निकृष्ट जातिवादी व्यवस्था

  • 2016-02-01 03:30:29.0
  • राकेश कुमार आर्य

आज हमारे देश में जातिवाद एक ऐसी जमीनी सच्चाई बन चुका है कि इसके बिना काम चलता दिखाई नही दे रहा। देश की सामाजिक परिस्थितियों और परिवेश को विषैला बनाने वाली इस सामाजिक बुराई को जातिवादी आरक्षण ने जन्म दिया है। अब यदि जातिवादी आरक्षण पर भी चिंतन किया जाए तो यह भी समाज के उन पिछले हुए और दलित, शोषित एवं उपेक्षित  लोगों को आगे लाने का एक उपाय था जो अपना सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास केवल इसीलिए नही कर पा रहे थे कि उनकी जाति निम्न थी। इसलिए उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के लिए इस आरक्षणवादी व्यवस्था को दिया गया। इस प्रकार यह व्यवस्था शुद्घत: एक मानवतावादी व्यवस्था थी। पर इसे भी लोगों मानवतावादी न रहकर दानवतावादी बना दिया। अब आरक्षित व्यक्ति ही आरक्षण के पात्र व्यक्तियों का शोषण कर रहा है और दूसरी जातियों के लोगों को आरक्षण प्राप्त जातियां इसलिए अच्छी नही लग रही हैं कि वे उनकी एकाधिकारवादी व्यवस्था के लिए चुनौती बन चुकी हैं। इससे समाज में कुंठा और घुटन का वातावरण बन रहा है।
jaativaadi जातिवादी व्यवस्था

हमारे देश में कुछ लोगों ने सचमुच अपनी एकाधिकारवादी मानसिकता का परिचय देते हुए निम्न जातियों या पिछड़ी जातियों के लोगों को लाभ पाने के हर स्तर से पीछे धकेलने में कभी कमी नही छोड़ी। बात 1950 है जब ‘संघ लोक सेवा आयोग’ दिल्ली, ने स्वतंत्र भारत में प्रथम परीक्षा आयोजित की। इसमें, ‘एन. कृष्णन’ ने 602 अंक प्राप्त किये। जबकि ‘अनिरूद्घ गुप्ता’ ने 449 अंक प्राप्त किये। जबकि अछूतानंद ने सर्वाधिक 613 अंक प्राप्त किये। इस प्रकार लिखित परीक्षा में अछूतानंद को सर्वाधिक अंक मिले। परंतु जब साक्षात्कार लिया गया तो एन. कृष्णन व अनरूद्घ गुप्ता का 22वां और अछूतानंद दास का 48वां स्थान अर्थात अंतिम स्थान निर्धारित किया गया।

‘अछूतानंद दास’, (जो कि जाति से जाटव थे) इसके साथ ही बंगाल के, पहले दलित आईएएस बने। अछूतानंद दास’ ने लिखित परीक्षा में 613 अंक लेकर ‘प्रथम’ स्थान लिया था, पर वही अछूतानंद दास साक्षात्कार में पिछड़ गये, इसका कारण जातिवादी मानसिकता ही थी। 300 अंक का साक्षात्कार (इंटरव्यू) उन लोगों द्वारा लिया गया जो जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त थे, और किसी भी दलित को ऊपर आने नही देना चाहते थे। साथ ही उनका पूरी व्यवस्था का एकाधिकार था, जिसका वह अनुचित लाभ लेना चाहते थे। ऐसी मानसिकता से ग्रस्त साक्षात्कार लेने वाले अधिकारियों ने ‘अछूतानंद दास, को 300 अंकों में से केवल 110 अंक ही दिए।  इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि लिखित परीक्षा में जो व्यक्ति 613 अंक लेकर प्रथम स्थान प्राप्त कर रहा था, वही साक्षात्कार में इतना कैसे पिछड़ गया? ऐसी परिस्थितियों में लोगों को नीचे से ऊपर लाने के लिए किसी संवैधानिक प्रावधान का होना आवश्यक है, इसलिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का यह कथन उचित ही है कि जब तक समाज में ऊंच नीच की भावना बनी हुई है तब तक आरक्षणवादी व्यवस्था बनी रहनी चाहिए। हम देखते हैं कि लोग अभी भी किसी पिछड़ी जाति के या दलित जाति के व्यक्ति को विकास के क्षेत्र में आगे बढऩे से रोकने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसमें राजनीति पूर्णत: नकारा सिद्घ हो चुकी है, क्योंकि राजनैतिक पार्टियां आरक्षण को अपने वोट बैंक का एक हथियार बनाकर प्रयोग करना चाहती हैं, वह समाज में ऊंच-नीच और छूत-अछूत की भावना को बनाये रखना चाहती हैं।

जिस साक्षात्कार का उल्लेख में हमने ऊपर किया है उसमें जातिवादी मानसिकता के अधिकारियों ने 300 अंकों में से एन. कृष्णन को 260 अंक और ए. गुप्ता को 265 अंक दिये । सामान्य ज्ञान (जी.के.) की 100 अंकों की लिखित परीक्षा में अछूतानंद दास, 79 प्रतिशत अंक, एन. कृष्णन ने ‘69’ अंक और ए. गुप्ता केवल 40प्रतिशत अंक ही प्राप्त कर सका। सामान्य ज्ञान (जी.के.) की परीक्षा में अछूतानंद दास, 79 प्रतिशत अंक लेकर टॉप किया । यदि इंटरव्यू, जातिवादियो द्वारा नही लिया जाता या फिर इंटरव्यू, होता ही ना, तो यह सत्य है कि अछूतानंद दास, स्वतंत्र भारत की पहली आईएएस परीक्षा में सर्वाधिक अंक लेने वाले व्यक्ति होते। एन. कृष्णन का 48 वां स्थान होता और ‘अनिरुध गुप्ता’ कभी भी आईएएस न बनता । इस तरह, एन. कृष्णन को कुल = 931 अंक , ए. गुप्ता को कुल = 754 अंक, तथा अछूतानंद दास, को कुल = 802 अंक प्राप्त हुए । अब ईमानदारी से यह देखो कि, यदि अछूतानंद दास, को भी दूसरों की तरह, इंटरव्यू, में 250अंक दिए जाते तो उसे ( 613+250+79 = 942 ) 942अंक मिलते तो वह ही टापर होता । तथा कथित मेरिट कैसे बनती है? उसका यह केवल एक उदाहरण मात्र है।

हमें ऐसी मानसिकता को चुन-चुनकर खत्म करना था और आज भी जो लोग ऐसी मानसिकता से ग्रस्त होकर कहीं बैठे हैं कि किसी दलित या पिछड़े को आगे नही आने दिया जाएगा, उनकी सोच को बदलने के लिए व्यापक सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता है। इसके लिए राजनैतिक उपाय तो अच्छे हैं ही साथ ही सामाजिक स्तर पर भी जाति तोड़ो और समाज जोड़ो जैसे अभियानों  को चलाने की आवश्यकता है। देश के सामाजिक परिवेश को बदलकर ही लोगों कीे मानसिकता को बदलने का प्रयास किया जा सकता है। हमारे देश में ऐसे बहुत लोग हैं जो किसी जाति या वर्ग की सीमा में तो आते हैं परंतु उनके पास कोई राजनैतिक ताकत नही है, इसलिए उन्हें विकास के समुचित अवसर नही मिल पाते। जैसे हर शहर में बड़ी संख्या में सडक़ के किनारे सोने वाले लोग, या ऐसे लोग जो इधर उधर घूम फिरकर अपना जीवन यापन करते हैं। उन्हें पहचानने की आवश्यकता है, और यह देखने की भी आवश्यकता है कि आज भी कितने अछूतानंददास इस निर्मम सामाजिक व्यवस्था में पीछे धकेले जा रहे हैं।

राकेश कुमार आर्य ( 1580 )

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