वास्तव में वही लोग तो वास्तविक साम्प्रदायिक होते हैं। यदि आंसुओं का भी कोई ‘मजहब’ होता है तो ईश्वर सबसे पहले ‘हिंदू-मुस्लिम’ की आंखों में अंतर करता फिर वह दोनों के आंसुओं का रंग अलग करता और अंत में ऐसा चमत्कार भी करता कि मुस्लिम की आंख के आंसू मुस्लिम को और हिंदू की आंख के आंसू केवल हिंदू को ही दिखाई पड़ते। पर उस न्यायकारी परमेश्वर ने ऐसा नही किया। उसने मानव की आंख को केवल मानव की आंख रहने दिया, मानव के आंसू को केवल मानव के आंसू रहने दिया और उन आंसुओं के प्रति मानवीय संवेदना को केवल मानवीय संवेदना रहने दिया। कितना न्यायकारी है ईश्वर? फिर भी हम उसके नाम पर लड़ते हैं, बिना यह ध्यान दिये कि उसकी खुदाई के नियम सब पर समान रूप से लागू होते हैं।

आतंकवाद की काली छाया ने अभी भारत के पठानकोट में अपना भयावह चेहरा दिखाया था, जिसमें शहीद हुए हमारे सैनिकों के परिजनों के आंसू अभी तक थमे नही हैं, कि विगत 20 जनवरी को पाकिस्तान के पेशावर में यह काली छाया और भी अधिक अमानवीयता के साथ प्रकट हुई। हमारे वीर सैनिकों को अपने बचाव के लिए हथियार तो उपलब्ध थे वहां तो विद्यार्थियों के पास हथियार भी उपलब्ध नही थे, जिससे वे अपनी रक्षा कर पाते। दानव बने (इस्लाम में जिसे शैतान या हैवान कहा जाता है) मानव ने अपनी पाशविकता का तांडव नृत्य किया और 70 विद्यार्थियों को निकट से उनके सिर में गोली मार-मारकर या तो समाप्त कर दिया, या गंभीर रूप से घायल कर दिया। जिससे पता चलता है कि आतंकियों का
badshah khan
इरादा उन विद्यार्थियों को समाप्त कर देना ही था। पेशावर पाकिस्तान का एक अशांत प्रांत-खैबर पखतूनख्वा की राजधानी है। कभी राजा पौरूष (पोरस) ने इसे पुरूषपुर के नाम से बसाया था, समय के अनुसार पुरूषपुर पेशावर हो गया, और जो शहर कभी संपूर्ण भारत का ‘रक्षकद्वार’ कहलाता था, वह विद्यर्मियों के हाथों लग गया और जब देश का विभाजन संप्रदाय के आधार पर हुआ तो राजा पोरस का ‘पौरूष’ हमने सदा के लिए क्षीण होता तब देखा जब यह नगरी एक साम्प्रदायिक और शत्रु देश के पास चली गयी। मानो पेशावर से हमारे इतिहास ने भी अंतिम विदा ले ली।

इसी पेशावर नगर से खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे एक महान गांधीवादी स्वतंत्रता सैनानी की स्मृतियां भी जुड़ी हैं। जिन्हें बादशाह खान के नाम से जाना जाता है। उन्हें स्थानीय पख्तून भाषा में बाचा खान या बाशा खान कहा जाता है। जब देश का बंटवारा किये जाने पर कांग्रेस अपना ‘दीनो ईमां’ नीलाम कर रही थी और सत्ता प्राप्ति की शीघ्रता में कांग्रेस के नेहरू शीशे के सामने खड़े हो-होकर अपनी अचकन पर गुलाब के फूल को करीने से लगाकर देख रहे थे कि सत्ता के दूल्हे के रूप में वह कैसे लगे हैं? और देश की स्थिति की उन्हें जिस समय कोई पता नही थी कि साम्प्रदायिकता का तांडव किस प्रकार लाखों लोगों को समाप्त करा सकता है? तब बादशाह खान को उस विभाजन के निर्णय से पूर्णत: अनजान बनाकर रखा गया था। पूर्णत: अंधेरे में रहे बादशाह खान को जब देश विभाजन की जानकारी मिली तो उनका हृदय भर आया था और उन्हें उतनी ही वेदना हुई थी जितनी एक देशभक्त को होनी चाहिए थी। अपनी वेदना पर आंसू बहाते हुए बादशाह खान ने तब इतना ही कहा था कि कांग्रेस और गांधी नेहरू ने हमें भूखे भेडिय़ों के सामने डाल दिया है। उनका आशय स्पष्ट था कि वह पाकिस्तान नही चाहते थे। क्योंकि उन्हेांने इस्लाम के ‘फण्डामैण्टलिज्म’ और हिन्दुत्व के ‘फण्डामैण्टलिज्म’ को निकट से देखा व समझा था। उन्हें ज्ञात था कि इस्लाम का ‘फण्डामैण्टलिज्म’ हिंदुत्व के ‘फण्डामैण्टलिज्म’ से कितना हीनतर है? हिंदुत्व का ‘फण्डामैण्टलिज्म’ पराया होकर भी उनके लिए अपना था, मानवीय था जिसमें जीने की और साथ-साथ चलकर अपना संपूर्ण विकास करने की सारी संभावनाएं उपस्थित थीं। जबकि इस्लाम का ‘फण्डामैण्टलिज्म’ अपना होकर भी उनके लिए दानवीय और दम घोंटने वाला था। इसलिए वह अपनों को ही उस समय ‘भेडिय़ा’ की उपाधि दे रहे थे।

पाकिस्तान ने लोकतंत्र और सैनिक शासन की धूप-छांव में पिछले 68 वर्ष व्यतीत तो कर दिये हैं, पर वह 1947 के भयावह दौर से आगे नही बढ़ पाया है। उसने मानवाधिकारों का हनन किया है और इस अमानवीयता का शिकार वहां बादशाह खान के लोग भी हुए हैं। आज जब 70 निरपराध विद्यार्थियों को भेडिय़ों ने अपनी भूख का शिकार बना लिया है तो 70 वर्ष पूर्व सीमांत गांधी के नाम से प्रसिद्घ बादशाह खान के विचारों की अनायास ही स्मृति हो आयी है। उनके विचार कितने सटीक थे और उनकी भविष्यवाणी कितनी सार्थक थी यह अपने आप ही पता चल गया है। जो लोग वर्तमान के ऊंचे पायदान पर खड़े होकर दूर भविष्य को देखा करते हैं-राजनीति में लोग उन्हें राजनेता, समाज में दूरदृष्टा और ज्योतिष में भविष्यदृष्टा कहा करते हैं। यह संयोग ही था कि बादशाहखान एक साथ राजनेता भी थे, दूरदृष्टा भी थे, और भविष्य दृष्टा भी थे। हमारे प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान में घटी आतंकी घटना पर दुख व्यक्त करते हुए पाकिस्तान के साथ अपनी और अपने देशवासियों की संवेदनाएं प्रकट की हैं, और भारत किसी भी प्रकार से अमानवीय नही हो सकता, वह अपने शत्रु के दुख पर भी हृदय से दुखी हो सकता है, इस बात का अहसास वहां के प्रधानमंत्री को कराया है।

अब समय आ गया है कि जब पाकिस्तान को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए भारत के साथ मिलकर आतंकवाद के विनाश के लिए कार्य करना चाहिए। बारूद का व्यापार व्यक्ति को कभी भी चैन से नही सोने देता है, क्योंकि बारूद और आग (आतंकवाद) को आप एक साथ नही रख सकते। पाकिस्तान का दुर्भाग्य ही यह है कि उसने बारूद और आग को अपने जन्म काल से ही अपने साथ रखने का अतार्किक कार्य किया है। अब बारूद आग पकड़ रही है और पाक का ‘परमाणु बम’ उसके लिए ही विनाशकारी बन रहा है। पाकिस्तान, पेशावर, पख्तून, पठानकोट और परमाणु बम सारी कुल मिलाकर पांच ‘प’ हैं यदि पाकिस्तान ने इन पंचतत्वों को संभाल लिया तो एक नये पाकिस्तान का जन्म होते देखा जा सकता है, जो आतंकवाद के विरूद्घ लडऩे में खुलकर विश्व के साथ आएगा और यदि उसने इन पंच तत्वों (पांच ‘प’) को बिखेर दिया संभाल नही सका तो उसका अस्तित्व वैसे ही ‘सुपुर्दे खाक’ हो जाएगा जैसे शरीर में से आत्मा के निकल जाने पर पंचतत्व अपने निज स्वरूप में विलीन हो जाते हैं।

अच्छा हो कि पाकिस्तान वास्तविकता को समझे और अपने 70 विद्यार्थियों को भावपूर्ण श्रद्घांजलि देकर आतंकवाद के विरूद्घ आ डटे। सदियों से जिस खुदा के नाम पर निरपराध लोगों का रक्त बहाये जाने की लंबी घृणोत्पादक गाथा आज भी दोहरायी जा रही है उससे खुदा उनसे पहले दिन से ही नाराज चल रहा है और आज भी नाराज है तभी तो इस्लामिक देशों में आज भी अशांति है, कलह है और कटुता है। अच्छा हो विश्व संस्था यूएन में विश्व शांति की भारतीय संकल्पना और इस्लामिक या ईसाईयत की संकल्पना पर खुली बहस हो।